लेखक -के. विश्वदेव राव
“धन” शब्द सुनते ही आधुनिक चेतना प्रायः तिजोरी, स्वर्ण और मुद्रा तक सीमित हो जाती है। किंतु सनातनी मनीषा में “धन” का प्रथम अर्थ “आरोग्य” और “चेतना” है।ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक जिस सर्वमंगल की कामना की गई है, उसका आधार वाक्य है:सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥अर्थात, सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त (आरोग्य) हों, सभी का कल्याण हो और कोई भी दुःख का भागी न बने। धनतेरस इसी सर्वमंगल और आरोग्य-कामना का पर्व है।शास्त्रों में इस तिथि पर तीन प्रमुख शक्तियों के पूजन का विधान है। इनका क्रम स्वयं में सनातन जीवन-मूल्यों की गहन यात्रा को रेखांकित करता है।प्रथम आराध्य: भगवान धन्वंतरि (आरोग्य के आदिदेव)श्रीमद्भागवत पुराण के अष्टम स्कंध में समुद्र-मंथन का प्रसंग आता है। जब देवों और असुरों ने क्षीरसागर का मंथन किया, तब अमंगल और तमोगुण (कालकूट विष) के पश्चात कार्तिक त्रयोदशी को हाथ में अमृत-कलश लिए भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य हुआ। वे सर्व-औषधि के स्वामी और आयुर्वेद के प्रवर्तक हैं।शास्त्रों में उनकी स्तुति का मूल मर्म है:नमामि धन्वंतरिमादिदेवं सुरासुरैर्वंदितपादपद्मम्।लोके जरारुग्भयमृत्युनाशं दातारमीशं विविधौषधीनाम्॥(अर्थात: जिनके कमल-चरणों की वंदना देव और असुर दोनों करते हैं, जो संसार से जरा (वृद्धावस्था के कष्ट), रोग, भय और मृत्यु का नाश करने वाले तथा विविध औषधियों के स्वामी हैं, उन आदिदेव धन्वंतरि को मैं प्रणाम करता हूँ।)सनातन परंपरा में लक्ष्मी-पूजन से पूर्व धन्वंतरि-पूजन का विधान यह स्मरण कराता है कि यदि काया निरामय नहीं है, तो संसार का समस्त ऐश्वर्य व्यर्थ है।द्वितीय आराध्य: माता महालक्ष्मी (श्री और कल्याण की देवी)वेदोक्त “श्रीसूक्त” महालक्ष्मी की आराधना का मूल आधार है:पद्मानने पद्मऊरू पद्माक्षी पद्मसम्भवे।त्वं मां भजस्व पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम्॥लक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं हैं, वे अष्ट-लक्ष्मी हैं, अर्थात विद्या, धैर्य, साहस, कीर्ति, संतति, आरोग्य, विजय और सौभाग्य। लोकशास्त्र के अनुसार लक्ष्मी “श्री” का प्रतीक हैं, जो केवल स्वच्छ, शांत और धर्मयुक्त गृह में ही स्थायी निवास करती हैं।तृतीय आराध्य: भगवान कुबेर (विवेक और संरक्षण के देव)कुबेर यक्षों के राजा और देवों के कोषाध्यक्ष हैं। यदि लक्ष्मी धन का प्रवाह हैं, तो कुबेर उस धन को धर्मानुकूल सहेजने और लोककल्याण में नियोजित करने के प्रतीक हैं। बिना विवेक के धन विनाशकारी हो जाता है, इसीलिए कुबेर का पूजन संपत्ति के साथ “सद्बुद्धि” देता है।यम-दीप-दान: अकाल मृत्यु पर भक्ति और सजगता की विजयधनतेरस की संध्या का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण अनुष्ठान यमदीपदान है।स्कंद पुराण के अनुसार, राजा हिम के पुत्र की जन्मपत्री में विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से मृत्यु का योग था। उसकी नवविवाहिता पत्नी ने इस काल-चक्र को स्वीकार नहीं किया। उसने चौथे दिन गृह के मुख्य द्वार से लेकर शयनकक्ष तक असंख्य दीप प्रज्वलित किए, स्वर्ण व रजत आभूषणों की ढेरी द्वार पर रखी और पूरी रात प्रभु-कीर्तन तथा धर्म-गाथाओं का गायन किया। जब यमराज सर्प रूप में आए, तो दीपों के दिव्य आलोक और आभूषणों के तेजोमय प्रभाव से उनकी दृष्टि बंध गई। वे द्वार पर ही स्थिर होकर प्रभु-कीर्तन सुनते रहे और सुबह होते ही अकाल मृत्यु का संकट टल गया।इसी स्मृति में संध्या समय गृह के बाहर दक्षिण दिशा (यम की दिशा) की ओर सरसों के तेल का चौमुखा दीया अर्पित किया जाता है। दीप जलाते समय इस मंत्र का स्मरण किया जाता है:मृत्युना पाशदंडाभ्यां कालेन श्यामेन सह।त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥(अर्थात: त्रयोदशी के इस दीपदान से सूर्यपुत्र यमराज, अपने पाश, दंड, काल और श्याम वर्ण के साथ मुझ पर प्रसन्न हों और अकाल मृत्यु से रक्षा करें।)