लेखक:ओमप्रकाश तिवारी
मुंबई में भाषा का सवाल नया नहीं है। मराठी इस शहर की अपनी भाषा है और महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा भी। इसीलिए यदि सरकार यह चाहती है कि मुंबई की सड़कों पर यात्रियों से रोज संवाद करने वाले ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालक कामचलाऊ मराठी बोलना सीखें, तो पहली नजर में इसमें कोई अस्वाभाविक बात नहीं दिखती। सवाल तब खड़ा होता है, जब भाषा सीखने की पहल और रोजी-रोटी छिनने के डर के बीच सरकार की नीति ऐसी रेखा खींच दे, जिसके एक तरफ सम्मान हो और दूसरी तरफ भय।
आज मुंबई की सड़कों पर यही भय दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने यात्री वाहन चालकों के लिए कामचलाऊ मराठी का ज्ञान अनिवार्य किया है। आरटीओ की ओर से चालकों की मौखिक जांच भी शुरू हो चुकी है। जिन चालकों को पर्याप्त मराठी नहीं आती, उन्हें एक महीने में भाषा सीखने का नोटिस दिया जा रहा है। नियम का पालन न करने पर बैज निलंबित करने और आगे चलकर परमिट तथा लाइसेंस पर कार्रवाई की व्यवस्था भी है। कागज पर यह व्यवस्था जितनी सरल दिखाई देती है, मुंबई की जमीन पर उतनी ही पेचीदा है। क्योंकि मुंबई का ऑटो और टैक्सी चालक केवल एक वाहन चालक नहीं है। वह इस महानगर की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। सुबह लाखों लोगों को स्टेशन तक पहुंचाने से लेकर रात में घर लौटते यात्रियों को अंतिम मंजिल तक पहुंचाने तक, उसकी भूमिका रोजमर्रा की मुंबई में केंद्रीय है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो वर्षों पहले उत्तर प्रदेश, बिहार और देश के दूसरे हिस्सों से यहां रोजी-रोटी की तलाश में आए थे। कई लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। कई उम्रदराज हैं। कई दशकों से मुंबई में रहते हुए टूटी-फूटी मराठी में काम चला रहे हैं।
ऐसे व्यक्ति से यह कहना कि अब एक निश्चित अवधि में भाषा की परीक्षा पास करो, अन्यथा बैज और रोजगार पर संकट आ सकता है—स्वाभाविक रूप से उसके भीतर असुरक्षा पैदा करेगा। यही असुरक्षा सोमवार को सड़क पर उतर आई, जब मुंबई के कुछ हिस्सों में आटो और टैक्सी चालकों के समूहों ने स्वघोषित हड़ताल शुरू कर दी। कहीं रास्ता रोका गया, कहीं दूसरे चालकों को सवारी बैठाने से रोकने की कोशिश हुई और कहीं यात्रियों को वाहन से उतार दिया गया। इसका खामियाजा उस आम मुंबईकर को भुगतना पड़ा, जिसका भाषा विवाद से कोई लेना-देना नहीं था। यहां विरोध करने वाले चालकों को भी समझना होगा कि यात्रियों को जबरन उतारना या सड़क रोकना किसी समस्या का समाधान नहीं है। इससे उनकी मांग कमजोर होती है। लेकिन सरकार को भी यह समझना होगा कि कानून बनाना और उसे संवेदनशीलता से लागू करना दो अलग-अलग बातें हैं।
सबसे दिलचस्प बात इस पूरे विवाद का राजनीतिक पक्ष है। महाराष्ट्र सरकार में परिवहन विभाग शिवसेना के पास है। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक, दोनों ही आटो-रिक्शा चलाने के अपने शुरुआती दिनों के लिए जाने जाते हैं। आटो चालक समुदाय ने इन्हें अपने बीच से उठे नेताओं के रूप में देखा है। इसलिए जब शिंदे और सरनाईक सत्ता के शीर्ष पदों पर पहुंचे, तो इस समुदाय को उम्मीद थी कि अब उसके जीवन की कठिनाइयों को समझने वाली सरकार मिलेगी। लेकिन आज इन्हीं दोनों नेताओं के कारण आटो-टैक्सी चालकों की रोजी-रोटी पर संकट आता दिखाई दे रहा है। जबकि सरकार का तर्क है कि नियम पुराना है और अब उसका पालन कराया जा रहा है। सरकार यह भी कह रही है कि उद्देश्य किसी को रोजगार से वंचित करना नहीं, बल्कि यात्रियों से संवाद के लिए आवश्यक मराठी का ज्ञान सुनिश्चित करना है। सरकार की ओर से बड़ी संख्या में चालकों को प्रशिक्षण दिए जाने की बात भी कही गई है। फिर भी जमीन पर संदेश अलग क्यों जा रहा है?
भाषा सिखाने और भाषा के नाम पर दंड देने में बहुत महीन अंतर है। यदि सरकार पहले प्रशिक्षण की पर्याप्त व्यवस्था करे, कमजोर वर्ग के चालकों को समय दे, परीक्षा की प्रक्रिया पारदर्शी रखे और यह स्पष्ट करे कि उद्देश्य संवाद की क्षमता है, साहित्यिक मराठी नहीं, तो विवाद काफी हद तक शांत हो सकता है। लेकिन यदि आरटीओ की कार्रवाई चालक के मन में ‘भाषा नहीं आई तो रोजगार गया’ का भय पैदा करती है, तो यही नीति सामाजिक असंतोष को जन्म देगी। और इस पूरे मामले में भाजपा नेताओं की चुप्पी आटो-टैक्सी चालकों को सबसे अधिक चुभ रही है। मुंबई के ऑटो-टैक्सी चालकों में बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश मूल के हिंदी भाषियों की है। पिछले चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने इस वर्ग से समर्थन हासिल किया। इसका एक कारण यह भी रहा कि हिंदी भाषी मतदाताओं का बड़ा हिस्सा शिवसेना के पुराने भाषाई आक्रामक तेवर और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की मार-पिटाई की राजनीति से असहज रहा है।
उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा के साथ खड़ा होना उन्हें ऐसी राजनीति से सुरक्षा देगा। अब यदि वही मतदाता यह महसूस करने लगे कि सत्ता में आने के बाद भाजपा की सहयोगी शिवसेना के दबाव में उसकी रोजी-रोटी का सवाल खड़ा हो रहा है और भाजपा नेतृत्व मौन है, तो यह असंतोष केवल मुंबई तक सीमित नहीं रहेगा। महाराष्ट्र में तो इसका असर पड़ेगा ही, उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी इसकी छाया पड़ सकती है। भाजपा के लिए यह समझना जरूरी है कि मुंबई का हिंदीभाषी ऑटो चालक केवल महाराष्ट्र का मतदाता नहीं है। उसके परिवार की जड़ें उत्तर प्रदेश में हैं। वह गांव-शहर में अपने रिश्तेदारों से बात करता है, राजनीतिक घटनाओं की चर्चा करता है और अपने अनुभव साझा करता है। मुंबई में उसके साथ क्या हुआ, इसकी कहानी उसके गांव तक पहुंचती है। इसलिए सरकार को भाषा का सम्मान और नागरिक की रोजी-रोटी—दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा।

(लेखक दैनिक जागरण के मुंबई ब्यूरो हैं और यह लेख साभार दैनिक जागरण है)




