लेखक:मनोज कुमार मिश्रा
जिस ‘वंदे मातरम्’ के एक-एक शब्द ने भारत की सोई हुई चेतना को झकझोर कर रख दिया था, जिसके जयघोष से कांपते हुए ब्रितानी हुकूमत ने देशभक्तों पर लाठियां बरसाईं और जिसे गाते-गाते क्रांतिकारियों ने फांसी के फंदों को फूलों की माला की तरह पहन लिया, आज उसी राष्ट्रगीत को लेकर देश में एक सोची-समझी सियासत देखने को मिल रही है।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर जब संसद ने ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) कानून’ पारित कर राष्ट्रगीत के सभी मूल छंदों के गायन और इसकी वैधानिक मर्यादा को पुनर्स्थापित किया,
तब विपक्षी खेमे, विशेषकर कांग्रेस पार्टी की छटपटाहट एक बार फिर खुलकर सामने आ गई। यह छटपटाहट कोई आकस्मिक घटना नहीं है, बल्कि यह उस सदी पुराने वैचारिक दिवालियापन और तुष्टिकरण की नीति का विस्तार है, जिसकी जड़ें आजादी के आंदोलन के दौर में ही जम चुकी थीं।
हाल ही में 15 अगस्त के राष्ट्रीय पर्व पर कांग्रेस मुख्यालय (AICC) में आयोजित कार्यक्रम के दौरान स्वयं सोनिया गांधी द्वारा राष्ट्रगीत के गायन के ठीक बीच में व्यवधान पैदा करना इसी सोची-समझी रणनीति का खुला प्रमाण था।
मुस्लिम वोटबैंक को साधने और तुष्टिकरण के इसी एजेंडे के तहत किए गए इस कृत्य पर जब विवाद बढ़ा, तो कांग्रेस प्रवक्ताओं ने इसे लीपापोती करते हुए यह हास्यास्पद दलील दी कि वे पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मंगवा रही थीं।
राष्ट्र भली-भांति समझता है कि राष्ट्रगीत के समय अनुशासन तोड़ने का यह बहाना केवल एक राजनीतिक नाटक था, जिसके तुरंत बाद कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने संसद के कानून को धता बताकर केवल चुनिंदा पंक्तियां गाने का प्रस्ताव पारित कर अपनी मंशा पूरी तरह उजागर कर दी।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1870 के दशक में रचित और उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में समाहित यह गीत केवल कुछ पंक्तियों का समूह नहीं था, बल्कि भारत भूमि को साक्षात शक्ति स्वरूपा मां के रूप में देखने की आध्यात्मिक और राष्ट्रीय अनुभूति थी।
1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार अपने स्वर दिए, तब यह संपूर्ण स्वाधीनता संग्राम का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत बन गया।
1905 के बंग-भंग विरोधी आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ क्रांति का सबसे शक्तिशाली नारा बना।
लाला लाजपत राय ने लाहौर से इसी नाम से उर्दू पत्रिका निकाली, तो मैडम भीकाजी कामा ने 1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में जो पहला भारतीय ध्वज फहराया, तो उसके सीने पर देवनागरी लिपि में ‘वंदे मातरम्’ अंकित था। क्रांतिकारियों के लिए यह मातृभूमि की स्वतंत्रता का सबसे पवित्र संकल्प था।
किंतु 1930 के दशक में जैसे ही स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना की विभाजनकारी राजनीति हावी होने लगी, कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने घुटने टेकने शुरू कर दिए।
मुस्लिम लीग ने इस गीत की उन पंक्तियों पर मजहबी आधार पर आपत्ति जताई जिनमें मां दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के प्रतीकों के माध्यम से मातृभूमि की वंदना की गई थी। लीग ने आरोप लगाया कि भारत भूमि को शक्ति स्वरूपा मानकर की गई वंदना ‘बुतपरस्ती’ है।
