लेखक -अरविंद जयतिलक
♂÷देश की राजधानी दिल्ली में संपन्न आतंकवाद रोधी वित्तपोषण सम्मेलन उन देशों को सख्त चेतावनी है जो प्रत्यक्ष-परोक्ष रुप से टेरर फंडिंग में शामिल हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से ‘आतंक के लिए कोई धन नहीं’ विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में तकरीबन 72 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और टेरर फंडिंग से निपटने के संदर्भ में अपने विचार रखे। यह सम्मेलन इस मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म के जरिए क्राउडफंडिंग कर आतंकी गतिविधियों में धन लगाया जा रहा है। चिंता की बात यह कि इन मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है। हवाला, वायर ट्रांसफर या कैश कुरियर टेरर फंडिंग के कई आयाम हैं। याद होगा अभी हाल ही में भारत ने इंटरपोल जनरल असेंबली और यूएन काउंटर टेरर कमिटी मीटिंग की मेजबानी करते हुए खुलकर अपने विचार रखे थे। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि दुनिया की सभी एजेंसियां टेरर फंडिंग के रुट्स पर नजर रखते हुए उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करें। इस पहल के जरिए ही मनी लाॅड्रिंग को लेकर आतंकी संगठनों की नकेल कसी जा सकती है। मौजूदा समय में आतंकी फंडिंग में क्रिप्टो करेंसी का इस्तेमाल जोरों पर है। ऐसे में एजेंसियों के लिए डार्कवेव के जरिए हो रही आतंकी फंडिंग को रोकना सबसे बड़ी चुनौती बन गयी है। इसका उपाय यह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर एक समान वैश्विक कानून के दायरे में लाया जाए। जरुरी यह भी है कि इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर की सही जानकारी सभी देशों के पास रहे जिससे कि फर्जी तरीके से की जा रही आतंकी फंडिंग पर लगाम कसी जा सके। सम्मेलन को संबोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित ही कहा कि कुछ देश अपनी विदेश नीति के तहत आतंकवाद का समर्थन करते हैं, तो कुछ आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई रोककर ऐसा करते हैं। उन्होंने सख्त तेवर अपनाते हुए सम्मेलन में उपस्थित सभी प्रतिनिधियों से आह्नान किया कि वे आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों को इसकी कीमत चुकाने के लिए मजबूर करें। उन्होंने यह भी कहा कि सभी आतंकवादी हमलों का एक समान विरोध होना चाहिए। इस वक्तव्य के जरिए प्रधानमंत्री ने उन देशों को आईना दिखाया जो आतंकवाद की समग्र व्याख्या करने से कतराते हैं। यह सच्चाई है कि दुनिया भर में आतंकवाद को लेकर अलग-अलग नजरिए के कारण ही आतंकवाद से निपटने में कामयाबी नहीं मिल रही है। जबकि भारत हमेशा से कहता रहा है कि आतंकवाद को गुड आतंकवाद और बैड आतंकवाद के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। आतंकवाद की एक परिभाषा होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का स्पष्ट इशारा पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन की ओर था जो अपने स्वार्थ के लिए आतंकी संगठनों को फंडिंग करते हैं। आतंकवाद के मसले पर चीन खुलकर पाकिस्तान का पक्ष लेता है। यही नहीं वह भारत में आतंकी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार आतंकियों का बचाव करने से भी बाज नहीं आता है। अभी हाल ही में उसने लश्करे तैयबा के आतंकवादी शाहिद महमूद को वैश्विक आतंकवादियों की सूची में डाले जाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में भारत और अमेरिका के प्रस्ताव का विरोध किया। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि चीन सरीखे देशों के खिलाफ वैश्विक समुदाय कड़ा रुख अपनाए। हालांकि भारत ने इस सम्मेलन में आतंकी फंडिंग पर चर्चा के लिए चीन को तो न्यौता दिया लेकिन पाकिस्तान और अफगानिस्तान को आमंत्रित न दुनिया को कड़ा संदेश दिया कि वह हर स्थिति में टेरर फंडिंग और आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों के खिलाफ है। जीरो टालरेंस के तहत कट्टरवाद और जेहाद के खिलाफ लड़ता रहेगा। जेहादी और कट्टरवादी मानसिकता का नतीजा है कि गत वर्ष पहले जेहादियों ने पेरिस में एक कार्टून मैगजीन ‘शार्ली अब्दो’ के कार्यालय में घुसकर मुख्य कार्टुनिस्ट और प्रधान संपादक समेत 20 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। अमेरिका के लास वेगास शहर में एक संगीत समारोह में आतंकी हमला कर पांच दर्जन से अधिक लोगों की निर्मम हत्या कर दी गयी। इस तरह की जेहादी और कट्टरवादी हत्याएं आए दिन दुनिया को विचलित करती रहती हैं। विचार करें तो यह स्थिति आतंकवाद पर विश्व बिरादरी की विभाजनकारी मानसिकता, विश्वशांति के प्रति अदूरदर्शिता