लेखक~डॉ.के.विक्रम राव

♂÷कांग्रेस सरकार को बदनाम करने वाले काले प्रेस कानून (31 जुलाई 1982) के मिस्त्री रहे, डॉ. जगन्नाथ मिश्र का आज (19 अगस्त 2019) निधन हो गया वे चारा घोटाले में सजायाफ्ता अभियुक्त भी थे। सम्पूर्ण भारतीय मीडिया को एक ही आघात में पामाल करने की सोच वाले 82-वर्षीय इस पूर्व मुख्य मंत्री को हम श्रमजीवी पत्रकार कभी भुला नहीं सकते।मैं तो कम से कम बिलकुल नहीं उस दिन (अगस्त 1982) बिहार राज्यपाल अखलाकुर्र्रहमान किदवई को ज्ञापन देने जा रहे विशाल जुलूस के हरावल दस्ते में शामिल मैं भी था मुंह पर काली पट्टी लगाये और हाथ पीछे बांधे, हम सब बेली रोड पर चले सारे संपादकजन प्रथम पंक्ति में थे। संघर्ष समिति के ये अगुआ थे- दीनानाथ झा (इंडियन नेशन), हीरानन्द शास्त्री (आर्यावर्त), पारसनाथ सिंह (दैनिक आज), आदि,हम बोरिंग कैनाल रोड पार कर चुके थे तभी पटना पुलिस ने हमें घेर लिया।राज भवन जाने से रोक दिया।बसों में लादकर पटना कोतवाली में नजरबंद कर दिया| धाकड़ पुलिस एसएसपी रामचंद्र खान भी थे।हमें डराने के लिये एक वर्दीधारी बोला, “हजारी बाग में मौसम सुहाना है,” यह केन्द्रीय कारगार (आज झारखण्ड में) ढाई सौ किलोमीटर दूर है।मकसद था कि कमजोर दिल वाले हिरासत से निकल जायें, संख्या घटे मेरा उनसे सवाल था कि “इंदिरा गाँधी की बड़ौदावाली जेल की तन्हा कोठरी (अप्रैल 1976) से ज्यादा भयावह तो नहीं होगी?” मैं उस “फाँसी वार्ड” में कई महीने आपातकाल में गुजार चुका थ।|लम्बे अभियान के बाद बिहार काला प्रेस बिल के आन्दोलनकारी ठण्डे पड़ रहे थे, वक्त के साथ उत्साह भी घटता जाता है।जगन्नाथ मिश्र (प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी के शह पर) अड़ियल हो गये थे संवाद तक नहीं किया।
अतः कैद होने से पहले मैंने एक हरकत की थी लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र जीवन वाला उमंग ताजा हो गया उसका आज साढ़े तीन दशकों बाद उल्लेख कर दूं,जुलूस को जब पुलिस ने राजभवन के पास रोक दिया तो मुझे कुछ कौंध गया वहीँ सड़क के किनारे ईंट–ढेले बिखरे थे।मैंने युवा पत्रकारों को इशारा किया मेरी फुसफुसाहट को वे लड़के भांप गये व पत्थर से मार खाकर सिपाही लोग फ़ौरन एक्शन में आ गये। लाठी भांजने लगे अग्रिम पंक्ति में चलने वाले संपादकगण और वरिष्ठ लोग चोटिल हो गये,“जनशक्ति” दैनिक के शिवनारायण सिंह लहूलुहान हो गये इंडियन नेशन वाले के. के. सिंह घायल हुए सुरेन्द्र किशोर भी सक्रिय थे खबर बनी। राष्ट्रव्यापी हेडलाइन छपे दिल्ली अखबारों के आमतौर पर शांतिप्रिय, बंद कमरों में कार्यरत लोग भी विवश होकर सड़क पर उतरे उनकी भी तो रूह कांपी हमारा मकसद पूरा हो गया, पत्रकारों के पक्ष में पाठकों के कूद पड़ने से यह जनांदोलन बन गया। देर रात मुख्यमंत्री ने फैसला किया कि कैद से हम लोग रिहा कर दिए जायें| आशंका थी कि बयार कहीं बवंडर न बन जाये मगर पटना की चिनगारी तब तक देश में धधक चुकी थी।पीएमओ से फरमान निकला काला बिल वापस हुआ आपातकाल के प्रेस सेंसर को हराने के बाद, भारतीय मीडिया की यह दूसरी विजय थी।
एक ख़ास बात और इस पूरे आन्दोलन में हमारे संगठन “इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स” (IFWJ) को नई उर्जा मिली,सत्रह वर्षों से हमारा फेडरेशन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा नियंत्रित था।राजनीति से मुक्त कराने हेतु 1982 में मैंने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा, मगर हार गया। वामपंथी “ब्लिट्ज” साप्ताहिक के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख ए. राघवन ने मुझे देशव्यापी मतदान में मात्र सत्तर वोटों से पराजित किया था कुल करीब पांच हजार वोट पड़े थे। बिहार में हमारी इकाई बिहार वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन (BWJU) के अध्यक्ष थे चन्द्रमोहन मिश्र वे वामपंथी दैनिक “पेट्रियट” के ब्यूरो प्रमुख और कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से विधान परिषद के सदस्य भी थे। तुर्रा यह कि वे मुख्य मंत्री जगन्नाथ मिश्र के मौसेरे भाई भी थे। पटना में खबर थी कि चन्द्रमोहन मिश्र ने ही इस काले कानून की ड्राफ्टिंग की थी।
हमारे राष्ट्रीय संगठन (IFWJ) ने आपातकाल का समर्थन कर दिया था।मैं उपाध्यक्ष था पर विरोध नहीं कर पाया तब मैं जेल में पड़ा था असहाय था।
अतः प्रेस बिल के संघर्ष में भारत के इस पहले पत्रकार यूनियन IFWJ (28 अक्तूबर 1950) को बिहार में बचाना था। राष्ट्रीय अध्यक्ष राघवन ने मुझे दिल्ली से फोन कर पटना जाकर आन्दोलन में शिरकत करने का निर्देश दिया,पटना हवाई अड्डे पर साथी के. के. सिंह मुझे लेने आये। पहले वे सर्किट हाउस ले जा रहे थे, फिर मेरे आग्रह पर सीधे जुलूस के स्थल पर ले गये एक पत्रकार ने तब चुटकी भी ली: “डायनामाईट अभी भी लाइव ही है।” मुझे लोकनायक जयप्रकाश नारायण याद थे, “संघर्ष हमारा नारा है|” कुछ मेरा स्वार्थ भी था। हमारे संगठन को कम्युनिस्टों के चंगुल से मुक्त कराना था, वह लक्ष्य पूरा हो गया। श्रमजीवी पत्रकारों की निष्पक्षता और निर्भीकता पाटलिपुत्र ने वापस दिला दी जैसे निरंकुश नन्द से मगध को मुक्ति।
÷लेखक भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ(IFWJ)के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं÷






















