लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷संयुक्त राष्ट्र संघ ने धार्मिक आजादी का उलंघन करने वाले एक दर्जन देशों की सूची जारी की है। इस सूची में चीन-पाकिस्तान समेत क्यूबा, इरिट्रिया, ईरान, निकारगुआ, उत्तर कोरिया, रुस, सऊदी अरब, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान इत्यादि देश शामिल हैं। इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम एक्ट-1998 के तहत अल्जीरिया, सेंटल अफ्रीकी रिपब्लिक, कोमोरोस और वियतनाम को विशेष निगरानी सूची में रखा गया है। इसलिए कि इन देशों ने धार्मिक भेदभाव रोकने की दिशा में काम किया है लेकिन अब भी उलंघन के मामले आ रहे हंै। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने यह सूची जारी करते हुए कहा कि अमेरिका दुनिया भर में धर्म के आधार पर होने वाले जुल्म को खत्म करने के लिए अपना प्रयास जारी रखेगा। उल्लेखनीय है कि भारतीय-अमेरिकी मुस्लिम परिषद जैसे समूहों ने अमेरिकी विदेश विभाग पर दबाव बनाया कि भारत को भी चिंताजनक देशों में शामिल किया जाए। लेकिन अमेरिका ने इसे स्वीकार नहीं किया। गौरतलब है कि इस सूची में उत्तर कोरिया लगातार 21 वें साल और पाकिस्तान वर्ष 2018 से बना हुआ है। चीन और पाकिस्तान में अन्य धर्मावलंबियों पर अत्याचार लगातार बढ़ता जा रहा है। उनकी सरकार धार्मिक भेदभाव रोकने के बजाए उसे बढ़ावा दे रही है। अभी गत वर्ष पहले ही संयुक्त राष्ट्र की नस्ली भेदभाव उन्मूलन समिति ने उजागर किया कि चीन ने 10 लाख से ज्यादा उइगर मुस्लिमों को कथित तौर पर कट्टरवाद विरोधी गुप्त शिविरों में कैद रखा है। गत वर्ष पहले पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पाॅपियो ने धार्मिक आजादी के मुद्दे पर चीन की यह कहकर आलोचना किया था कि वहां धार्मिक स्वतंत्रता संकट में है। उन्होंने कहा कि चीन द्वारा उइगर मुसलमानों और तिब्बती बौद्धों की धार्मिक स्वतंत्रता का दमन किया जा रहा है जो कि मौलिक मानवाधिकारों का उलंघन है। एमनेस्टी एवं मानवाधिकार वाच समेत कई मानवाधिकार संगठनों की मानें तो छोटा मक्का कहे जाने वाले पश्चिमी चीन के मुस्लिम बाहुल्य राज्य लिक्शिया में खौफ का माहौल है। अब यहां के बच्चे पहले की तरह न तो मदरसों में जाते हैं और न ही मस्जिदों में नमाज के वक्त लोगों का हुजुम दिखता है। दरअसल चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ने यहां के 16 वर्ष के कम उम्र के बच्चों को धार्मिक गतिविधियों में शिरकत करने पर पाबंदी लगा दी है। इस पाबंदी से वहां के मुस्लिम समुदाय के लोगों को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुकूल आचरण करना कठिन हो गया है और वे महसूस कर रहे हैं कि उनकी धार्मिक पहचान संकट में पड़ गयी है। जिन मस्जिदों में कभी हजारों बच्चे कुरान पढ़ने के लिए आते थे, अब वहां उनका प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। बच्चों के परिजनों को भी हिदायत दी गयी है कि वे बच्चों को मस्जिदों में कुरान पढ़ने के लिए न भेजें क्योंकि इससे वे धर्मनिरपेक्ष पाठ्यक्रमों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। यहां के स्थानीय प्रशासन ने उन छात्रों की तादाद घटा दी है जिन्हें 16 साल से अधिक उम्र के चलते मस्जिदों में पढ़ने की अनुमति मिली हुई है। मस्जिदों में नियुक्त किए जाने वाले नए इमामों के लिए प्रमाणपत्र हासिल करने की प्रक्रिया को भी सीमित कर दिया गया है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार शिनजियांग प्रांत में और भी अधिक कठोरता से पेश आ रही है। यहां के रहने वाले उइगर समुदाय के लोगों को शिक्षा शिविरों में डाल दिया गया है जहां उन्हें कुरान पढ़ने या दाढ़ी रखने की सख्त मनाही है। याद होगा गत वर्ष चीन की सरकार ने यहां के मुस्लिम समुदाय के लोगों को चेतावनी दी कि वे नाबालिगों को कुरान पढ़ने के लिए या धार्मिक गतिविधयों में भाग लेने के लिए मस्जिदों में न जाने दें और न ही इसका समर्थन करें। अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें दंड भुगतना होगा। सरकार के इस रवैए से यहां रह रहे मुसलमानों के मन में इन प्रतिबंधों से यह धारणा पनपने लगी है कि सरकार उनकी रीति-रिवाज और परंपाओं को खत्म करने पर आमादा है। उन्हें लग रहा है कि सरकार 1966 का माहौल निर्मित करना चाहती है, जिस दौरान मस्जिदों को ढहा दिया गयाया फिर जानवरों