लेखक~ओमप्रकाश तिवारी
♂÷“ हम जब पढ़ते थे…मिडिल में, हाईस्कूल में, तो हमारे टीचर हमसे पूछते थे, विच वर आवर फेवरिट हीरो ? यानी आपका फेवरिट लीडर कौन है ? हम लोग उस समय, जिसको सुभाषचंद्र बोस अच्छे लगे, जिसको जवाहरलाल नेहरू अच्छे लगे, या जिनको गांधी जी अच्छे लगते थे, उन्हें अपना हीरो बताते थे। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि कोई आपसे पूछे की हू इस योर आइकन, हू इस योर फेवरिट हीरो, तो आपको बाहर जाने की कोई जरूरत नहीं है। यहीं महाराष्ट्र में आपको मिल जाएंगे। शिवाजी तो पुराने युग की बात हैं, नए युग की बात बोल रहा हूं, यहीं मिल जाएंगे डॉक्टर आंबेडकर से लेकर नितिन गडकरी तक, यहीं मिल जाएंगे आपको आपके आइकन।”
अक्षरशः यही बोले थे उस दिन औरंगाबाद में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी, जिस पर आज पूरे महाराष्ट्र में बवाल मचा हुआ है, और उन्हें हटाने की मांग की जा रही है। इस पूरे वक्तव्य को कई बार सुना जा सकता है (यू ट्यूब पर), और कई बार पढ़ा जा सकता है। जिन विद्वानों को हिंदी और मराठी का समान ज्ञान हो, उन्हें भी सुनवाकर और पढ़वाकर जांचा जा सकता है कि राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी ने मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज का अपमान कैसे किया ? निश्चित रूप से हिंदी और मराठी के कुछ शब्दों के प्रयोग में अक्सर भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। लेकिन यहां तो राज्यपाल ने जो कहा उसमें कहीं भी छत्रपति शिवाजी महाराज के अपमान का तनिक भी बोध नहीं हो रहा है। उन्होंने ऐसा तो कहीं नहीं कहा कि शिवाजी पुराने युग की बात हैं, उन्हें मानना छोड़ दिया जाए। उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज के विचारों को न मानने की बात भी कहीं नहीं कही है। हां, नए युग के कुछ आदर्शों के नाम जरूर गिना दिए हैं। उनमें एक नाम बाबासाहब आंबेडकर का है, तो दूसरा नितिन गडकरी का। तो क्या बाबासाहब आंबेडकर आज के युग के ‘आइकन’ नहीं हैं ? उलटे राज्यपाल ने तो अपने वक्तव्य में यह कहते हुए महाराष्ट्र की प्रशंसा ही की है कि महाराष्ट्रवासियों को अपना आदर्श तलाशने के लिए बाहर देखने की जरूरत ही नहीं है। यहां पर अनेक आदर्श मौजूद हैं। जैसा कि राज्यपाल ने कहा कि हमारे जमाने में किसी को सुभाषचंद्र बोस पसंद थे, किसी को जवाहरलाल नेहरू, तो किसी को महात्मा गांधी। उसी प्रकार आज भी कोई लता मंगेशकर को अपना आदर्श मानता है, तो कोई सचिन तेंदुलकर को। राज्यपाल ने कहां कहा है कि आप छत्रपति शिवाजी महाराज को छोड़कर लता जी और सचिन तेंदुलकर को अपना आदर्श मानिए !
