लेखक-अरविंद जयतिलक
गत दिवस प्र्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कद्र्रीय कैबिनेट ने 84,084 करोड़ रुपए की ‘समुद्र मंथन’ नैशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम को मंजूरी देकर उर्जा क्षेत्र की मजबूती के लिए शानदार पहल की है। इस पहल से गहरे समद्र्र में तेल और गैस की खोज के लिए जरुरी बुनियादी ढांचा तैयार होगा जिससे तेल उत्पादन का रास्ता खुलेगा। किसी से छिपा नहीं है कि गहरे समुद्र में तेल खोज की पहल बेहद ही महंगा और जोखिम भरा कार्य होता है। इसलिए भारत सरकार ने इस योजना के लिए भारी वित्तीय मदद की कार्ययोजना तैयार कर ली है। इस योजना के तहत खोजी कुओं की ड्रिलिंग लागत का तकरीन 50 प्रतिशत तक या अधिकतम 675 करोड़ रुपए प्र्रति कुआं सरकार द्वारा वापस किया जाएगा। इसके अलावा सरकार द्वारा समद्र में भू-वैज्ञानिक आंकड़े और सामान्य बुनियादी ढांचा खड़ा करने के लिए भी भारी निवेश किया जाएगा। सरकार ने खोजों को बढ़ावा देने के लिए ओपल जैसी नीतियां लागू की है जिससे घरेलू तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। यह भारत के लिए उर्जा आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा। न्ःिसंदेह इस पहल से देश में तेल और गैस का उत्पादन बढ़ाने और विदेशों से होने वाले आयात पर निर्भरता कम होगी। माना जा रहा है कि इस पहल से 600 मिलियन मिट्रिक टन तेल समतुल्य से अधिक के हाइड्रोकार्बन भंडार तक पहुंचने और घरेलू तेल और गैस उत्पादन में भारी वृद्धि होगी। घरेलू उत्पादन बढ़ने से न सिर्फ देश की जरुरतें पूरी होगी बल्कि विदेशी मुद्रा की भी भारी बचत होगी। भारत को प्रतिवर्ष तेल खरीदने के लिए तकरीबन 144 अरब डॉलर (लगभग 13 लाख करोड़ रुपए) खर्च करना पड़ता है। कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों और भू-राजनीतिक तनावों के कारण बिल में उतार-चढ़ाव और मुश्किेलें पैदा कर देता है। इससे अर्थव्यस्था को भारी नुकसान पहुंचता है। इससे बचने के लिए ही भारत ने रुस जैसे आपूर्तिकर्ता देशों के साथ रुपए में व्यापार तंत्र को काफी बढ़ावा दिया है। यह तथ्य है कि पिछले एक दशक में कच्चे तेल के निमित्त विदेशों पर निर्भरता 77 प्रतिशत से बढ़कर 88 प्रतिशत हो चुकी है। इससे भारत पर अरबों डॉलर के भुगतान का दबाव बढ़ गया है। 2022-23 में भारत ने 232.7 मिलियन मिट्रिक टन कच्चे तेल का आयात किया। इसके लिए भारत को 157.5 अरब डॉलर खर्च करना पड़ा। इसी तरह 2023-24 में भारत द्वारा 23.5 मिट्रिक टन कच्चे तेल की खरीद की गई और 132.4 अरब डॉलर खर्च करना पड़ा। इसी तरह वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 235 मिलियन मिट्रिक टन कच्चे तेल की खरीद की गई और 104 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च करना पड़ा। अगर भारत में कच्चे तेल के उत्पादन में वृद्धि होती है तो निःसंदेह विदेशी मुद्रा की बचत होगी और देश की समृद्धि बढ़ेगी। गौर करें तो भारत न केवल कच्चा तेल बल्कि अपनी जरुरत का तकरीबन 60 प्रतिशत नेचुरल गैस भी विदेश से आयात करता है। भारत मुख्य रुप से कतर, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और सऊदी अरब से गैस मंगाता है। पश्चिम एशिया मे संकट बढने के उपरांत अब भारत अमेरिका और नार्वे जैसे देशों से भी गैस का आयात कर रहा है। अभी तक भारत की निर्भरता काफी हद तक खाड़ी देशों पर ही रही है। लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को अपनी आयात रणनीति बदलनी पड़ रही है। इसका मुख्य कारण देश में गैस की लगातार बढ़ती मांग है। आज देश के करीब 98 फीसदी परिवारों तक एलपीजी की पहुंच है। इसके अतिरिक्त औद्योगिक विकास तेज होने के कारण भी गैस की मांग कई गुना अधिक बढ़ गई है। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में एलपीजी की खपत सालाना लगभग 3.13 करोड़ टन तक पहुंच चुकी है। दैनिक स्तर पर यहां रोजाना 72000 से 90000 टन तक गैस की खपत होती है। गौर करें तो पिछले एक दशक में भारत में एलपीजी की खपत 60 प्रतिशत बढ़ी है। 