लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷यह उचित है कि सर्वोच्च अदालत ने हिंदुओं के लिए अल्पसंख्यक दर्जे की मांग से जुड़े मसले पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर दिया है। अदालत ने दो टूक कहा है कि देश में धार्मिक व भाषाई समुदायों के अल्पसंख्यक दर्जा का सवाल राज्य स्तर पर निर्धारित होना चाहिए। इसलिए कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में समुदायों की स्थिति और संख्या अलग-अलग है। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय स्तर पर किसी एक भाषा बोलने वालों को बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक तय किया जाना न्यायपरक नहीं होगा। गौर करें तो सर्वोच्च अदालत का यह दो टूक स्पष्टीकरण अल्पसंख्यक दर्जे तय किए जाने के विवाद पर विराम लगा दिया है। गौर करें तो सर्वोच्च अदालत का यह इंसाफ इस मायने में महत्वपूर्ण है कि देश में अल्पसंख्यक समुदाय से इतर हिंदु समुदाय को ही देखें तो देश के कई राज्यों में उनकी संख्या बहुत कम है। यानी वे वहां अल्पसंख्यक हैं। ऐसे में उन्हें अल्पसंयक का दर्जा और उससे जुड़ी सुविधाएं व अधिकार मिलना ही चाहिए। यहां जानना आवश्यक है कि भाजपा नेता अश्वनी उपाध्याय ने सर्वोच्च अदालत में याचिका दायर कर कहा था कि देश के दस राज्यों मसलन लद्दाख, मिजोरम, लक्षद्वीप, कश्मीर, नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल, पंजाब और मणिपुर में हिंदू अल्पसंख्यक हैं लेकिन वहां हिंदुओं की जगह स्थानीय बहुसंख्यक समुदायों को ही अल्पसंख्यक हितैषी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। अल्पसंख्यक दर्जा नहीं मिलने से यहां यहूदी, बहाई और हिंदू धर्म के लोग अपने संस्थानों को अल्पसंख्यक संस्थान के तौर पर संचालित नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने 1993 में जारी केंद्र सरकार के नोटिफिकेशन को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित करने की मांग करते हुए याचिका में राज्य की जनसंख्या के आधार पर अल्पसंख्यकों की पहचान करने और दिशा तय करने की मांग की थी। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग अधिनियम 2004 की धारा-2 (एफ) को भी चुनौती दी थी जिसमें कहा गया था कि यह धारा केंद्र को असीमित शक्ति प्रदान करती है लिहाजा शीर्ष अदालत केंद्र सरकार को आदेश दे कि इन राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित करे। तब केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि अल्पसंख्यकों को अधिसूचित करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है और इस संबंध में कोई भी निर्णय राज्यों एवं अन्य हितधारकों के साथ चर्चा के बाद लिया जाएगा। याद होगा गत माह पहले केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत में एक हलफनामा दायर कर कहा था कि जिन राज्यों में हिंदुओं की संख्या कम है वहां की सरकारें उन्हें अल्पसंख्यक घोषित कर सकती है। तब केंद्र सरकार ने उदाहरण देते हुए कहा था कि जैसे महाराष्ट्र ने 2016 में यहूदियों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया था वैसे ही राज्य भाषाई या धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकते हैं। कर्नाटक राज्य ने उर्दू, तेलुगू, मलयालम, मराठी, तुलू, लमानी, हिंदी, कोंकणी और गुजराती को अपने राज्य में अल्पसंख्यक भाषााओं का दर्जा दिया था। लेकिन गौर करें बाद में केंद्र सरकार का रुख बदल गया। उसने पहले अल्पसंख्यकों के पहचान का अधिकार राज्यों के पास बताया और बाद में कहा कि यह अधिकार उसके पास है। केंद्र सरकार के इस बदलते रुख से शीर्ष अदालत का नाराज होना लाजिमी था, लिहाजा उसने दो टूक कहा कि वह तीन महीने के दरम्यान राज्य सरकारों से विचार-विमर्श कर अपना रुख स्पष्ट करे। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून 1992 की धारा 2 (सी) के अंतर्गत केंद्र सरकार ने 1993 में देश में पांच समुदायों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया था जिनमें मुस्लिम, सिख, बौद्ध, पारसी और ईसाई शामिल हैं। अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने से जुड़े मामले में टीएमए पई फाउंडेशन मामला भी इस मसले पर काफी रोशनी डालता है। इस मुकदमें में 2002 में शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाते हुए अनुच्छेद 30 का व्याख्या किया था और कहा था कि इसका उद्देश्य जो अल्पसंख्यकों को धार्मिक व भाषाई आधार पर शिक्षण संस्थानों की स्थापना करने और उनके संचालन का अधिकार देता है उस पर राज्यों को गौर फरमाना चाहिए। गौरतलब है कि इसी