【10 लोगो के परिवार में से 9 लोगों के नाम NRC लिस्ट से बाहर】

【10 लोगो के परिवार में से 9 लोगों के नाम NRC लिस्ट से बाहर】

★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★
{हिंदुओं के मलयाबड़ीगांव की 80 फीसदी आबादी NRC लिस्ट से बाहर,ग्रामीणों में आक्रोश उठाये प्रक्रिया पर सवाल}
[दिहाड़ी मजदूर बिपुल ने रोज 300-400 कमाऊ की भारतीय नागरिकता साबित करने कोर्ट जाऊ, यहीं पैदा हुआ सारे दस्तावेज है फ़िर भी नाम बाहर]
(31 अगस्त को असम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(NRC) जारी होते ही सामने आ रही है लोगों की तीखी प्रतिक्रिया,19 लाख से अधिक लोग हुए हैं एनआरसी लिस्ट से बाहर)
[120 दिनों में फॉरेन ट्रिब्यूनल में अपील के बाद जा सकते हैं हाइकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कहा है केंद्र सरकार ने]

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♂÷असम में मलयाबाड़ी एक ऐसा गांव है जहां की 80 फीसदी आबादी को एनआरसी लिस्ट में जगह नहीं मिली।इस कारण लोगों में बड़ी नाराजगी है और ग्रामीण इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।
असम के मलयाबाड़ी गांव के 80 फीसदी लोग लिस्ट से बाहर
गांव में रहने वाले 2 हजार लोगों की नागरिकता पर संकट
असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की अंतिम सूची 31 अगस्त को जारी कर दी गई. करीब 19 लाख लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं।एनआरसी की अंतिम सूची से 19,06,677 लोग निकाले गए हैं, जबकि इसी सूची में 3,11,21,004 लोगों को भारतीय नागरिक बताया गया है।
एनआरसी की फाइनल लिस्ट आने के बाद कई लोगों को राहत मिली है तो कई लोगों के सामने संकट आ गया है।राज्य के कामरूप जिले का मलयाबाड़ी ऐसा ही एक गांव है जहां की 80 फीसदी आबादी को एनआरसी लिस्ट में जगह नहीं मिली है,इस कारण लोगों में बड़ी नाराजगी है और इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए जा रहे हैं।

