( श्री लाहिड़ी महाशय की 198वीं जयंती पर विशेष)
19वीं शताब्दी के दक्षिण के संत त्रैलंग स्वामी जो बनारस में बस गए थे, उनसे उनके एक शिष्य ने पूछा कि आप इतने महान तपस्वी हो कर भी लाहिड़ी महाशय को इतना आदर क्यों देते हैं,त्रैलंग स्वामी का जबाब था कि लाहिड़ी महाशय एक दिव्य बिल्ली के बच्चे के सामान हैं,बिल्ली का बच्चा जैसे उसकी मां जहां उसे रख देती है वहीं रहता है,उसी प्रकार लाहिड़ी महाशय भी जहां जगज्जननी उन्हें रख देती हैं, वहीं करते हैं। कर्तव्यपालन की खातिर सांसारिक मनुष्य की भूमिका निभाते हुए भी उन्होंने वह पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है ,जिसे प्राप्त करने के लिए मुझे अपने शरीर से वस्त्र तक त्याग देना पड़ा उनकी प्राप्ति लाहिड़ी महाशय ने गृहस्थ जीवन जीते हुए कर लिया। यही उनकी महानता है। “व्यावसायिक और सामाजिक कर्त्तव्यों को निभाते निभाते ध्यान धारणा का समय ही कहाँ मिलता है।“ आज के समय में प्रचलित इस प्रकार के सामान्य प्रतिवादों का खंडन करने के लिए परमहंस योगानन्द ने अपनी पुस्तक ‘योगी कथामृत’, में अपनी आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन करते हुए, इस महान् गुरु के जीवन से विश्व को परिचित कराया है। योगावतार के नाम से प्रसिद्ध लाहिड़ी महाशय न तो कोई संन्यासी थे और न ही कोई विरक्त।वे एक विवाहित गृहस्थ थे, जिनके पास परिवार और नौकरी की तमाम जिम्मेदारियाँ थीं। उनका जीवन यह सिखाता है कि सांसारिक दायित्वों को निभाते हुए भी व्यक्ति ईश्वर को प्राप्त कर सकता है और उच्च आध्यात्मिक अवस्था तक पहुँच सकता है। कमल के समान इस संसार की दलदल से पृथक, आंतरिक वैराग्य के साथ ईश्वरीय चेतना में रहने वाले इस महान् गुरु ने आश्वस्त किया कि ईश्वर की प्राप्ति आत्म प्रयास से ही संभव है।
इस महान् गुरु का जन्म 30 सितम्बर 1828 को योगावतार श्यामाचरण लाहिड़ी (1828-1895) के रूप में घुरणी, बंगाल में एक पवित्र परिवार में हुआ था। उन्होने सन् 1846 में श्रीमती काशीमणि के साथ पवित्र वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया और वैदिक अनुशासन के अनुसार गृहस्थाश्रम का पालन किया। इस विवाह युति से चार सन्तानों का जन्म हुआ। उन्होंने वाराणसी के पवित्र नगर में एक अकाउंटेंट के रूप में साधारण जीवन व्यतीत किया। सन् 1861 में, तैंतीस साल की आयु में हिमालय के रानीखेत पर्वतों में अमर गुरु महावतार बाबाजी से पहली बार उनकी भेंट हुई थी। यह भेंट वस्तुतः गुरु और शिष्य के मध्य विद्यमान शाश्वत बन्धन का पुनर्जागरण था। बाबाजी ने श्यामाचरण को क्रियायोग की पवित्र दीक्षा प्रदान की।युवा लाहिड़ी महाशय गुरुदेव के चरणों में निरन्तर सात दिनों तक निर्विकल्प समाधि के आनन्द में निमग्न रहे। आठवें दिन उन्होंने बाबाजी से प्रार्थना की कि वे उन्हें उन निर्जन पर्वतों में सदैव अपने साथ ही रहने दें।लेकिन बाबाजी ने उनसे कहा कि “तुम्हारा जीवन आदर्श गृहस्थ-योगी का उदाहरण बनकर शहरों की भीड़भाड़ के बीच रहने के लिए है।.तुम्हें सच्चे जिज्ञासुओं को क्रियायोग के माध्यम से आध्यात्मिक दिलासा देने के लिए चुना गया है।.तुम्हारे सन्तुलित जीवन से यह बात उनकी समझ में आ जाएगी कि मुक्ति बाह्य त्याग पर नहीं, अपितु आन्तरिक वैराग्य पर निर्भर करती है।सहस्राब्दियों पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण ने मुक्ति की यह प्राचीन योग प्रविधि अर्जुन को प्रदान की थी तथा कालान्तर में यह पतंजलि और ईसा मसीह को ज्ञात थी। सदियों से ऐसी शिक्षाएँ गुप्त रखी जाती थीं और केवल संन्यासियों को ही दी जाती थीं। परन्तु लाहिड़ी महाशय के अनुरोध पर, बाबाजी इस बात के लिए सहमत हुए कि यह प्रविधि सभी सच्चे साधकों को प्रदान की जा सकती है।
