लेखक-संजय राय-
♂÷यूक्रेन को लेकर रुस और अमेरिका आमने सामने आ गये हैं। तीसरे विश्व युद्ध की प्रबल संभावना के आसार व्यक्त किये जा रहे हैं। आज के माहौल को देखकर उस दौर की याद ताजा हो रही है जब 1989 के पहले सोवियत संघ और अमेरिका के दो खेमों के बीच दुनिया बंटी हुई थी। द्वितीय विश्व युद्ध के समापन के बाद से शुरू हुआ यह शीत युद्ध 1989 में अफगानिस्तान से सोवियत सैनिकों की वापसी और उसके बाद सोवियत संघ के विखंडन के साथ समाप्त हुआ और एक धु्रवीय विश्व व्यवस्था में अमेरिका महाशक्ति बनकर उभरा। इसके बाद अमेरिका की दादागिरी को दुनिया ने इराक, अफगानिस्तान और कई अन्य देशों में देखा।
कोरोना महामारी ने अमेरिका की इस दादागिरी पर एक तरह से लगाम लगाने का काम किया है। अभी कुछ महीने पहले तक कहा जा रहा था कि चीन अगली महाशक्ति बनने की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है और वह अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। लेकिन आज चीन इस होड़ में पीछे छूट गया दिख रहा है और उसकी जगह पर पुतिन का रूस अमेरिका के सामने सीना तानकर खड़ा हो चुका है। पुतिन ने यूक्रेन के दो बड़े राज्यों को अलग देश के रूप में मान्यता दे दी है और अमेरिका अपनी सेना भेजकर रूस को चुनौती देने की तैयारी कर रहा है।
आज एक बार फिर दुनिया के सामने सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या रूस और अमेरिका युद्ध करेंगे? अगर दोनों देशों के बीच युद्ध होता है तो इसका दायरा कहां तक रहेगा? क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत का कारण बन सकता है? ये सभी सवाल आज पूरे विश्व में चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन सवालों के जवाब के निष्कर्ष का लब्बोलुआब यह है कि अगर अमेरिका और रूस जैसी वीटो पॉवर वाली दो महान शक्तियों के बीच टकराव हुआ तो पूरी दुनिया की जनता पर इसका प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से बेहद नकारात्मक असर पड़ेगा।
आखिर युद्ध होते ही क्यों हैं। इतिहास पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि अब तक हुए सभी बड़े युद्धों में अमेरिका और रूस की संलिप्तता के पीछे प्रमुख कारण हैं लड़ाकू हथियार। जरा सोचिये एक युद्धक विमान बनाने वाली कंपनी हर दिन एक विमान बना रही है, तो उसे बेचने के लिये बाजार की जरूरत होगी ही। बाजार युद्ध से पैदा होता है। युद्ध होगा तभी हथियार बिकेंगे। इन हथियारों को बेचने की पहली शर्त यही है कि दो देशों के बीच भय और अविश्वास का माहौल पैदा करो और फिर हथियार बेचो। आतंकवाद को भी सुरक्षा कंपनियों के कारोबार में काफी कारगर साधन के रूप में देखा जाता है। सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्टों में इस तरह के तमाम दावे इसकी पुष्टि करते हैं।
आर्थिक वैश्वीकरण के वर्तमान कालखंड में वैश्विक संबंधों की दशा-दिशा तय करने में हर देश अपने स्वार्थ को सर्वोपरि रखता है। अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिये देश कूटनीति और राजनय का शुरुआती हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। जब इन तरीकों से स्वार्थ-सिद्धि नहीं हो पाती है तो फिर युद्ध का रास्ता तय किया जाता है। इसके बाद हथियार कारोबारी, निर्माता और उनके देशों की सरकार की ओर से कमाई के लिए मौत की मशीनों को बेचा जाता है। इन मशीनों की कीमत अरबों-खरबों डॉलर में होती है। ये मशीनें इंसानों की जान लेकर हथियार निर्माता कंपनियों को अकूत दौलत देती हैं।
अल कायदा, बोको हराम, आईएसआईएस, जॉर्डन, सीरिया, इराक, अफगानिस्तान, ये सभी नाम युद्ध और हथियार की याद दिलाते हैं। इतना ही नहीं इन शब्दों से हथियारों, गोला-बारूद, कारतूसों की कालाबाजारी, आतंकवादियों को धन देना और फिर उसमें अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों के नाम भी जेहन में आते हैं। यही देश हथियारों के मुख्य कारोबारियों की कर्मस्थली रहे हैं। सबको पता है कि तालिबान ने कालाबाजारी से खरीदे गये हथियारों से अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहर निकाला। सोचने वाली बात है कि आज अमेरिका के पास मजबूत संचार व सुरक्षा तंत्र उपलब्ध है और उसे तालिबान के आगे झुकना पड़ा। तालिबान को कहां से हथियार मिले अमेरिका को इसकी जानकारी नहीं है, ऐसा हो ही नहीं सकता है।