को आधार बनाते हुए हिंदुओं को उनकी कम आबादी वाले राज्यों में अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने की मांग याचिका में की गयी थी। लेकिन मसला सिर्फ यहीं तक नहीं है। याचिका में अल्पसंख्यक दर्जा देने वाले कानून को भी खत्म करने की मांग की गयी थी। याचिका में कहा गया था कि चूंकि राज्यों की मान्यता भाषाई आधार पर हुई है, ऐसे में अल्पसंख्यक का दर्जा राज्यवार होना चाहिए न कि देश के लेवल पर। याचिका के जरिए तर्क दिया गया कि अल्पसंख्यक आयोग समानता के आधार उलंधन है और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग कानून 1992 या राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान कानून 2004 को नागरिकों के बीच समानता के मौलिक अधिकार का विरोधी है। लेकिन केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यकों में सिर्फ वंचित तबकों को ही योजनाओं का लाभ दिया जाता है। इस तरह अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम 1992 संविधान के किसी भी प्रावधान का उलंघन नहीं है। केंद्र सरकार का तर्क यह भी रहा कि कोई समुदाय धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने भर से सरकारी योजनाओं का स्वतः हकदार नहीं हो जाता। बल्कि योजनाएं उस समुदाय के आर्थिक और सामाजिक रुप से वंचित तबकों के लिए होती है। गौरतलब है कि अल्पसंख्यक हितैषी ज्यादतर योजनाओं में नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में आरक्षण की सुविधा शामिल नहीं है। बल्कि इसका मकसद लक्षित अल्पसंख्यक समुदाय का शैक्षणिक स्तर और रोजगार और कौशल विकास में इनकी भागीदारी बढ़ाना होता है। केंद्र सरकार का तर्क यह भी रहा कि सिर्फ राज्य सरकारों को ही किसी समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। क्योंकि ऐसा हुआ तो फिर शीर्ष अदालत के कई निर्णय प्रभावित हो सकते हैं। तब शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को ताकीद किया कि वह राज्य व हितधारकों से विचार-विमर्श कर शीध्र अपना रुख स्पष्ट करे। अब चूंकि सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि देश में धार्मिक और भाषाई समुदायों के अल्पसंख्यक दर्जा राज्य स्तर पर तय होना चाहिए ऐसे में आवश्यक होगा कि राज्य सरकारें अपनी महती जिम्मेदारी का निर्वहन करें। अब उम्मीद किया जाना चाहिए कि हिंदुओं की कम आबादी वाले 10 राज्यों में उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा मिल जाएगा और वे वहां अपने मुताबिक शिक्षण-संस्थाओं को मूर्त रुप देकर संचालित कर सकेंगे। इसके अलावा राज्यों द्वारा अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली सहुलियतें और राज्य संचालित कल्याणकारी योजनाओं के भी वे हकदार हो जाएंगे। ऐसा होना इसलिए भी आवश्यक है कि भारतीय संविधान सबको बराबरी का हक देता है और किसी के साथ भेदभाव नहीं हो सकता। यह तथ्यात्मक सच्चाई भी है कि देश के कई राज्यों में हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक है। आंकड़ों पर गौर करें तो जम्मू-कश्मीर में हिंदू आबादी महज 28.44 फीसदी है और उन्हें अल्पसंख्यक होने का कोई लाभ नहीं मिल रहा है। लद्दाख में हिंदू समुदाय की आबादी महज 12.11 फीसदी है। इसी तरह देश के पूर्वी राज्य नागालैंड में हिंदू आबादी 8.75 फीसदी, मेघालय में 11.53 फीसदी, अरुणाचल में 29.04 फीसदी और मिजोरम में 2.75 फीसदी है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिर्फ मणिपुर में हिंदू आबादी बेहतर स्थिति में है। यहां उनकी आबादी 41.39 फीसदी है। देश के दक्षिणी हिस्से लक्षद्वीप में हिंदू आबादी महज 2.77 फीसदी है। पंजाब में भी हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक है। यहां हिंदुओं की आबादी महज 39 फीसदी के आसपास है। गौर करें तो जिन राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक है उनमें से कई राज्यों में उनकी जनसंख्या वृद्धि की दर भी बहुत कम है। नागालैंड में वृद्धि दर नकारात्मक है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2001 से वर्ष 2011 के बीच जहां पूरे देश में हिंदुओं की आबादी में 16.8 फीसदी की वृद्धि हुई वहीं केरल में मात्र 4.9 फीसदी और लक्षद्वीप में सिर्फ 6.3 फीसदी रही। जनसांख्यिकीय लिहाज से यह ठीक नहीं है। उचित होगा कि सर्वोच्च अदालत द्वारा स्पष्ट किए जाने के बाद राज्य सरकारें दूसरे समुदायों से कम आबादी वाले राज्यों में अल्पसंख्यकों की पहचान पर अपना रुख स्पष्ट करे ताकि वहां के नागरिकों को अल्पसंख्यक का दर्जा हासिल हो सके।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















