लेखक-ओपी पाल
पश्चिम बंगाल की सत्ता में पहली बार भारतीय जनता पार्टी का आना और सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना राज्य के राजनीतिक इतिहास का एक बड़ा बदलाव है। सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार के सामने पुराने ढांचे को बदलने और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की कई गंभीर चुनौतियां हैं। जिसमें राजनीतिक हिंसा, अवैध घुसपैठ और अराजकता पर नियंत्रण करना सबसे अहम है। इसिलए बंगाल में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार सत्तासीन होना कोई फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों से भरा ताज है?
सुवेंदु सरकार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी जल्दी ‘बदले की राजनीति’ से ऊपर उठकर ‘बदलाव की राजनीति’ शुरू करते हैं। बंगाल की जनता अब केवल नारों से नहीं, बल्कि ठोस परिणामों से संतुष्ट होगी। यदि सुवेंदु अधिकारी कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने, युवाओं को रोजगार देने और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने में सफल रहते हैं, तो वे वास्तव में बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक नए स्वर्ण युग के सूत्रधार बन सकते हैं। मसलन सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार के लिए यह एक कठिन परीक्षा भी है और अपनी क्षमता सिद्ध करने का ऐतिहासिक अवसर भी साबित होगा? मसलन ‘सोनार बांग्ला’ का सपना तभी साकार होगा, जब बंगाल का आम आदमी खुद को सुरक्षित महसूस करेगा और उसे अपनी मिट्टी में ही उन्नति के अवसर मिलेंगे।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए युग की आहट सुनाई दे रही है। 34 साल के वामपंथी शासन और उसके बाद 15 वर्षों के ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वर्चस्व का अस्त करके, यदि भाजपा ने सत्ता की दहलीज पार की है और सुवेंदु अधिकारी जैसा कद्दावर नेता मुख्यमंत्री का पदभार संभालता है, तो यह केवल एक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक वैचारिक और प्रशासनिक ‘पुनर्जन्म’ की चुनौती होगी। हालांकि सुवेंदु सरकार के सामने चुनौतियां पहाड़ जैसी हैं, क्योंकि उन्हें केवल सरकार नहीं चलानी, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति को बदलना है जिसने बंगाल की पहचान को पिछले कई दशकों से जकड़ रखा है। इतिहास गवाह है कि बंगाल की राजनीति का इतिहास रक्त रंजित रहा है। यहाँ सत्ता परिवर्तन का अर्थ अक्सर विपक्षी कार्यकर्ताओं के दमन से लगाया जाता है। सुवेंदु सरकार के लिए पहली और सबसे कठिन चुनौती इस ‘हिंसक संस्कृति’ को जड़ से मिटाना भी है। कैडर आधारित हिंसा पर रोकने की दिशा में कानून व्यवस्था दुरस्थ करना जरुरी है, क्योंकि बंगाल में राजनीतिक दल चुनाव के बाद भी अपने कैडर के माध्यम से जमीनी नियंत्रण बनाए रखते हैं, जो अक्सर झड़पों का कारण बनता है और इस बार भी सबने देखा है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जो कि अब मुख्य विपक्षी दल है और अन्य वामपंथी दलों के मजबूत धरातलीय कैडर के साथ तालमेल बिठाना तथा राजनीतिक प्रतिशोध की भावना को खत्म कर शांति बहाल करना भाजपा सरकार के सामने किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होगी। सुवेंदु अधिकारी, जो स्वयं कभी टीएमसी के जमीनी शिल्पकार रहे हैं, उनके लिए यह एक व्यक्तिगत चुनौती होगी, कि वे बिना किसी प्रतिशोध के शांति बहाल करें। यदि राजनीतिक प्रतिशोध की भावना जारी रही, तो ‘सोनार बांग्ला’ का सपना हिंसा की भेंट चढ़ जाएगा।
- प्रशासनिक ढांचा और पुलिस का गैर-राजनीतिकरण
पश्चिम बंगाल में प्रशासन पर ‘पार्टी तंत्र’ के हावी होने के आरोप लगते रहे हैं। पुलिस प्रशासन की निष्पक्षता बहाल करना सुवेंदु सरकार की दूसरी बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए राज्य की पुलिस और नौकरशाही को यह विश्वास दिलाना होगा कि वे किसी दल के नहीं, बल्कि संविधान के प्रति उत्तरदायी हैं। पुलिस थानों को राजनीतिक दफ्तरों के प्रभाव से मुक्त करना अनिवार्य है। यानी अधिकारियों में निष्पक्षता, पारदर्शिता और कानून के प्रति जवाबदेही स्थापित करना एक बड़ी चुनौती है। वहीं भ्रष्टाचार पर नकेल (कट-मनी संस्कृति) कसनी होगी, क्योंकि बंगाल की स्थानीय राजनीति में ‘कट-मनी’ (सरकारी योजनाओं के लाभ के बदले कमीशन) एक गहरे नासूर की तरह फैल चुका है। सुवेंदु सरकार को एक पारदर्शी तंत्र विकसित करना होगा, जहाँ योजनाओं का पैसा सीधे लाभार्थी के बैंक खातों (डीबीटी) में पहुँचे, जिससे बिचौलियों का प्रभाव खत्म हो सके।
- सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक न्याय