बनारस स्थित अपने घर लौटकर, लाहिड़ी महाशय ने सच्चे जिज्ञासुओं अमीर-ग़रीब, राजा-रंक, या ऊंच-नीच का भेद किए बिना सभी को क्रियायोग में दीक्षित करना आरम्भ किया। यह प्राचीन प्रविधि, जैसा कि परमहंस योगानन्द ने कहा है, सीधे प्राण-शक्ति पर काम करती है, शारीरिक क्षय को धीमा करती है और आध्यात्मिक उन्नति को तीव्र करती है।
लाहिड़ी महाशय ने गृहस्थ जीवन का अनुसरण करते हुए संतुलित जीवन का सर्वाेत्तम उदाहरण आज के युग के लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। ईश्वर की आँखों में तो वे सिद्ध पुरुष थे ही, साथ ही मानव जीवन के नाटक में भी उन्होंने पूर्ण सफलता प्राप्त की थी।“योगावतार” के रूप में अत्यन्त सम्मानित, श्री लाहिड़ी महाशय ने संसार को क्रियायोग की एक स्थायी विरासत प्रदान की, जो एक ईश्वर-प्रदत्त मुक्ति की प्रविधि है। महान् गुरु ने योग की प्राचीन जटिलताओं को संक्षिप्त व्यावहारिक आध्यात्मिक वास्तविकताओं में परिणत किया जो गृहस्थों और संन्यासियों दोनों के लिए समान रूप से ग्राह्य थीं। लाहिड़ी महाशय ने 26 सितंबर, 1895 को वाराणसी में महासमाधि में प्रवेश किया। महासमाधि से कुछ दिन पहले उन्होंने शिष्यों से कहा कि मैं जा रहा हूँ, लेकिन क्रिया योग तुम्हारे साथ रहेगा। इसे कभी मत छोड़ना।
लाहिड़ी महाशय अपने शिष्यों से अक्सर कहा करते थे, मेरे मांस और हड्डियों को देखने क्यों आते हो, जबकि मैं हमेशा तुम्हारी कुटस्थ (आध्यात्मिक दृष्टि) के दायरे में मौजूद हूँ । लाहिड़ी महाशय शारीरिक रूप से काशी में अपने घर पर रहते हुए भी एक ही समय में कई अलग-अलग स्थानों पर अपने शिष्यों को दर्शन देते थे और उनकी सहायता करते थे।
परमहंस योगानंद अपनी पुस्तक योगी कथामृत मे लिखते हैं कि महान गुरु के एक प्रख्यात शिष्य श्री भूपेंद्र नाथ सान्याल ने उनको बताया कि सन् 1892 में युवावस्था में बनारस न जा पाने के कारण उन्होंने गुरु से आध्यात्मिक मार्गदर्शन की प्रार्थना की। भूपेंद्र के स्वप्न में लाहिड़ी महाशय प्रकट हुए और उन्हें दीक्षा दी। बाद में वह बालक बनारस गया और गुरु से दीक्षा मांगी। लाहिड़ी महाशय ने उत्तर दिया कि मैंने तुम्हें स्वप्न में दीक्षा दे दी है।
लाहिड़ी महाशय के डायरियों पर आधारित एक पुस्तक ’पुराण पुरुष’ में यह संभावना जताई गयी है साईं बाबा लाहिड़ी महाशय से क्रिया दीक्षा लेकर शिरडी चले गए थे। इसी पुस्तक के अनुसार उनके मुस्लिम शिष्य अब्दूल गफूर ,हलवाई विंदा जैसे गरीब लोग भी थे, वहीं काशी नरेश, ईश्वरी प्रसाद,नेपाल नरेश,कश्मीर नरेश व वर्धमान के राजा कालीकृष्ण ठाकुर जैसे बड़े लोग भी शिष्य थे।
लाहिड़ी महाशय के प्रमुख शिष्यों में से एक थे ज्ञानावतार स्वामी श्रीयुक्तेश्वर, जो गहन ज्ञान के धनी थे और जो बाद में परमहंस योगानन्द के गुरु बने। परमहंस योगानन्द क्रियायोग विज्ञान के विश्व के महानतम् प्रचारक बने। जैसे की स्वयं योगावतार ने भविष्यवाणी की थी, सन् 1946 में योगानन्द की पुस्तक “योगी कथामृत” में लाहिड़ी महाशय का जीवन चरित्र प्रकाशित किया गया। परमहंस योगानंद ने क्रियायोग की शिक्षाओं का प्रसार करने के उद्देश्य से सन् 1917 में रांची में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया तथा लॉस एंजिलिस में सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप (एसआरएफ़) की स्थापना की। वर्तमान में पूरे भारत में इसके 200 से अधिक ध्यान केन्द्र और मण्डलियाँ, पाच आश्रम और अनेक रिट्रीट केन्द्र हैं।
ये सभी वृतांत दर्शाते हैं कि लाहिड़ी महाशय केवल एक योगी नहीं थे, बल्कि आधुनिक युग के योगावतार थे जिन्होंने गृहस्थ जीवन को आध्यात्मिक साधना का सर्वाेत्तम उदाहरण बनाया।


(लेखक स्वतंत्र पत्रकार व स्तंभकार हैं)