यह एक कड़वा सत्य है कि सरकारों, आतंकी इकाइयों, गुरिल्ला समूहों, अलग हुए गुटों तथा लड़ाकू गिरोहों तक पहुंच रखनेवाला हजारों मुंहों का दुनिया का बड़ा जीव हथियार लॉबी है और इन्हें आगे बढ़ानेवाले वही देश हैं, जो रोज कसमें खाते हैं कि कारोबार में रहना उनका कारोबार नहीं है। रूस-यूक्रेन तनाव के कारण वर्ष 1939 के बाद यह पहला मौका है जब यूरोप युद्ध के कगार खड़ा है। यह भी हथियार कारोबार से जुड़ा मामला दिख रहा है। एक तरफ रूस है तो दूसरी तरफ अमेरिका के नेतृत्व में नाटो के बैनर तले यूरोपीय देश हैं। अधिकतर नाटो देशों में बड़ी हथियार कंपनियां हैं, जो ऐसे देशों को साजो-सामान निर्यात करती हैं, जिन्होंने न कभी युद्ध लड़ा है और न ही भविष्य में लड़ने वाले हैं। इस संघर्ष में निशाने पर आये देश की भौगोलिक सीमाएं बदल दी जाती हैं, वहां की मासूम जनता मारी जाती है, वहां की अर्थव्यवस्था तबाह कर दी जाती है। इसका परिणाम यह होता है कि हथियार का करोबार बढ़ता है और विजयी साम्राज्य का खजाना भरता है।
कोरोना संकट ने अमेरिका और यूरोप को सबसे अधिक तबाह किया है। उन्हें इस तबाही से जल्द से जल्द उबरना है। ब्लैकवॉटर जैसी निजी लड़ाकू कंपनियां, सीआइए की गतिविधियां तथा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की प्राकृतिक संपदा पर पश्चिमी कारोबारियों की गिद्ध दृष्टि है। स्टॉकहोम स्थित संस्था सिपरी की रिपोर्ट के मुताबिक, एशियाई देशों ने एक दशक में लगभग 50 फीसदी हथियार खरीदे हैं। इसमें चीन और भारत की बड़ी हिस्सेदारी है। ये देश सीधे युद्ध में भी शामिल नहीं हैं। इसी तरह खाड़ी देशों ने सैन्य साजो-सामान पर सौ अरब डॉलर से अधिक खर्च किया है। इनमें सबसे बड़े आयातक सऊदी अरब ने अपनी 70 फीसदी खरीद अमेरिका से की है। अमेरिका इजराइल की 92 फीसदी और जापान की 95 फीसदी जरूरत को भी पूरा करता है। दुनिया के शीर्ष सौ हथियार ठेकेदारों की वार्षिक आय लगभग 400 अरब डॉलर आंकी गयी है। इस आय में एक दशक से भी कम समय में 25 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी है।
हथियारों की बात कर रहे हैं तो यह तथ्य जानने लायक है कि अफ्रीका और एशिया में 19वीं सदी से जारी हथियारों की आमद उन देशों में सत्ता संतुलन को साधने का राजनीतिक और व्यावसायिक हथियार बनी, जहां विकसित देशों के कॉरपोरेट हित जुड़े हैं। ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार, तीसरी दुनिया में हथियारों के जखीरे में सबसे बड़ी बढ़त 1978 से 1985 के बीच हुई, जब सरकारों ने 258 अरब डॉलर के साजो-सामान खरीदे।
यूरोपीय संघ अमेरिकी चिंताओं को आगे बढ़ाने में जुटा हुआ है। रूस और पश्चिम के लिए सैन्य संघर्ष बाजार के विस्तार का एक तरीका है. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय युद्ध नहीं हुआ है। लेकिन लोगों का जीवन बेहतर करने की बजाय युद्धों की भविष्यवाणी पर या युद्धोन्माद फैलाने पर बहुत अधिक समय और धन खर्च किया गया है। अमेरिका ने लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर अफगानिस्तान और पश्चिमी एशिया में युद्धों पर खरबों डॉलर खर्च किया है। अफगानिस्तान में वह जिन लोगों को खत्म करना चाहता था, उन्हीं के पास ढेर सारे हथियार और लड़ाकू जहाज छोड़कर अफगानिस्तान से उसे शर्मिंदगी के साथ पीछे हटना पड़ा, लेकिन वास्तविकता यह है कि आज अफगानिस्तान के रिजर्व बैंक का पूरा खजाना अमेरिका के कब्जे में है और इस युद्ध में उसने जितना खर्च किया था, उसका लगभग तीन गुना धन लेकर वापस लौटा। यह साबित करता है कि इन देशों के लिये युद्ध और जनसंहार बेहद लाभदायक करोबार है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की इमारत के दरवाजे पर ईरान के विश्व प्रसिद्ध फारसी कवि शेख सादी शिराजी की एक कविता उकेरी गयी है। कविता में कहा गया है कि समस्त मानव एक संपूर्ण के सदस्य हैं। उनका मूल और उनकी आत्मा एक है। अगर एक व्यक्ति को दर्द होता है, तो अन्य लोग भी इससे प्रभावित होते हैं। यदि मानव पीड़ा के लिये आपके पास कोई सहानुभूति नहीं है, तो आप इंसान कहने लायक नहीं हो। यह कविता समस्त मानवता को रास्ता दिखाने के लिये वहां लिखी गयी है। आज दुनिया के जो देश हथियारों के कारोबार में अंधे होकर मासूम लोगों का खून बहाते हैं और अपना खजाना भरते हैं, उन्होंने शायद इसे नहीं पढ़ा है। अगर पढ़ भी लेंगे तो शायद उनके ऊपर इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला है, क्योंकि ये लोग स्वार्थ में अंधे हो चुके हैं। इन्हें युद्ध और हथियार हर कीमत पर बेचना है। दुनिया इनके चंगुल से कैसे बाहर आये, फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।
समाप्त।

÷लेखक “आज” समाचार पत्र के नेशनल ब्यूरो इन चीफ़ हैं÷






