इस सांप्रदायिक दबाव के आगे नतमस्तक होकर 26 से 28 अक्टूबर 1937 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) ने कोलकाता में राष्ट्रगीत की पीठ में पहला छुरा घोंपा।
पार्टी ने एक समिति बनाकर बहुसंख्यक तुष्टिकरण के तहत गीत के अंतिम छंदों को काट दिया और केवल शुरुआती दो छंदों को मान्यता दी।
राष्ट्र की आत्मा कहे जाने वाले गीत को खंडित करने का यह वह आत्मघाती समझौता था, जिसने मुस्लिम लीग की अलगाववादी भूख को शांत करने के बजाय और भड़काया, जिसका अंतिम परिणाम 1947 के रक्तरंजित देश विभाजन के रूप में सामने आया।
यह पहला अवसर था जब राजनीतिक सौदेबाजी के चलते राष्ट्रगीत के मूल स्वरूप की बलि दी गई।
1937 के इस निर्णय का राष्ट्रवादी नेताओं ने पुरजोर विरोध किया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस, जो बंकिम चंद्र की सांस्कृतिक विरासत और बंगाल के इस क्रांति मंत्र के सबसे बड़े संरक्षक थे, ने इस गीत के ऐतिहासिक और क्रांतिकारी महत्व को कभी कम नहीं होने दिया।
नेताजी ने स्पष्ट माना कि ‘वंदे मातरम्’ ने लाखों भारतीयों के भीतर राष्ट्रीय चेतना की ज्वाला प्रज्वलित की है, इसलिए इसका स्थान अद्वितीय है।
पार्टी के तत्कालीन अनुशासन के बावजूद नेताजी का राष्ट्रवाद कभी तुष्टिकरण की सीमाओं में नहीं बंधा। बाद में जब उन्होंने आजाद हिंद फौज (INA) की बागडोर संभाली, तब भी उन्होंने राष्ट्र की अखंडता और शक्ति की इसी मूल भावना को सर्वोच्च रखा।
वहीं महर्षि अरबिंदो ने इसे ‘भारत के पुनर्जागरण का मंत्र’ कहा और इसकी किसी भी प्रकार की काट-छांट को भारतीय आत्मा पर आघात माना।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी इस बात की पुरजोर पैरवी की कि राजनीतिक समझौतों के लिए मातृभूमि की वंदना को खंडित नहीं किया जाना चाहिए।
कांग्रेस के बाहर, हिंदू महासभा के तत्कालीन अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर ने इस समझौते पर तीखा हमला बोला और इसे सीधे तौर पर ‘तुष्टिकरण की वेदी पर राष्ट्रगीत का अंग-भंग’ करार दिया।
आजादी के बाद यह विवाद समाप्त होने के बजाय संविधान सभा के पटल पर पहुंचा। 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को स्वतंत्र भारत के ऐतिहासिक सत्र की शुरुआत सुचेता कृपलानी द्वारा गाए गए ‘वंदे मातरम्’ से हुई थी।
किंतु इसके तुरंत बाद, 26 अगस्त 1947 के Constituent Assembly Debates (CAD) के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, संविधान सभा सदस्य एच. वी. कामथ ने औपचारिक रूप से सदन में कड़ा विरोध दर्ज कराया कि कुछ सदस्य जानबूझकर सदन में तब दाखिल हुए जब राष्ट्रगीत का गायन खत्म हो चुका था।
कामथ ने सभापति से इस पर सख्त रुख अपनाने और इस ऐतिहासिक गीत की गरिमा की रक्षा की मांग की।
इसके बाद 25 अगस्त 1948 को जब संविधान सभा में राष्ट्रगान के चयन पर बहस हुई, तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तर्क दिया कि सेना के बैंड और विदेशी ऑर्केस्ट्रा में बजाए जाने के लिए ‘जन-गण-मन’ अधिक उपयुक्त है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ की धुन में वाद्ययंत्रों के लिहाज से पर्याप्त गति (Movement) नहीं है।
नेहरू के इस तकनीकी बहाने और कमजोर तर्क पर तीखा प्रहार करते हुए 5 नवंबर 1948 को कांग्रेसी सदस्य सेठ गोविंद दास ने सदन में अत्यंत कड़े शब्दों में विरोध दर्ज कराया।