लेकिन ये सियासत है। इसमें सारे निर्णय सियासी नफे-नुकसान को लेकर किए जाते हैं। मंदिर में टीके से लेकर रमजान में टोपियां तक सियासी नफा-नुकसान देखकर ही लगाई जाती हैं। महाराष्ट्र में सिर्फ 15 दिन पीछे की घटनाओं पर नजर दौड़ाएं तो समझना मुश्किल नहीं होगा कि आज राज्यपाल को उनके एक बयान पर घेरने की कोशिशें क्यों हो रही हैं ? अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब सातारा के प्रतापगढ़ किले के मुहाने पर बनी अफजल खान की कब्र पर अतिक्रमण करके उसे शानदार मजार का रूप देने की कोशिशों को बाकायदा उच्चन्यायालय के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया। यह मामला एक दशक से ज्यादा समय से टलता आ रहा था। बीजापुर के आदिलशाही वंश के सेनापति रहे अफजल खान की छत्रपति शिवाजी से मुलाकात सातारा के प्रतापगढ़ किले के नीचे हुई थी। वहीं छत्रपति शिवाजी ने अपने बघनखे से लंबे-तगड़े अफजल खान का पेट फाड़कर उसका वध कर दिया था। वध करने के बाद उसका सिर तो शिवाजी ने तोप के गोले से उड़वा दिया था, और जहां उसका वध किया था, उसके निकट ही उसकी कब्र भी बनवा दी थी। लगभग 20 वर्ष पहले तक प्रतापगढ़ किले की सीढ़ियों के निकट बनी यह कब्र छत्रपति शिवाजी की वीरता और साहस की गाथा सुनाती प्रतीत होती थी। लेकिन आसपास के गांवों में रहनेवालों का कहना है कि सन् 2000 के बाद अफजल खान की कब्र का सुंदरीकरण शुरू कर दिया गया। उसके ऊपर न सिर्फ एस्बेस्टस शीट का छत्र लगा दिया गया, बल्कि उस छत्र के अंदर मौलानाओं के लिए कमरे तक बना दिए गए थे। कहा जाता है कि इन कमरों में रहनेवाले मौलाना प्रतापगढ़ किले की ओर जानेवाले पर्यटकों को अफजल खान की वीरता की गाथा तक सुनाने लगे थे। कब्र के सौंदर्यीकरण के लिए किया गया अतिक्रमण 10 नवंबर की उसी तिथि को ध्वस्त किया गया, जिस तिथि को छत्रपति शिवाजी ने अफजल खान का वध किया था। इस तिथि को महाराष्ट्र में ‘शिव प्रताप दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। जाहिर है, शिंदे सरकार के कार्यकाल में हुआ यह काम छत्रपति शिवाजी को माननेवालों के बीच उसकी साख बढ़ानेवाला ही था। दूसरी ओर जिन सरकारों के कार्यकाल में कब्र का मजार के रूप में सुंदरीकरण चलता रहा, उनकी साख घटानेवाला। इसलिए शिंदे सरकार की यही उपलब्धि आज राज्यपाल कोश्यारी के एक वाक्य पर भारी पड़ रही है।
बवाल का दूसरा कारण है कांग्रेस नेता राहुल गांधी का ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान सावरकर पर दिया गया बयान। सावरकर महाराष्ट्र के थे, और महाराष्ट्र में उनका विशेष सम्मान भी है। ऐसे में महाराष्ट्र में ही आकर उनके विरुद्ध बयान देने का कुछ तो विशेष उद्देश्य रहा होगा राहुल गांधी का। लेकिन पासा तब उलटा पड़ गया, जब राहुल के बयान पर घिरने लगे उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे। कहां उद्धव के पिता स्वर्गीय बालासाहब ठाकरे सावरकर को अपना ‘आइकन’ मानते रहे, कहां बालासाहब के ही पौत्र सावरकर को भला-बुरा कहनेवालों के गले लग रहे हैं आजकल। जब भाजपा ने इस मुद्दे पर शिवसेना को घेरना शुरू किया, तो उसके प्रवक्ता संजय राउत की ओर से बयान आ गया कि राहुल का सावरकर पर दिया गया बयान महाविकास आघाड़ी में दरार डाल सकता है। लेकिन यह मसला तूल पकड़ पाता, उससे पहले ही बिल्ली के भाग्य से छींका फूट गया। यानी राज्यपाल महोदय का वह बयान आ गया, जिसपर आजकल बवाल मचा हुआ है।

÷लेखक दैनिक जागरण के महाराष्ट्र राज्य के ब्यूरो इन चीफ हैं÷
(साभार दैनिक जागरण से)






















