लेखक-संजय राय
एक ही बीमारी के इलाज में सरकारी के मुकाबले निजी अस्पताल में 5 से 10 गुना अंतर
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी पारिवारिक सामाजिक उपभोग सर्वेक्षण (स्वास्थ्य), 2025 के आंकड़े भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखते हैं। रिपोर्ट बताती है कि देश में इलाज का खर्च केवल बीमारी की गंभीरता पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करता है कि मरीज सरकारी अस्पताल में इलाज करा रहा है या निजी अस्पताल में। यही कारण है कि इलाज में सरकारी और निजी अस्पतालों के बीच खर्च का अंतर कई मामलों में 5 से 10 गुना तक पहुंच जाता है।
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च लंबे समय से आम परिवारों के लिए चिंता का विषय रहा है। स्वास्थ्य बीमा का दायरा बढ़ने के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों को इलाज के लिए अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। एनएसओ के ताजा आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं।
अस्पताल में भर्ती होकर कराए जाने वाले इलाज के आंकड़े सरकारी और निजी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच मौजूद अंतर को सबसे स्पष्ट रूप से दिखाते हैं। देश में एक भर्ती मरीज पर औसत चिकित्सा व्यय लगभग 37,858 रुपये दर्ज किया गया है, जबकि जेब से होने वाला औसत खर्च 34,064 रुपये है।
सरकारी अस्पतालों में भर्ती इलाज पर औसत खर्च केवल 6,631 रुपये है। इसके विपरीत निजी अस्पतालों में यही खर्च बढ़कर 50,508 रुपये तक पहुंच जाता है। यानी निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च सरकारी अस्पतालों की तुलना में कई गुना अधिक है।
यह अंतर सामान्य बीमारियों तक सीमित नहीं है। कैंसर, हृदय रोग, किडनी फेल्योर और अन्य गंभीर बीमारियों के उपचार में निजी अस्पतालों का खर्च अक्सर एक लाख रुपये से अधिक तक पहुंच जाता है। ऐसे मामलों में उपचार की लागत मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए भी भारी आर्थिक बोझ बन जाती है।
अक्सर यह माना जाता है कि महंगा इलाज केवल बड़ी बीमारियों में ही होता है, लेकिन सर्वेक्षण के आंकड़े इस धारणा को पूरी तरह सही नहीं ठहराते। सामान्य बीमारियों के उपचार में भी सरकारी और निजी संस्थानों के बीच बड़ा खर्च अंतर मौजूद है।
पिछले 15 दिनों के भीतर हुए एक बाह्य रोगी (ओपीडी) उपचार पर औसत खर्च 861 रुपये दर्ज किया गया है। सरकारी अस्पतालों में यह खर्च केवल 289 रुपये है, जबकि निजी अस्पतालों में औसत खर्च 1,447 रुपये तक पहुंच जाता है।
इसका अर्थ है कि सामान्य बीमारियों के इलाज में भी निजी क्षेत्र का खर्च सरकारी संस्थानों की तुलना में तीन से पांच गुना अधिक हो सकता है। सरकारी अस्पतालों में कई मामलों में मरीजों को मुफ्त या बेहद कम लागत पर सेवाएं उपलब्ध हो जाती हैं, जबकि निजी क्षेत्र में लगभग हर सेवा के लिए भुगतान करना पड़ता है।
प्रसव संबंधी सेवाओं में सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों के बीच सबसे बड़ा अंतर दिखाई देता है। सरकारी अस्पतालों में प्रसव पर औसत खर्च लगभग 2,299 रुपये है। वहीं सभी प्रकार के अस्पतालों को मिलाकर औसत खर्च 14,775 रुपये दर्ज किया गया है।
निजी अस्पतालों में सामान्य प्रसव या सिजेरियन डिलीवरी पर खर्च 30 हजार से 40 हजार रुपये या उससे अधिक तक पहुंच सकता है। इसका मतलब है कि प्रसव के मामले में खर्च का अंतर 10 से 15 गुना तक हो सकता है।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच भी महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है। शहरी क्षेत्रों में प्रसव पर औसत खर्च 23,670 रुपये है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 11,609 रुपये दर्ज किया गया है। यह अंतर निजी स्वास्थ्य सेवाओं की अधिक लागत और शहरी क्षेत्रों में उनकी अधिक उपलब्धता को दर्शाता है।
लोग इलाज के लिए किस प्रकार की स्वास्थ्य सुविधा चुनते हैं, इसका सीधा असर उनके खर्च पर पड़ता है। सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 35 प्रतिशत लोग सरकारी अस्पतालों का उपयोग करते हैं, जबकि 39 प्रतिशत लोग निजी डॉक्टरों या क्लिनिकों का सहारा लेते हैं।
शहरी क्षेत्रों में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की ओर झुकाव और अधिक स्पष्ट है। यहां 42 प्रतिशत से अधिक लोग निजी क्लिनिकों में उपचार कराते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि स्वास्थ्य पर होने वाला व्यक्तिगत खर्च लगातार बढ़ता जाता है।
