★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★
{वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति ने ख़ुफ़िया अधिकारियों को ये काम इसलिए सौंपा है ताकि काबुल हवाई अड्डे से लोगो को निकालने का प्रयास हो सके सफ़ल}
♂÷अमेरिका खुफिया एजेंसी सीआईए के प्रमुख विलियम जे बर्न्स और तालिबान के नेता अब्दुल गनी बरादर की काबुल में गुप्त बैठक हुई. वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित खबर के मुताबिक अफगानिस्तान पर कब्जा करने के करीब एक हफ्ते के बाद दोनों वर्गों की आमने-सामने की ये पहली उच्च स्तरीय बैठक थी. अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने शीर्ष जासूस और विदेश सेवा के पूर्व अनुभवी अधिकारी को ये काम इसलिए सौंपा है ताकि काबुल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से लोगों को निकालने का प्रयास सफल हो सके, जिसे हाल ही में राष्ट्रपति ने इतिहास का अभी तक का सबसे बड़ा और मुश्किल एयरलिफ्ट करार दिया था.
हालांकि सीआईए ने इस बैठक को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, बस रिपोर्ट से ये मालूम चला है कि चर्चा में अमेरिकी सेना के लिए तय की गई 31 अगस्त की समय सीमा, अमेरिकी और उनका समर्थन करने वाले अफगान सहयोगियों को एयरलिफ्ट की बात शामिल किए जाने की संभावना है.
बाइडन प्रशासन पर उनके कुछ सहयोगियों ने देश में 31 अगस्त के बाद भी अमेरिकी सेना को रखने का दबाव बनाया हुआ है ताकि वहां फंसे लाखों अमेरिकी और दूसरे पश्चिमी देशों के नागरिकों को तालिबान के चंगुल से निकाला जा सके. इस बात को लेकर जी-7 देशों ( ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, और अमेरिकी ) की वर्चुअल मीटिंग होनी है जिसमें ब्रिटिश के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन से समयसीमा को बढ़ाए जाने की मांग करने अपेक्षा की जा रही है.
हालांकि तालिबान प्रवक्ता ने अमेरिका और ब्रिटेन को चेतावनी देते हुए कहा था कि अमेरिकी सेना को युद्धरत देश से वापस बुलाने की 31 अगस्त की समयसीमा बढ़ाए जाने के गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं.
2018 में रिहा होने से पहले पाकिस्तान जेल में 8 साल गुजार चुके बरादर ने कतर में अमेरिका के साथ हुई शांति वार्ता में तालिबान के मुख्य वार्ताकार की भूमिका निभाई थी. उसी की बदौलत अमेरिकी सेना की वापसी को लेकर ट्रंप के साथ समझौता हुआ था. वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक ऐसा माना जाता है कि तालिबान के संस्थापक सुप्रीम लीडर मुहम्मद ओमार के करीबी दोस्त बरादर का तालिबान पर अच्छा खासा प्रभाव है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि तालिबान के हमलों को रोकने की चिंताओं के बीच बर्न्स ने इस साल के अप्रैल में अफगानिस्तान की ऐसी ही अघोषित यात्रा की थी. बतौर निदेशक बर्न्स एक जासूसी संस्था की देखरेख करते हैं जिसने अफगान के विशेष सैन्य दल के प्रशिक्षण का काम किया था.






















