【बाल यौन—शोषण पर खोटी सोच !】

【बाल यौन—शोषण पर खोटी सोच !】

लेखक~डॉ.के. विक्रम राव

♂÷यौन उत्पीड़न, खासकर नाबालिग कन्या से बलात्कार के प्रयास, की तीव्र भर्त्सना न किया जाना, सामाजिक संवेदनहीनता ही दर्शाती है। मगर गत 19 जनवरी को बम्बई हाई कोर्ट (नागपुर पीठ) में न्याय की देवी श्रीमती पुष्पा वीरेन्द्र गनेडिवाला ने इस जघन्य अपराध को इतना क्लीव बना डाला कि दोषी द्वारा दण्ड से सिहरने के बजाय, उसकी रिहाई सुगम हो गई है।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस अवांछित निर्णय को अत्यधिक गंभीरता से लिया है। उस पर रोक लगा दी है। नतीजन बावन—वर्षीया न्यायमूर्ति गनेडिवाला को स्थायी जज बनाने का प्रस्ताव भी रोक दिया गया है। उन्हें वापस जनपद न्यायाधीश पद पर अवनत कर भेजने की चर्चा है।

सर्वोच्च न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश शरद अरविन्दराव बोबडे की तीन—सदस्यीय पीठ ने यह निर्णय गत सप्ताह दिया। तब स्वयं एटर्नी—जनरल के.के. वेणुगोपाल ने नागपुर पीठ के निर्णय का उल्लेख प्रधान न्यायमूर्ति के सामने किया था। संसद ने 2012 में यौन अपराधों से बच्चों को बचाने वाला अधिनियम (पास्को) बनाया था, ताकि इन अबोधों को लैंगिक शोषण से महफूज रखा जा सके।

एक बहु—प्रचारित अत्यावश्यक, सख्त कानून के दंड के परिमाण को घटा कर, उसकी परिभाषा विकृत कर, नागपुर खण्डपीठ ने अपने ही विरुद्ध राष्ट्रव्यापी आक्रोश सर्जा दिया।

घटनाक्रम यूं है। गढ़चिरौली न्यायालय ने एक अधेड़ व्यक्ति को एक बारह—वर्षीया बालिका का सलवार ढीला करने, हाथ पकड़ने, उसकी वक्षस्थल को दबाने तथा अपने पैन्ट की चेन खोलने का आरोप था। वह जिला जेल में सजा भुगत रहा है।

न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडिवाला ने पास्को अधिनियम की धारा 8 तथा 10 के स्थान पर भारतीय दंड संहिता की यौन अपराध की मामूली धारायें लगाकर अभियुक्त को रिहा ​करने का आदेश दे दिया। जज की राय थी कि पांच माह वह सजा काट चुका था। वही पर्याप्त है। जबकि दण्डावधि पांच वर्ष निर्धारित है।

न्यायमूर्ति ने अपराध की परिभाषा, कृत्य की निर्ममता तथा क्रूरता को निष्प्रभावी बना डाला। जज साहिबा का मानना था कि पुरुष की त्वचा का बालिका की त्वचा से स्पर्श नहीं हुआ। अपराध की प्रमाणिकता हेतु यह आवश्यक है। अपराधी ने केवल बालिका के वस्त्र से ढकी छाती को दबाया था। मात्र अपने पैन्ट की चैन खोली थी। जज साहिबा ने पास्को अधिनियम की धारा को सुनाया कि : ”यौन अपराध तभी बनता है जब संभोग के इरादे से शारीरिक रिश्ते कायम हों।” अर्थात इस प्रकरण में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, इसीलिये अभियुक्त की सजा कम की जाती है।

प्रथम दृष्टया जज साहिबा, जो स्वयं महिला हैं, का निर्णय अप्रत्याशित, अनापेक्षित, हृदयहीन तथा चलताऊ लगता है। न्यायालय, वह भी महिला जज, से आम आशा यही होती थी कि वह केवल कोरे, कागजी नियमों की मैकेनिकल परिभाषा करने के बजाये, अन्तर्निहित मकसद का परीक्षण करेंगी।

भला हो सर्वोच्च न्यायालय का कि इस हाईकोर्ट के निर्णय को रोक दिया। वर्ना इसी को आधार बनाकर भारतभर के लुच्चे, लफंगे, पेशेवर यौन उत्पीड़क, नारी को त्रास देनेवाले अपराधी—दुर्जन केवल चन्द महीनों की जेल काटकर ही स्वच्छन्द नागरिक बन कर शुद्ध हवा में सांस लेते रहते। क्षणभर के लिये कल्पना कीजिये कि नागपुर हाई कोर्ट के अनुसार यदि परिधान (कुर्ता, कमीज, दुपट्टा, आंचल आदि) से उरोज आच्छादित हो, तो उन्हें दबाना गंभीर अपराध नहीं होगा! क्या संदेश जायेगा समाज में?