2015-16 में 19.6 मिलियन मिट्रिक टन से बढ़कर साल 2024-25 में 31.3 मिलियन मिट्रिक टन हो चुकी है। लेकिन विडंबना यह है कि खपत बढ़ने के बावजूद उस अनुपात में एलपीजी गैस उत्पादन में वृद्धि नहीं हुई है। भारत में खपत होने वाले एलपीजी का सिर्फ 40 प्रतिशत हिस्सा ही उत्पादन होता है। पिछले आठ वित्तीय वर्षो यानि 2017-18 से 2024-25 के बीच में घरेलू एलपीजी उत्पादन करीब 12 मिलियन मिट्रिक टन के आसपास ही बना हुआ है। 2015-16 में भारत में खपत होने वाले एलपीजी का लगभग 54 प्रतिशत हिस्सा देश में तैैयार होता था जबकि इसके उलट 2024-25 में यह हिस्सा घटकर लगभग 41 प्रतिशत रह गया है। दरअसल इसका मुख्य कारण यह है कि आज देश का तकरीबन हर परिवार एलपीजी गैस का उपभोग कर रहा है जबकि पहले इसकी पहुंच बहुत कम लोगों तक थी। अच्छी बात यह है कि भारत सरकार गैस उत्पादन के लिए लगातार प्रयास कर रही है और उसी का परिणाम है कि हाल ही में सबसे बड़ी गैस की खोज अंडमान सागर के गहरे पानी में हुई है, जहां ऑयल इंडिया लिमिटेड ने ‘श्री विजयापुरम-3’ कुएं में प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार का पता लगा है। उम्मीद है कि इस खोज से भारत को गैस उत्पादन मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी। गौर करें तो पिछले कुछ वर्षों से पश्चिम एशिया युद्ध के चपेट में है। इस वजह से कच्चे तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई है। होर्मुज स्टेªट के बंद होने से दुनिया भर में तेल का संकट गहराया है। भारत अपने कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज स्टेªट के रास्ते मंगाता है। लेकिन पश्चिम एशिया में हालात बिगड़ने के बाद अब भारत तकरीबन 70 प्रतिशत कच्चा तेल अन्य वैकल्पिक मार्गों से आयात कर रहा है। मौजूदा समय में भारत तकरीबन 40 से अधिक देशों से कच्चे तेल का आयात कर रहा है। अच्छी बात है कि भारत की कच्चे तेल की आपूर्ति सुरक्षित बनी हुई है। गौर करें तो भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है। आज की तारीख में देश में कच्चे तेल की दैनिक खपत तकरीबन 55 लाख बैरल है। भारत अपनी इस जरुरत का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है। एक आंकड़े के मुताबिक पेट्रोल और डीजल की मांग में हर वर्ष 6 से 7 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। इसके लिए अपने ही देश में कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाना आवश्यक हो गया है। तथ्यों पर नजर दौड़ाएं तो भारत में कच्चे तेल का कुल उत्पादन तकरीबन 5.3 लाख से 5.8 लाख बैरल प्रतिदिन है। यह देश की कुल मांग का अधिकतम 20 प्रतिशत है। भारत के मुख्य तेल उत्पादक क्षेत्रों की बात करें तो राजस्थान, महाराष्ट्र और असम प्रमुख हैं। राजस्थान देश का सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक राज्य है। यहां से देश के कुल कच्चे तेल के उत्पादन का तकरीबन 23 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है। यहां मुख्य रुप से बाड़मेर बेसिन में केयर्न ऑयल एवं गैस द्वारा उत्पादन किया जाता है। कच्चे तेल के उत्पादन के लिए अपतटीय क्षेत्र आज भी विशिष्ट बना हुआ है। महाराष्ट्र तट से दूर मुंबई हाई और बसीन फील्ड देश के सबसे पुराने और प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों में एक हैं। आंध्र प्रदेश के केजी बेसिन में भी भारी उत्पादन हो रहा है। असम भारत को सबसे पुराना तेल उत्पादक राज्य है। यहां के प्रमुख क्षेत्र डिगबोई, नाहरकटिया और मोरन-हुग्रीजन से भारी पैमाने पर तेल उत्पादन किया जाता है। इसी तरह गुजरात के अंकलेश्वर, खंभात, कलोल और अहमदाबाद से तेल का उत्पादन किया जाता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सागरपाली गांव में ओएनजीसी द्वारा 3000 मीटर की गहराई पर कच्चे तेल का एक विशाल भंडार भंडार खोजा गया है। उम्मीद किया जाना चाहिए कि भारत सरकार द्वारा ‘समुद्र मंथन’ नैशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम की मंजूरी से तेल और गैस उत्पादन के क्षेत्र में महती उपलब्धि हासिल होगी। इससे आयात का दबाव कम होगा और आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।

(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




