【म्यांमार में लोकतंत्र फ़िर लथपथ】

【म्यांमार में लोकतंत्र फ़िर लथपथ】

लेखक~अरविंद जयतिलक

♂÷म्यांमार की सेना ने लोकतंत्र को फिर रौंद दिया है।स्टेट काउंसलर और लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू की समेत कई बड़े महत्वपूर्ण नेताओं की गिरफ्तारी व नजरबंदी के बाद म्यांमार में फौजी बूटों की हलचल बढ़ गई है। सेना का कहना है कि चूंकि चुनाव में धोखाधड़ी हुई है लिहाजा देश में आपातकाल लगाना पड़ा है।जबकि सच्चाई यह है कि सेना के पास चुनावी धोखाधड़ी का एक भी सबूत नहीं है।उल्लेखनीय है कि गत वर्ष नवंबर में हुए चुनाव में आंग सांग सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी)को जबरदस्त सफलता मिली। एनएलडी ने संसद की निचले और ऊपरी सदन के कुल 476 सीटों में से 396 सीटों पर बड़ी जीत दर्ज की।गौर करें तो यह आंकड़ा बहुमत के आंकड़े 322 से कहीं अधिक है ,लेकिन सेना को यह रास नहीं आया और उसने अपने अधिकारों का वेजा इस्तेमाल कर आपातकाल थोप दिया।यहाँ जानना आवश्यक है कि 2008 के सैन्य मसौदा संविधान के तहत कुल सीटों का 25% सीटे सेना को आरक्षित हैं। देखें तो मैं म्यांमार में तख्तापलट सिर्फ उसके लिए ही नहीं बल्कि भारत के सामरिक व आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से भी अनुकूल नहीं है।इसलिए कि म्यांमार का सैन्य शासन और चीन की नजदीकी किसी से छिपी नहीं है। यह संभव है कि चीन,म्यांमार की फौजी हुकूमत के बूते भारतीय हितों को प्रभावित करने की कोशिश करें।भारत की “लुक ईस्ट” नीति की कामयाबी म्यांमार के साथ आपसी संबंधों पर निर्भर है जो फिलहाल सही दिशा में चल रही है।म्यांमार होकर ही भारत दूसरे दक्षिण एशियाई देशों के साथ संपर्क मजबूत करने में सफल हुआ है।