गौर कीजिये। कई उच्च न्यायालयों का निर्देश है कि शाम ढले महिला को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। वह कैद अवैध है। फिर भी घटनायें सुनने—पढ़ने में आती है कि रात भर थाने में महिला बैठायी गई। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है कि पारिवारिक विवाद की सुनवाई बन्द कमरे में हो, न कि खुली अदालत में। इस निर्देश का जनपदों में कितना पालन होता है? यह निर्णय तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र तथा न्यायमूर्ति अजय माणिकराव खानविलकर ने दिया था।

अब जरा बलात्कार जैसे गंभीर अपराध पर विभिन्न अदालतों के निर्णयों पर दृष्टि डाल लें। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि पीड़ित महिला उस पुरुष—अपराधी से विवाह कर लें। अथवा उसे राखी बांधकर भाई बना लें। साथ में ग्यारह हजार की भेंट तथा पांच हजार की मिष्ठान्न पा ले। इससे सार्वजनिक लज्जा का निवारण हो जायेगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने तो महिला के व्यवहार के बारे में कहा कि : ” नारी की कमजोर ”ना” तो उसकी ”हॉ” ही कहलायेगी। (महमूद फारुकी बनाम राज्य)।

इस परिवेश में भारतीय तथा प्रदेशीय विधि परिषद से अपील है कि वे हर बलात्कारी का मुकदमा पैरवी हेतु स्वीकारने के पूर्व गहन आत्ममंथन और परीक्षण कर लें। यह अनिवार्य नहीं है कि हर मुकदमा वकील स्वीकार ही कर ले। जेसिका लाल, ज्योति सिंह पाण्डेय, चर्चित निर्भया केस, प्रियदर्शिनी मुट्टू इत्यादि के अपराधियों की याचिकाओं को नकारा जाना चाहिये था। इन सबके हत्यारों को नामीगिरामी वकील मोटी फीस में मिल ही गये थे।

इसी विषयवस्तु पर दक्षिण भारत की एक फिल्म (जख्मी औरत) बनी थी जिसमें अधिवक्ता की भूमिका में अनुपम खेर बलात्कारी युवकों को साफ बचा लेते हैं। मगर वे युवक फिर वकील साहब की बेटी को ही उठा ले जाते हैं। तब अनुपम खेर को परपीड़ा का एहसास होता है। अत: ऐसी आचार संहिता इन वकीलों को स्वयं गढ़नी चाहिये। बार काउंसिलों को रचनी चाहिए।

हम श्रमजीवी पत्रकार संदेहास्पद और संहिता के तोड़क हों, फिर भी लिहाज तो बहुधा करते ही हैं। मुझे अपने पत्रकारी जीवन की एक घटना याद है। एक बार एक बड़े धनवान मेरे पास अहमदाबाद (टाइम्स आफ इंडिया) में कार्यालय आये थे। मैं रात्रि की पाली में था। वे एक खबर को छपने से रुकवाने आये थे। मैंने प्रतिरोध किया यह कहकर कि : ”एक रिपोर्टर से समाचार न छापने का आग्रह करना, जैसे मंदिर में पुजारी से गौहत्या कराना होगा।” फिर भी मैंने पूछा ऐसी खबर है क्या? वे रुंधे गले से बोले : ”मेरी इकलौती संतान (मेरी बेटी) और मेरा ड्राइवर तीन दिन से घर नहीं आये। अगर यह खबर छप गई तो मेरा कुटुम्ब बर्बाद हो जायेगा।” तत्काल मैंने जवाब दिया, ”आप निश्चिंत होकर जाइये। मेरे रहते मेरे दैनिक में आपकी खबर नहीं छपेगी।” आज मैं अपने बेटों और बेटी को यह वाकया बताकर गर्वोन्नत महसूस करता हूं।

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÷लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट और वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार हैं÷

Mukesh Seth

Chief Editor

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