को रखने की जगह के रुप तब्दील कर दिया गया था। उइगर मुसलमानों की यह चिंता अनायास नहीं है। गौर करें तो चीन की सरकार ने यहां के मस्जिदों पर राष्ट्रीय झंडा लगाना अनिवार्य कर दिया है और ध्वनि प्रदूषण की आड़ में इन मस्जिदों के इमामों को चेताया है कि वह नमाज के लिए माइक के जरिए लोगों को बुलावा न भेंजे। साथ ही मुस्लिम बहु राज्यों के तकरीबन सभी मस्जिदों से लाउडस्पीकरों को हटा दिया गया है। जब दुनिया भर के मुसलमान रमजान महीने में रोजा रखते हैं तब यहां की सरकार शिनजियांग, निंगश्यांग, गुआंग्शी, कानसू, छिंगहाई और यूननान प्रांत में बसे मुसलमानों के रोजा पर पाबंदी लगाती है। इस रवैए से चीन का मुस्लिम समुदाय बेहद खफा है और उसे आशंका है कि यह कठोर प्रतिबंध जारी रहा तो उनका वजूद खत्म हो जाएगा। इतिहास में जाएं तो चीन में इस्लाम का प्रवेश आठवीं सदी के मध्य में अरब से हुआ। आज की तारीख में यहां मुसलमानों की तादाद दो करोड से अधिक है। इनमें सर्वाधिक सुन्नी फिरके के हैं, जिनमें ह्वुई, उईगुर, तातार, किरगिज, कजाख, उजबेग, तुंगश्यांग, साला और पाओ-आन इत्यादि प्रमुख हैं। पाकिस्तान की बात करें तो यहां धार्मिक आजादी न के बराबार है। विशेष रुप से हिंदू और सिखों पर अत्याचार बढ़ता जा रहा है। आंकड़ों पर गौर करें तो 1947 में पाकिस्तान में 428 हिंदू मंदिर थे। इनमें से कुछ मंदिर बहुत बड़े और सुविख्यात थे। लेकिन इन मंदिरों को पाकिस्तान के हुक्मरानों ने साजिश के तहत ध्वस्त कर इस्लामिक इमारतों और मस्जिदों में तब्दील कर दिया। आज की तारीख में सिर्फ 26 हिंदू मंदिर बचे हैं और वह भी बेहद जर्जर हालत में हैं। अभी गत वर्ष ही अमेरिका द्वारा प्रकाशित धार्मिक आजादी पर बने अंतर्राष्ट्रीय आयोग (यूएससीआईआरएफ) की रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि पाकिस्तान धार्मिक आजादी के लिए एक खतरनाक देश है। वह अपने यहां अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न और उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकने में नाकाम है। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में सबसे अधिक भेदभाव हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ होता है। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत विभाजन के समय पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदुओं की आबादी तकरीबन 15 प्रतिशत थी जो आज घटकर 1.6 प्रतिशत रह गयी है। विचार करें तो हिंदू अल्पसंख्यकों से भेदभाव और उनके आस्था केंद्रों पर होने वालेे हमले के लिए सिर्फ कट्टरपंथी ताकतें ही जिम्मेदार नहीं हैं। पाकिस्तान सरकार की अल्पसंख्यक विरोधी नीति विशेष रुप से ईश निंदा कानून और नफरती मजहबी शिक्षा भी जिम्मेदार हैं। अमेरिकी आयोग की एक रिपोर्ट से उद्घाटित हो चुका है कि पाकिस्तानी स्कूलों की किताबें अल्पसंख्यकों विशेषकर हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत और असहिष्णुता से अटी पड़ी हंै। मजहबी शिक्षक हिंदू अल्पसंख्यकों को इस्लाम के शत्रु की तरह पेश करते हैं। उन्हें काफिर बता मुस्लिम बच्चों के मन में जहर घोलते हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में सामाजिक अध्ययन की पाठ्य पुस्तकें भारत के संबंध में नकारात्मक टिप्पणी से अटी पड़ी है। पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों की आवाज बुलंद करने वाले मार दिए जाते हैं। याद होगा गत वर्ष पहले पाकिस्तान के 42 वर्षीय मंत्री शहबाज भट्टी की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गयी कि उन्होंने अल्पसंख्यक हितों की आवाज बुलंद की थी। उनकी यह पहल कट्टरपंथियों को रास नहीं आयी और वे उन्हें मौत की नींद सुला दिए। कट्टरपंथ के खिलाफ आवाज उठाने वाले पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर को भी कट्टरपंथियों ने मार डाला। अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुकात रखने वाली आसिया बीबी को भी कट्टरपंथियों ने नहीं बख्शा। आज की तारीख में कट्टरपंथियों का हौसला इस कदर बुलंद है वे हर उदारवादी लोगों को निशाना बना रहे हैं। भला ऐसे में हिंदू और सिख अल्पसंख्यक समुदाय के लोग और उनके आस्था केंद्र यहां किस तरह सुरक्षित रहेंगे। उचित होगा कि अमेरिका समेत सभी मानवाधिकारवादी वैश्विक संगठन चीन-पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