और असमन्वयपूर्ण सामरिक विफलता का ही नतीजा है। किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ कट्टरवाद और जेहाद को प्रश्रय देता है। वह भारत में खालिस्तानी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए टेरर फंडिंग करता है। सिख फाॅर जस्टिस जैसे खालिस्तानी संगठन कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी में रहकर भारत के खिलाफ फर्जी प्रोपगंडा फैलाते हैं। लेकिन इस मसले पर कोई भी देश खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। यह अच्छा रहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने सम्मेलन में बांगलादेश में मंदिरों और अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों का उल्लेख कर ऐसे जेहादी मानसिकता वालों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर कार्रवाई करने की जरुरत बतायी। यह सच्चाई है कि बांगलादेश में हिंदू जन और उनके आस्था केंद्र बिल्कुल ही सुरक्षित नहीं हैं। हिंदू आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र नोआखली जिले का इस्काॅन मंदिर को किस तरह कट्टरपंथियों ने तहस-नहस किया और शासन-प्रशासन मूकदर्शक बना रहा, यह किसी से छिपा नहीं है। बांग्लादेश में हूजी, जमातुल मुजाहिदीन बंगलादेश, द जाग्रत मुस्लिम जनता बांगलादेश (जेएमजेबी), पूर्व बांगला कम्युनिस्ट पार्टी (पीबीसीबी) व इस्लामी छात्र शिविर यानी आइसीएस जैसे बहुतेरे आतंकी, जेहादी और कट्टरपंथी संगठन हैं जिनका एकमात्र मकसद बांग्लादेश से हिंदू अल्पसंख्यकों का सफाया करना है। भारत में सक्रिय हूजी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के सहयोग से कई आतंकी घटनाओं को अंजाम दे चुका है। उसका यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आॅफ असम से नजदीकी संबंध है। कहा तो यह भी जाता है कि वह उल्फा के लिए टेªेनिंग कैंप भी चलाता है। याद होगा 2002 में कोलकाता के अमेरिकन सेंटर पर हुए हमले की जिम्मेदारी इसी संगठन ने ली थी। कुछ ऐसे ही जेहादी संगठनों ने पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ अभियान छेड़़ रखा है। विचार करें तो भारत ही नहीं अमेरिका समेत दुनिया के तमाम देश पाकिस्तान और आतंक के बीच चोली-दामन के संबंध को स्वीकार चुके हैं। आतंकियों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन चुके पाकिस्तान को वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) भी ग्रे सूची में डाल चुका है। दुनिया के सामने उजागर हो चुका है कि पाकिस्तान इस्लामिक स्टेट, अलकायदा, लश्कर ए तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, हक्कानी नेटवर्क, जमात-उद-दावा, फलाह-ए-इंसानियत और तालिबान से जुड़े लोगों की वित्तीय मदद करता है। याद होगा गत वर्ष पहले अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवाद का गढ़ घोषित करते हुए उसे दी जाने वाली सहायता पर रोक लगाते हुए चेतावनी दी गयी थी कि जब तक वह अपनी जमीन पर आतंकी संगठनों के खिलाफ असरदार कार्रवाई नहीं करेगा, उसे सैन्य आर्थिक मदद नहीं दी जाएगी। उस दरम्यान अमेरिकी कांग्रेस की सालाना रिपोर्ट से भी उद्घाटित हुआ था कि पाकिस्तान आतंकवाद पर दोहरा रुख अपनाते हुए लश्कर ए तैयबा और जैश ए मुहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को आर्थिक मदद करता है। हाल ही में अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति बाइडन स्वीकार चुके हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद के मसले पर सिर्फ धोखा देता आया है। जबकि अमेरिका आतंकवाद से निपटने के लिए उसे 2009 से अब तक 4 अरब अमेरिकी डाॅलर यानी 300 अरब की मदद दे चुका है। सच्चाई यह है कि पाकिस्तान इस धन का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के खिलाफ करने के बजाए भारत में आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने में करता है। दुनिया के सामने उजागर हो चुका है कि उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर ही हक्कानी समूह जैसे आतंकी संगठन अफगानिस्तान में तालिबान के आने से पहले जमकर तबाही मचाते रहे हैं। ये आतंकी संगठन कई बार अमेरिका एवं भारतीय दूतावासों पर भी हमला कर चुके हंै। विडंबना कि इस सच्चाई से अवगत होने के बावजूद भी दुनिया पाकिस्तान के खिलाफ सख्त कार्रवाई से बचती है। नतीजा टेरर फंडिंग में शामिल पाकिस्तान सरीखे देशों का हौसला बुलंद होता है और वे अपने कुत्सित मकसद में कामयाब होते हैं। आज जरुरत इस बात की है कि सभी देश फाइनेंसियल इंटेलिजेंस यूनिट को मजबूत कर टेरर फंडिंग पर निर्णायक रोक लगाएं।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