बंगाल एक संवेदनशील सीमावर्ती राज्य है। यहाँ की जनसांख्यिकी और सामाजिक ताने-बाने को सुरक्षित रखना सरकार की बड़ी जिम्मेदारी होगी। घुसपैठ पर नियंत्रण करते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए केंद्र के साथ मिलकर सख्त कदम उठाने होंगे। नए सीएम सुवेंदु अधिकारी को यह साबित करना होगा कि उनकी सरकार किसी धर्म या जाति विशेष की नहीं, बल्कि हर बंगाली की सरकार है। अल्पसंख्यकों के मन से डर निकालकर उन्हें विकास की मुख्यधारा में शामिल करना उनके नेतृत्व की सफलता तय करेगा।
- आर्थिक पुनरुद्धार और औद्योगिक क्रांति
बंगाल जो कभी भारत की औद्योगिक राजधानी था, आज वहां से युवाओं का पलायन एक गंभीर समस्या है। सुवेंदु सरकार को ‘इन्वेस्ट बंगाल’ के नारे को हकीकत में बदलना होगा। बंद कारखानों का पुनरुद्धार करने की दिशा में नई सरकार को हावड़ा, हुगली और दुर्गापुर-आसनसोल बेल्ट में बंद पड़ी जूट मिलों और इंजीनियरिंग फैक्ट्रियों को फिर से शुरू करने के लिए विशेष पैकेज और नीतिगत बदलाव की आवश्यकता है। वहीं आईटी और सेवा क्षेत्र में कोलकाता को बेंगलुरु या हैदराबाद की तर्ज पर आईटी हब के रूप में विकसित करना होगा। इसके लिए भूमि अधिग्रहण की नीतियों को उद्योग-अनुकूल बनाना और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में सुधार करना होगा। जब तक राज्य में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा नहीं होंगे, तब तक युवाओं का पलायन नहीं रुकेगा। लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) को प्रोत्साहन देना इस दिशा में क्रांतिकारी कदम हो सकता है।
- कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कायाकल्प
बंगाल एक कृषि प्रधान राज्य है, लेकिन यहाँ का किसान आज भी बिचौलियों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। आलू और धान की बम्पर पैदावार के बावजूद भंडारण की कमी के कारण किसान औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं। सरकार को हर ब्लॉक स्तर पर कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स की स्थापना करनी होगी। कृषि और किसान कल्याण के लिए राज्य के ग्रामीण और कृषि आधारित क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाना और मंडियों की व्यवस्था को पारदर्शी बनाना आर्थिक मोर्चे पर परीक्षा होगी। वहीं कृषि उपज मंडियों में पारदर्शिता लाकर किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाना आर्थिक मोर्चे पर बड़ी परीक्षा होगी। केंद्र की किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: व्यवस्था का शुद्धिकरण
जनता की बुनियादी सुविधाओं में स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था की दृष्टि से सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव और शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार को मिटाकर नई और पारदर्शी नीतियां लागू करके पारदर्शी व्यवस्था अपनानी होगी। हाल के सालों में शिक्षा भर्ती घोटालों ने भी बंगाल की साख को भारी ठेस पहुँचाई है। इसलिए सुवेंदु सरकार को शिक्षक भर्ती और अन्य सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता लाने के लिए डिजिटल और योग्यता-आधारित तंत्र बनाना होगा ताकि मेधावी युवाओं का विश्वास बहाल हो सके। वहीं स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार पर ध्यान देना होगा। यहां सरकारी अस्पतालों में आधुनिक सुविधाओं का अभाव और ‘रेफरल कल्चर’ ग्रामीण जनता के लिए अभिशाप है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं को राज्य में प्रभावी ढंग से लागू कर गरीबों को मुफ्त इलाज की सुविधा देना अनिवार्य है।
- बुनियादी ढांचा और जन-कल्याणकारी योजनाएं
बंगाल ग्रामीण क्षेत्रों में पक्की सड़कें, 24 घंटे बिजली और हर घर नल से जल पहुँचाना भाजपा सरकार के लिए सुशासन की कसौटी होगी। खासकर उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल के बीच की दूरी को कम करने के लिए एक्सप्रेस-वे और बेहतर रेल कनेक्टिविटी पर ध्यान देना होगा। सिलीगुड़ी को पूर्वोत्तर भारत के प्रवेश द्वार के रूप में और अधिक विकसित करने की आवश्यकता है। वहीं कल्याणकारी योजनाओं का सही वितरण करने की व्यवस्था के तहत भाजपा सरकार को यह साबित करना होगा कि केंद्र और राज्य की जन-कल्याणकारी योजनाएं (जैसे राशन, आवास योजना, पेंशन) बिना किसी भेदभाव और भ्रष्टाचार के सीधे अंतिम पायदान तक पहुंचें। इसी प्रकार पर्यटन के क्षेत्र में सुंदरबन, दार्जिलिंग और दीघा जैसे पर्यटन स्थलों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विपणन कर राज्य के राजस्व को बढ़ाया जा सकता है।

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं)

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