लेखक: मनोज श्रीवास्तव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के नागरिकों से अपील की है कि कम से कम एक वर्ष तक सोने की खरीददारी से बचे जिससे देश का व्यापार घाटा सुधर सके।
हालांकि इसको लेकर जहां राजनेता राजनीति करना शुरू कर दिए हैं वो वहीं सोने चंदी के व्यापारी प्रधानमंत्री की इस अपील को अपने बिजनेस के लिए घातक मान रहे हैं।
अब देश को यह गंभीर रूप से समझना पड़ेगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने आखिर इतनी गंभीर अपील क्यों की है कि देश कोरोना के समय की परिस्थितियों से गुज़र सकता है।
मालूम हो कि भारत का सबसे बड़ा आर्थिक रोग है व्यापार घाटा, अर्थशास्त्र की सरल भाषा में कहें तो जब हम जितना बेचते हैं उससे अधिक खरीदते हैं, तब देश से डॉलर बाहर जाते हैं और सोना इस घाटे का सबसे बड़ा कारण है।
भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा सोने का उपभोक्ता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 721 टन सोना आयात हुआ, जिसका कुल मूल्य लगभग 6,11,830 करोड़ रुपये रहा। इस हिसाब से एक दिन में भारत औसतन 1,676 करोड़ रुपये का सोना विदेशों से खरीदता है।
यह संख्या पढ़कर मन ठहर जाता है। प्रतिदिन 1,676 करोड़ रुपये! यह धनराशि किसी छोटे राज्य के वार्षिक बजट से भी अधिक है। और यह सारा धन देश की सीमाओं के पार चला जाता है । स्विट्ज़रलैंड की खदानों में, दक्षिण अफ्रीका के खनन उद्यमों में, दुबई के व्यापारियों की तिजोरियों में।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का स्वर्ण आयात करीब 72 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 58 अरब डॉलर था — अर्थात् एक वर्ष में लगभग 24 प्रतिशत की वृद्धि। यह वृद्धि चिंताजनक है क्योंकि इससे आयात और निर्यात के बीच की खाई और गहरी होती जा रही है।
किसी देश का विदेशी मुद्रा भंडार उसकी आर्थिक रोग-प्रतिरोधक क्षमता है , ठीक वैसे जैसे शरीर में श्वेत रक्त कणिकाएँ। जब यह भंडार सबल रहता है, तब रुपये की कमर नहीं टूटती, आयात सुचारु रहता है, और वैश्विक संकटों के झटके सहने की ताकत बनी रहती है।
ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के आंकड़ों के अनुसार भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इस समय करीब 690 अरब डॉलर है। वहीं फरवरी 2026 में यह 728 अरब डॉलर तक पहुँचा था, किंतु वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के कारण अप्रैल तक इसमें बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
लगभग 38 अरब डॉलर की यह गिरावट केवल दो महीनों में! और इसी समय सोने का आयात 72 अरब डॉलर का। यह संयोग नहीं, यह कार्य-कारण का सीधा संबंध है। सोने का आयात डॉलर में होता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा असर पड़ता है।
यदि देशवासी एक वर्ष तक सोना न खरीदें, तो इस एक निर्णय से 72 अरब डॉलर तक की विदेशी मुद्रा देश में रह सकती है। यह राशि हमारे विदेशी भंडार की गिरावट को रोकने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
अर्थशास्त्र में इसे “demand-side management” कहते हैं। जब किसी वस्तु की माँग घटती है तो उसका मूल्य भी घटता है। सोना डॉलर में खरीदा जाता है। इसलिए सोने की माँग घटने से डॉलर की माँग घटेगी, जिससे रुपये और डॉलर के बीच का अनुपात स्वाभाविक रूप से रुपये के पक्ष में सुधरेगा।यह उसी सिद्धांत पर आधारित है जिसे अर्थशास्त्री “विनिमय दर स्थिरीकरण” कहते हैं — किंतु यहाँ सरकार केंद्रीय बैंक का हथियार नहीं, जन-चेतना का अस्त्र उठा रही है।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि वर्ष 2026 में भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर 84.5 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है, जो देश की जी डी पी का लगभग दो प्रतिशत है। चालू खाता घाटा यह वह दर्पण है जो किसी राष्ट्र की आर्थिक निर्भरता को बेनकाब करता है। इसका अर्थ है कि देश में आने वाले डॉलर से अधिक डॉलर बाहर जा रहे हैं। और इस घाटे में सोने का योगदान कुल आयात का एक बड़ा हिस्सा है।यदि हम सोने की खरीद एक वर्ष के लिए स्थगित कर दें, तो चालू खाता घाटे में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। इससे रेटिंग एजेंसियाँ भारत को अनुकूल दृष्टि से देखेंगी, विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा, और दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित होगी।
विदेशी मुद्रा भंडार में स्वर्ण का हिस्सा मार्च 2026 तक बढ़कर 16.70 प्रतिशत हो गया है, जो सितंबर 2025 में 13.92 प्रतिशत था। यह वृद्धि दर्शाती है कि देश में सोने के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है — किंतु यह डॉलर से भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं करता। यदि वही धनराशि जो सोने में जाती है, म्यूच्युअल फंड में, लघु उद्योगों में, स्टार्टअप में, या स्वदेशी उत्पादों की खरीद में लगे — तो वह धन देश की सीमाओं के भीतर रहेगा, रोजगार सृजन करेगा, और गुणात्मक रूप से बढ़ेगा।
भारत के दो सबसे बड़े आयात हैं — कच्चा तेल और सोना। दोनों डॉलर में खरीदे जाते हैं। दोनों विदेशी मुद्रा भंडार को क्षीण करते हैं। यदि नागरिक दोनों मोर्चों पर संयम बरतें, तो यह दोहरी बचत राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी सिद्ध होगी।
कोई बात सोशल मीडिया की ही ही खी खी के लिए ही नहीं होती है। अपील इसलिए अनूठी और लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल है क्योंकि यह न कानून है, न जबरदस्ती, न जमा कराने का आग्रह — बल्कि नागरिकों की देशभक्ति और समझदारी पर विश्वास करते हुए की गई एक स्वैच्छिक अपील है। अपील में एक नैतिक शक्ति होती है जो नीतिगत आदेशों से भिन्न होती है। यह नागरिक चेतना को जगाती है, और चेतना जब जागती है तो दिशा स्वयं खोज लेती है।
(लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)