बदलता स्वरूप: कृषि से बाज़ार तकऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टि से इस पर्व के स्वरूप में युगानुकूल परिवर्तन आए हैं। प्राचीन भारत में धनतेरस मुख्य रूप से कृषि-समृद्धि का पर्व था। कार्तिक मास में नई फ़सल (धान, तिल, धनिया) घर आती थी। इस दिन किसान अपने हल, अन्न के कोठार और मिट्टी के नए बर्तनों का पूजन करते थे। “धनिया” (सृजन का बीज) और “गुड़” का भोग लगाना इसी कृषि-संबद्धता का साक्ष्य है।व्यापारिक नगरों के विकास के साथ इस दिन तांबे, पीतल और कांसे के नए बर्तन खरीदने की परंपरा शुरू हुई। माना जाता था कि धातु में देव-तत्त्व को धारण करने की क्षमता होती है।आधुनिक युग में यह दिन केवल बर्तन तक सीमित न रहकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, वाहन, डिजिटल गोल्ड और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड तक फैल चुका है। बाज़ार ने इसे “उपभोक्ता दिवस” में बदल दिया है, जिससे पर्व का मूल आध्यात्मिक आशय कहीं ओझल होने लगा है।उत्तर और दक्षिण भारत में धनतेरस: एक ही पर्व के दो भिन्न सांस्कृतिक स्वरभारत की सनातन चेतना एक है, किंतु विभिन्न अंचलों में इसके प्रकटीकरण के सौंदर्य अलग-अलग हैं।उत्तर भारत में यह दीपावली के पाँच दिवसीय महोत्सव का प्रथम दिन माना जाता है, जहाँ लक्ष्मी-कुबेर पूजन, धातुओं व नवीन वस्तुओं की खरीदारी, यमदीपदान और संध्या के समय घर में 13 दीये जलाने का विधान मुख्य आकर्षण होता है।वहीं दक्षिण भारत में यह नरक चतुर्दशी (मुख्य दीपावली) की पूर्व-तैयारी का दिन होता है। यहाँ मुख्य ध्यान भगवान धन्वंतरि के जन्मोत्सव, आरोग्य-रक्षा और आयुर्वेद परंपरा पर रहता है। दक्षिण भारतीय घरों में इस दिन “दीपावली लेह्यम” (जड़ी-बूटियों का पाचक मिश्रण) बनाया जाता है और अगले दिन तड़के होने वाले “अभ्यंग स्नान” (औषधीय तेल-मालिश व स्नान) की तैयारियाँ की जाती हैं।आज के समय में क्या करें, क्या न करेंआज अधिकांश लोग विज्ञापनों के दबाव में आकर अपनी सामर्थ्य से बाहर जाकर क़र्ज़ लेकर खरीदारी कर रहे हैं। जिस दिन स्वास्थ्य के देव धन्वंतरि की पूजा होती है, उसी दिन अत्यधिक तली-भुनी मिठाइयों और पटाखों के धुएँ से आरोग्य को क्षति पहुँचाई जाती है। केवल “शॉपिंग” के नाम पर असंगत वस्तुएँ घर लाई जा रही हैं।• क्या खरीदें: शुद्ध धातु और प्रतीक के चयन में तांबा, पीतल, कांसा, चाँदी या मिट्टी के पात्र घर लाने चाहिए। नई झाड़ू खरीदना भी शुभ माना जाता है, क्योंकि झाड़ू घर से “अलक्ष्मी” (दरिद्रता व गंदगी) का निष्कासन कर “लक्ष्मी” के आगमन का मार्ग प्रशस्त करती है।• क्या न खरीदें: कांच, प्लास्टिक, लोहा, एल्युमिनियम, धारदार वस्तुएँ (कैंची, चाकू) या काले रंग के वस्त्र न खरीदें।• धान्य और बीज पूजन: साबुत धनिया और गुड़ खरीदकर पूजा-स्थान पर रखें। धनिया नए सृजन और आर्थिक वृद्धि का प्रतीक है।• वित्तीय अनुशासन (क़र्ज़मुक्त जीवन): शास्त्र कहते हैं कि लक्ष्मी वहीं स्थिर रहती हैं जहाँ ऋण न हो। दिखावे के लिए नया क़र्ज़ लेना धनतेरस के मूल संदेश (दरिद्रता-नाश) के विपरीत है। अपनी सामर्थ्य के भीतर रहकर ही क्रय करें।• सत्पात्र को दान: केवल अपने लिए धातु न खरीदें; किसी निर्धन या कुम्हार से मिट्टी के दीये खरीदकर उसके घर में भी उत्सव का प्रकाश फैलाएँ।धनतेरस हमें स्मरण कराता है कि सच्चा धन तिजोरी में नहीं, स्वस्थ काया, शांत मन और संतोष में बसता है। जब हम धन्वंतरि का वंदन कर आरोग्य माँगते हैं, लक्ष्मी का पूजन कर शुभता का आह्वान करते हैं, कुबेर से विवेक की प्रार्थना करते हैं और यमदीप जलाकर जीवन की रक्षा का संकल्प लेते हैं, तब यह पर्व अपने पूर्ण अर्थ में सार्थक होता है। आइए, इस धनतेरस पर केवल घर ही नहीं, मन को भी स्वच्छ और आलोकित करें। अपनी सामर्थ्य में रहकर खरीदारी करें, किसी कुम्हार के दीये से उसका आँगन भी रोशन करें, और अपनों के स्वास्थ्य व सुख की कामना करें। यही सच्ची दीपावली का शुभारंभ है।तमसो मा ज्योतिर्गमय।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)