दास ने सीधे चुनौती देते हुए कहा कि जिस गीत ने 50 वर्षों तक स्वाधीनता संग्राम को ऊर्जा दी और जिसके बल पर देश स्वतंत्र हुआ, उसे केवल विदेशी बैंड की धुन या पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा की सुविधा के नाम पर खारिज करना हमारे स्वाभिमान और इतिहास का खुला अपमान है।
उन्होंने तल्ख लहजे में स्पष्ट किया कि जिस प्रकार सूरदास या मीराबाई के शास्त्रीय पदों को विभिन्न रागों में ढाला गया है, उसी प्रकार भारतीय संगीत के विशेषज्ञ ‘वंदे मातरम्’ को भी किसी भी ऑर्केस्ट्रा के अनुकूल तैयार करने में पूरी तरह सक्षम हैं।
इसके साथ ही यह गंभीर और ऐतिहासिक प्रश्न भी सदन के सामने खड़ा हुआ कि 1937 में जिन ताकतों (मुस्लिम लीग) को इस गीत से आपत्ति थी, वे मजहब के नाम पर अपना अलग देश (पाकिस्तान) लेकर जा चुकी थीं।
अब जब स्वतंत्र भारत अपनी संप्रभुता के साथ खड़ा था, तब उन्हीं पुराने आधारों और राजनीतिक संकोचों की आड़ लेकर अपने ही राष्ट्रगीत को खंडित रखना और उसके मूल स्वरूप से मुंह चुराना पूरी तरह अस्वीकार्य और अनुचित था।
ओडिशा के बिस्वनाथ दास और असम के रोहिणी कुमार चौधरी ने भी दृढ़ता से कहा कि जिस अमर मंत्र को गाते-गाते देशभक्तों ने फांसी के फंदों को चूमा, उसे किसी भी दिखावे या पुराने डर के चलते पीछे नहीं धकेला जा सकता।
तीखे मतभेदों के कारण इस विषय पर कोई औपचारिक मतदान नहीं कराया गया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक में अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने ऐतिहासिक व्यवस्था दी (Constituent Assembly Debates, Vol. XII):
“’जन-गण-मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा, और ‘वंदे मातरम्’ जिसने स्वाधीनता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे ‘जन-गण-मन’ के समान ही सम्मानित और बराबर का दर्जा प्राप्त होगा।”
दुर्भाग्यवश, आजादी के बाद के दशकों में इस संवैधानिक घोषणा को वैधानिक सुरक्षा देने में लगातार उपेक्षा बरती गई।
1971 में इंदिरा गांधी के शासनकाल में जब ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम’ (Prevention of Insults to National Honour Act, 1971) संसद से पारित कराया गया, तब धारा 3 के तहत ‘जन-गण-मन’ और राष्ट्रीय ध्वज के अपमान को तो दंडनीय अपराध बनाया गया, लेकिन ‘वंदे मातरम्’ को इस कानून के संरक्षण से बाहर छोड़ दिया गया।
परिणामस्वरूप, दशकों तक संसद, विधानसभाओं और शिक्षण संस्थानों में राष्ट्रगीत के बहिष्कार की घटनाएं सामने आती रहीं, किंतु कानूनी प्रावधानों के अभाव में कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो सकी।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, जब संसद द्वारा पारित नए कानून के माध्यम से राष्ट्रगीत को उसका पूर्ण वैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है, तब कांग्रेस द्वारा 1937 के पुराने फॉर्मूले की आड़ लेना संवैधानिक और तार्किक दृष्टि से पूरी तरह खोखला साबित होता है।
एक तरफ संविधान की सर्वोच्चता की दुहाई देना और दूसरी तरफ संसद द्वारा निर्मित विधि व संविधान सभा के अध्यक्षीय संकल्प के प्रति चयनात्मक दृष्टिकोण अपनाना खुला विरोधाभास है।
राष्ट्र यह स्पष्ट देख रहा है कि जब भी राष्ट्रीय प्रतीकों को उनकी मूल गरिमा लौटाने की बात आती है, तब राजनीतिक लाभ के लिए पुराने समझौतों का सहारा लिया जाता है। वास्तविक संविधान निष्ठा कानून और राष्ट्रीय प्रतीकों के पूर्ण सम्मान में निहित है, न कि उनके चयनात्मक बहिष्कार में।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार है)