IMG 20210208 WA0003

इसके अलावा पूर्वोत्तर में उग्रवाद पर काबू पाने में भी म्यांमार की लोकतांत्रिक सरकार का भारत को पूरा समर्थन रहा है।ऐसे में मौजूदा सैन्य शासन भारतीय हितों का कितना ख्याल रखेगा या कहना मुश्किल है। बहरहाल म्यांमार की जनता को धन्यवाद देना होगा कि उसने लोकतंत्र की आस नहीं छोड़ी है,उसे जब भी लोकतंत्र को मजबूत करने का मौका मिला है, उस कसौटी पर वह खरी उतरी है। यह विश्वास और भरोसा दिखाता कि म्यांमार में लोकतंत्र की सुबह जरूर होगी। गौर करें तो सैन्य शासकों के प्रतिबंध के दरमियान 30 सालों में तीसरा मौका है जब जनता ने अपने वोट के जरिए लोकतंत्र को ताकत दी थी, इससे पहले 2015 के चुनाव में जनता ने लोकतंत्र का वरण किया। उस समय आंग सान सू की, की पार्टी ने 664 सदस्य वालों संसद की सीटों में से 348 सीटें अपनी झोली में डाले,म्यामार की जनता ने सू की को देश का महान नेता बना दिया।5 साल बाद जब चुनाव हुए तो लगा के म्यांमार में लोकतंत्र के नींव मजबूत हो गई है लेकिन सेना ने लोकतंत्र को परवान चढ़ने से पहले रौंद दिया। जबकि अपने 5 साल के कार्यकाल में सू की ने सेना को नाराज करने की तनिक भी कोशिश नहीं की थी। रोहिंग्या मुसलमानों के सैन्य उत्पीड़न पर जमकर बचाव किया।2019 में सू की ने अपनी सरकार की ओर से गवाही देने के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय हेग भी गई। वहां उन्होंने सैन्य शासन द्वारा रोहिंग्या उत्पीड़न व आतंकवाद विरोधी सफाई अभियान कहकर बचाव किया।लेकिन देखें तो सेना के प्रति उनकी नरमी भी काम नहीं आई।जबकि सेना के उत्पीड़न के बचाव में खड़े होने से वैश्विक स्तर पर उनकी छवि धूमिल हुई है। लोकतंत्र की जीवंत समर्थक होने के नाते ही अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उनके साथ खड़ा हुआ था, जिसके दबाव में सेना को नवंबर 2010 में उन्हें नजरबंदी से रिहा करना पड़ा।27 मई 1990 को सू की पार्टी ने आम चुनाव में हिस्सा लिया उस समय भी उनकी पार्टी ने तकरीबन 80 फीसद सीटों पर जीत दर्ज की,किंतु तब भी सेना ने जनतंत्र के फैसले का सम्मान नहीं किया।सू की को सत्ता सौंपने बजाय नजरबंद कर दिया। विश्व समुदाय हैरान रह गया म्यांमार के फौजी तंत्र को जवाब देना मुश्किल हो गया कि जब जनादेश का सम्मान ही नहीं करना था तो चुनाव फिर क्यों कराया।तब विश्व के कई देशों ने म्यांमार पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। सेना की लोकतंत्र विरोधी हरकतों को देखते हुए अमेरिका ने म्यांमार पर आर्थिक प्रतिबंध की चेतावनी दे दी।अब सेना द्वारा कहा जा रहा है कि 1 वर्ष बाद चुनाव कराया जाएगा जीतने वाली पार्टी को सत्ता की बागडोर सौंप दी जाएगी। लेकिन इस बात की क्या गारंटी की उस चुनाव में भी सेना 1990 के चुनाव की तरह मनमानी नहीं करेगी। गौरतलब है कि तब के चुनाव में सेना ने जमकर मनमानी की थी, तब अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी चुनाव में हुई धांधली का जमकर उल्लेख किया था।चुनाव में उम्मीदवारों को वोटरलिस्ट तक मुहैया नहीं कराया गया। चुनाव सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिए गए,पूरी मीडिया सेना के नियंत्रण में थी। 2008 का नया संविधान जो कि लोकतंत्र की भावनाओं के प्रतिकूल था और जनता द्वारा उसका बहिष्कार भी किया गया, सैन्य तंत्र द्वारा जबरन लागू किया गया। इस जनविरोधी संविधान के प्रावधानों के मुताबिक संसद की एक चौथाई सीटें फौजी हुकूमत द्वारा भर दी गई।यही नहीं करीब 8 दर्जन सीटों पर केवल एक ही उम्मीदवार का नामांकन स्वीकार किया गया। यहां तक कि सभी निर्दलीय उम्मीदवार सेना समर्थित थे,उस समय जो दो सबसे बड़े दल थे उसमें एक थीन सीन की नेतृत्व वाली यूएसडीपी थी जिसे सेना का समर्थन हासिल था और दूसरी नेशनल यूनिटी पार्टी जिसके नेता उप सेनापति तुनयी थे। सैन्य प्रशासकों के स्थान पर सेना समर्थित थीन सीन की सरकार अस्तित्व में आई और फौजी बूटों की धमक कायम रही। इस बात की क्या गारंटी कि अगले चुनाव में सेना का हस्तक्षेप नहीं होगा।उचित तो यह होता कि सेना चुनावी नतीजों और जनमत का सम्मान करती लेकिन उसने ऐसा ना कर सवाल पैदा कर दिया है।आखिर फौजी हुकूमत जनादेश का सम्मान करना कब सीखेंगे नागरिक अधिकारों के प्रति कब संवेदनशील होंगे। अब तो ऐसा प्रतीत होने लगा है कि म्यांमार के भाग में बदकिस्मती ही बदी है अन्यथा लोकतंत्र की ठंडी बयार,को सेना की तपिश से झुलसा नहीं दिया जाता।
सच कहे तो म्यांमार आज अपने ऐतिहासिक जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में है उसकी ऐतिहासिक सांस्कृतिक छाप लगातार धूमिल पड़ रही है। वित्तीय दशा अत्यधिक खराब है और खजाना पूरी तरह खाली हो चुका है, आज भी म्यांमार विश्व के सबसे दरिद्रतम देशों में से एक है, उसकी वित्तीय दशा कितनी खराब है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वहां प्रति व्यक्ति आय भारत के प्रति व्यक्ति आय के आधे से भी कम है,यानी भारत में मनरेगा कार्यक्रम के तहत काम करने वाले लोगों से भी कम है। कभी म्यांमार उपजाऊ भूमि के लिए जाना जाता था दूसरे देशों को चावल निर्यात करता था, लेकिन आज उसकी अर्थव्यवस्था रसातल में है बदहाल कृषि के कारण चावल तक का आयात करना पड़ रहा है।म्यांमार सागौन के लकड़ियों के लिए दुनिया भर में विख्यात है लेकिन उसकी तस्करी चरम पर है, कच्ची अफीम के उत्पादन से उसकी आय जरूर बड़ी है लेकिन उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है।यानी देश के नौजवान नशाखोरी के लती बनते जा रहे हैं परिवार में विघटन बढ़ रहे हैं और समाज अराजकता की ओर बढ़ रहा है।इन सभी समस्याओं का जड़ म्यामार का सैन्य शासन है जो लोकतंत्र पर कुंडली मार कर बैठा है।म्यांमार के सैन्य प्रशासकों को समझना होगा कि लोकतंत्र के उदार व्यवस्था में ही विकास की अवधारणाएं पल्लवित पुष्पित होती हैं,कृषि उद्योग धंधों का विकास तभी होगा जब वहां निवेश बढ़ेगा।किंतु यह तभी संभव होगा जब म्यांमार का सैन्य प्रशासन अपनी फौजी खोल उतार कर लोकतंत्र की जमीन उर्वर करेगा।बेहतर होगा कि म्यांमार का सैन्य प्रशासन मौजूदा जनादेश का सम्मान कर लोकतंत्र को बहाल करें।

IMG 20210208 WA0004 878x1024

÷लेखक राजनीतिक विश्लेषक व विदेशी मामलों के ज्ञाता हैं÷

Mukesh Seth

Chief Editor

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *