★मुकेश शर्मा★
★भोपाल★
{सीएम शिवराज चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की निगरानी में युद्ध स्तर पर बचाव कार्य जारी}
[कागज की तरह उड़े पुलों से निर्माण कार्यो की गुणवत्ता पर सवाल]
(नदियों में बेतहाशा रेत खनन और प्रकृति से छेड़छाड़ के दुष्परिणाम आने शुरू)

♂÷मध्यप्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल इस समय अति वर्षा के कारण बाढ़ नदियों ने रौंद रूप धारण कर लिया है।जिसके चलते अंचल के जिले श्योपुर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना व ग्वालियर के कई गांव व बस्तियां जलभराव के कारण टापू बने हुए है, अंचल की नदियां अपने रौद्र रूप में है। सिंध और चम्बल नदियों के किनारों के सैंकड़ो गांव प्रशासन ने खाली करबा लिए हैं। हरसी, मड़ीखेड़ा आदि अंचल के बड़े डेमों के सभी दरवाजे अति वर्षा के चलता खोल दिए गए हैं। जिस कारण अकेली सिंध नदी पर बने आधा दर्जन पुल ढह गये हैं। कल दतिया जिले की रतनगढ़ माता मन्दिर पर बने पुल के बहने के बाद आज दतिया जिले के ही स्योढ़ा का पुल सिंध के पानी के बेग में बह गया। वहीं स्थानीय प्रशासन व पुलिस के साथ-साथ सेना भी बचाव व राहत कार्य मे जुटी हुई है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई दौरा किया। उधर केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी लगातार प्रशासन से संपर्क बनाए हुए है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मुख्यमंत्री से फोन पर चर्चा कर बाढ़ की जानकारी ली और आवश्यक निर्देश दिये है। खबर लिखे जाने तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह बाढ़ का जायजा लेने ग्वालियर एयरपोर्ट पहुंच चुके हैं

बॉक्स1
इस बार की वर्षा ने बीते दशक में हुए नदियों के पुलों के निर्माण कार्यो की गुणवत्ता की पोल खोलकर रख दी है, कल दतिया जिले के रतनगढ़ माता मंदिर पर जाने के लिए सिंध नदी पर बनाया गया पुल पानी के बहाव में कागज के गत्तों की तरह उड़कर बिखर गया था तो आज सिंध नदी पर ही बना स्योढ़ा का पुल पानी के बहाव में बह गया, इसी तरह अंचल के कई पुल और पुलियां पानी के बहाव की ताकत नही झेल पाए। स्योढ़ा पुल को छोड़कर पानी के बहाव में बहे पुल और पुलियां अधिकार बीते दो दशको में ही निर्मित हुए थे।

अवैध रेत खनन से खोखली हुई नदियां और नालों के तटों पर कब्जा बना तबाही का कारण
ग्वालियर-चम्बल अंचल में 1990-91 के बाद यानी तीन दशक बाद ऐसी भीषण वर्षा हुई है। इस बीच लोग भूल ही गये कि कभी भारी वर्षा का सामना भी करना पड़ सकता है। अंचल की बड़ी नदियां चम्बल और सिंध को राजनैतिक संरक्षण पाए हुए रेत माफियाओ ने खोखला कर डाला नदी में पुल के पिलरों के 40 मीटर पी परिधि में रेत खनन प्रतिबंधित है परंतु माफिया ने पुलों के पिलर भी नहीं छोड़े। भिंड, मुरैना, दतिया और शिवपुरी जिले के अवैध रेत खनन का डंका पूरे देश मे बजने लगा, प्रशासन में कभी-कभी आये ईमानदार अफसरों ने यदि इसे रोकने की कोशिश की तो या तो उनका तबादला हुआ या दुनियां से ही चलता कर दिया गया। आखिर में हार थक कर अफसर भी इस भ्रष्टाचार की बहती गंगा में डुबकी लगाकर तृप्त होने लग गए।
भिंड और मुरैना जिलो में तो विधानसभा चुनावों की लड़ाई विकास और प्रगति की जगह रेत पर कब्जा करने की लड़ाई के रूप में तब्दील हो गई है।
परिणामतः बड़ी नदियों से अंधाधुंध रेत उत्खनन का दुष्परिणाम आज हमारे सामने है, वही भू माफियाओ ने छोटे नदी नालों के तटों की अधिकांश भूमि पर कब्जा कर उनके आकार को छोटा कर दिया है, जिसके चलते नदियां और नाले अपने असल स्वरूप को खो बैठे और आज बाढ़ के पानी बहाव को झेलने में सक्षम नहीं रहे।






