निजी क्षेत्र की बढ़ती पहुंच और सुविधाओं ने लोगों को आकर्षित किया है, लेकिन इसके साथ उपचार की लागत भी तेजी से बढ़ी है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं में आर्थिक असमानता का दायरा और व्यापक हो रहा है।
अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों के खर्च पर अक्सर अधिक चर्चा होती है, लेकिन ओपीडी उपचार भी परिवारों की आय पर बड़ा असर डालता है। डॉक्टर की फीस, जांच, दवाइयां और बार-बार होने वाली विजिट मिलकर एक महत्वपूर्ण आर्थिक बोझ पैदा करती हैं।
एनएसओ के अनुसार एक उपचार पर औसत खर्च 861 रुपये है, जबकि माध्य खर्च 400 रुपये दर्ज किया गया है। सरकारी संस्थानों में यह खर्च काफी कम है और अनेक मामलों में शून्य के करीब भी पाया गया है। दूसरी ओर निजी अस्पतालों में यह खर्च औसतन 1,447 रुपये और निजी क्लिनिकों में 958 रुपये तक पहुंच जाता है।
इससे स्पष्ट होता है कि छोटी और बार-बार होने वाली बीमारियां भी लंबे समय में परिवारों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती हैं, विशेषकर तब जब वे निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर हों। स्वास्थ्य सेवाओं की लागत पूरे देश में समान नहीं है। विभिन्न राज्यों में खर्च के स्तर में काफी अंतर देखने को मिलता है।
तेलंगाना में अस्पताल में भर्ती उपचार पर औसत खर्च लगभग 55 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। तमिलनाडु में यह आंकड़ा करीब 52 हजार रुपये है। केरल और कर्नाटक में भी यह खर्च 40 से 45 हजार रुपये के बीच दर्ज किया गया है। महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी अस्पताल उपचार का खर्च अपेक्षाकृत अधिक है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी भर्ती उपचार पर औसत व्यय करीब 45 हजार रुपये तक पहुंचता है। इसके विपरीत ओडिशा, मिजोरम और मेघालय जैसे राज्यों में यह खर्च अपेक्षाकृत कम है। लद्दाख में अस्पताल उपचार पर औसत खर्च केवल 8 हजार रुपये के आसपास दर्ज किया गया है।
हालांकि कम खर्च को हमेशा बेहतर स्थिति का संकेत नहीं माना जा सकता। कई बार यह स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता, कम निजीकरण या उपचार तक कम पहुंच को भी दर्शाता है। सर्वेक्षण के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि जिन राज्यों में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत है, वहां लोगों का व्यक्तिगत खर्च कम रहता है। सरकारी अस्पताल गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं।
इसके विपरीत जहां निजी क्षेत्र की भूमिका अधिक है, वहां इलाज की लागत भी तेजी से बढ़ती दिखाई देती है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में निजी अस्पतालों का व्यापक नेटवर्क मौजूद है और वहीं स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च भी अपेक्षाकृत अधिक दर्ज किया गया है। पूर्वोत्तर राज्यों में सरकारी संस्थानों पर अपेक्षाकृत अधिक निर्भरता होने के कारण खर्च कम दिखाई देता है। यह तथ्य बताता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की मजबूती सीधे तौर पर लोगों के आर्थिक बोझ को कम कर सकती है।
एनएसओ के आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर “आउट-ऑफ-पॉकेट” यानी जेब से होने वाले खर्च पर निर्भर है। इलाज का खर्च केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय का भी प्रश्न बन चुका है।
जब एक ही बीमारी का इलाज अलग-अलग अस्पतालों में 5 से 10 गुना तक महंगा हो, तब स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती बन जाती है। निजी स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती भूमिका ने बेहतर सुविधाएं तो उपलब्ध कराई हैं, लेकिन साथ ही इलाज को महंगा भी बनाया है। ऐसे में सरकारी अस्पतालों की पहुंच, गुणवत्ता और क्षमता में सुधार की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। यदि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत नहीं किया गया और लोगों की जेब से होने वाले खर्च को कम करने के प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में इलाज का बढ़ता खर्च और अधिक परिवारों को आर्थिक संकट में धकेल सकता है।
स्वास्थ्य सेवा केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि समान अवसर और सामाजिक सुरक्षा का आधार भी है। इसलिए सस्ती, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार देश की सबसे महत्वपूर्ण नीति प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।

(लेखक आज अखबार में नेशनल ब्यूरो के पद पर दिल्ली में कार्यरत हैं)