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गांव में रहने वाले 2 हजार लोगों की नागरिकता पर संकट आ गया है और यहां रहने वाले बंगाली हिंदू भी इस फैसले से बेहद नाराज हैं।
इस फैसले से मलयाबाड़ी गांव के कई लोगों की रोजाना की जिंदगी पर खासा असर पड़ गया है। इसी गांव की 59 वर्षीय ममता अन्य ग्रामीणों की तरह बेहद दुखी हैं क्योंकि गांव के 80 फीसदी लोगों को एनआरसी लिस्ट में जगह ही नहीं मिली है, ममता बताती हैं कि फैसला आने के बाद पूरा गांव उदास है।
उनका कहना है कि अब ऊपरवाले से प्रार्थना करने के अलावा ग्रामीणों के पास और कोई विकल्प नहीं रह गया है। उन्हें प्रशासन की ओर से पर्याप्त जवाब नहीं मिला है।लोग समझ नहीं पा रहे कि समस्या कहां से आ रही है,लोग उदास और बीमार हो गए हैं उनकी 8 लोगों की फैमिली में से सिर्फ 1 का ही नाम एनआरसी लिस्ट में आया है।
स्थानीय ग्राम पंचायत के तहत यहां दो वॉर्ड आते हैं, जो गुवाहाटी से 100 किलोमीटर से अधिक दूरी पर स्थित है ज्यादातर ग्रामीण रोज काम के लिए सोनपुर या गुवाहाटी जाते हैं,30 वर्षीय बिपुल कर नाराज हैं और असहाय हैं।
अपना दर्द बयां करते हुए बिपुल ने कहा, ‘मेरा नाम सूची में नहीं आया था मैं यहीं पैदा हुआ और सारे दस्तावेज मेरे पास हैं मैं एक दैनिक श्रमिक हूं और रोज 300 से 400 कमा लेता हूं।लिस्ट से नाम गायब होने के बाद क्या अब मैं एक भारतीय के रूप में अपनी पहचान साबित करने के लिए काम पर जाऊंगा या कोर्ट जाऊंगा? मैं अपना और परिवार का पेट भरने के लिए कमाता हूं। क्या मुझे न्याय के लिए अपनी कमाई वकील पर खर्च कर देनी चाहिए।
पंचायत कर्मचारी प्रमोद चंद्र कर लगभग एक दशक तक असम सरकार में रहे. उन्होंने कहा, ‘1964 में जब पूर्वी पाकिस्तान में समस्या थी तब मेरे पूर्वज यहां शरण लेने आए थे हम असम की संस्कृति और सभ्यता से वाकिफ़ हैं,हम मतदाता हैं और हमारा जन्म भी यहीं हुआ है,मैं एक सरकारी कर्मचारी हूं, फिर भी मेरा नाम नहीं है पंचायत सदस्यों के परिवार के कई लोगों को लिस्ट से बाहर रखा गया है।
वहीं, पंचायत सदस्य शम्पा ने कहा, ‘मेरी विरासत का किसी और ने दुरुपयोग किया था। उन्होंने हमारे पूर्वजों के नाम और दस्तावेज का इस्तेमाल किया और हमें छोड़ दिया उन्होंने बाद में माफी मांगी कि वे गलती किए थे, लेकिन इस सारी प्रक्रिया के बाद भी हमारे नामों को एनआरसी सूची में खारिज कर दिया गया है।
परेशान शीला ने कहा, ‘मेरा नाम एनआरसी में है, लेकिन मेरे तीन बेटों के नाम और मेरे पति का नाम नहीं है,ये कैसे संभव है? अब उनकी समस्याओं के लिए कौन जिम्मेदार है। मीना बिस्वा ने कहा, ‘हमारे पास 1965 के आंकड़े हैं और हमारे पास 1952 से जमीन के दस्तावेज हैं, लेकिन अभी भी हम छह बहनों और एक भाई का नाम सूची में नहीं है मैं नहीं जानती कारण क्या है?
श्रीचंद रानी दत्ता ने पूछा, ‘मेरे गांव में 3000 हिंदू निवासी हैं, जिनमें से 2000 से अधिक का नाम नहीं है,ये कैसे संभव है? पास के गांव में काफी मुस्लिम हैं और उनका नाम लिस्ट में है मैं भी इसी गांव की हूं, लेकिन हमारा नाम नहीं है।
प्रमिला दत्ता ने सवाल करते हुए कहा, ‘हमारे पास सभी दस्तावेज हैं, लेकिन नाम नहीं है।
संजय चक्रवर्ती ने कहा, ‘हम एक बंगाली बहुल गांव से हैं, लेकिन हमारा नाम नहीं है, जबकि मुस्लिम बहुल क्षेत्र में लोगों का नाम है।’ चंचल बोस ने कहा, ‘हमने कम से कम 5 बार दस्तावेज जमा किए थे, लेकिन परिवार के 10 सदस्यों में से केवल एक स्वीकार किया गया है मैं काफी परेशान हूं और मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। अगर यह मसला जल्द खत्म नहीं हुआ तो हम आत्महत्या करने की सोच रहे हैं।
उधर मोदी सरकार ने स्पष्ट किया है कि लिस्ट से बाहर हो गए लोग 120 दिनों में फॉरेन ट्रिब्यूनल में अपील कर सकते हैं, उसके पश्चात भी उनको हाई कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट जाने के अधिकार है वहाँ भी वह अपील कर सकते हैं।
कुल मिलाकर ये देखने मे आ रहा है कि भारी सँख्या में एनआरसी लिस्ट से ऐसे भी लोग बाहर हो गए जिनके मुताबिक उनके पास 1971 से पूर्व के नागरिकता सम्बन्धी दस्तावेज मौजूद हैं।

Mukesh Seth

Chief Editor

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