लेखक: मुनीश त्यागी
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हमारे देश के शहीदों जिनमें चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह आदि शामिल थे, ने देश की जनता के सामने एक प्रोग्राम रखा था जिसमें उन्होंने मांग की थी कि हमारे देश के मजदूरों को न्यूनतम वेतन मिलना चाहिए, सबको रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मिलना चाहिए, यूनियन बनाने का अधिकार मिलना चाहिए, मजदूरों को अपनी बात कहने की आजादी होनी चाहिए और देश के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल जनता के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।
शहीदों के इन महान विचारों को आगे बढ़ाते हुए, हिंदुस्तानी समाजवादी गणतंत्र संघ ने और उसके सदस्यों ने अपनी सारी जिंदगी, इन्हीं मांगों को स्वीकार करने के लिए आंदोलन किया और इनमें से बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानियों को काले पानी की सजा दी गई, मगर इन्होंने अपनी मांगे नहीं छोड़ीं। इसके बाद हमारा देश आजाद हुआ और भारत के संविधान में इन मांगों को प्रमुख स्थान दिया गया जिनमें कहा गया कि भारत में मजदूरों को न्यूनतम वेतन दिया जाएगा, समता, समानता का अधिकार दिया जाएगा, किसानों की फसलों का वाजिब दाम मिलेगा, पूंजीपतियों को धन संकेंद्रण की इजाजत नहीं दी जाएगी।
इसी भावना और इन्हीं सिद्धांतों और कानूनों के तहत हमारे देश में अनेक मजदूर कानून बनाए गए जैसे न्यूनतम वेतन अधिनियम, पेमेंट ऑफ वेजेस एक्ट, औद्योगिक विवाद अधिनियम, क्षतिपूर्ति अधिनियम, ईएसआई अधिनियम, प्रोविडेंट फंड अधिनियम, स्थाई नौकरी का अधिकार। इस तरह लगभग 48 श्रम कानून मजदूरों के हकों और अधिकारों की रक्षा करने के लिए बनाए गए।
पंडित नेहरू की सरकार के शासनकाल में इन कानूनों और नियमों का पालन किया गया। बहुत सारे मजदूरों को ये कानून मोहिया कराए गए। मगर उसके बाद धीरे-धीरे इन कानूनों को लागू करना कम हो गया और पूंजीपतियों ने अपना मनमारा व्यवहार शुरू कर दिया, जिस कारण देश में बहुत सारी यूनियनें बनीं, बहुत सारी मजदूर फेडरेशन्स बनीं और मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए, इन श्रम कानूनों को लागू करवाने की जंग छेड़ दी।
बहुत सारे आंदोलन किए गए। इन्हीं आंदोलनों के तहत हम भी मजदूरों के न्यूनतम मजदूरों के कानून लागू करवाने और मजदूरों के लिए बने, न्यूनतम वेतन अधिनियम लागू करने की मुहिम में शामिल हो गए और कई बार जेल गए, क्योंकि मेरठ के अधिकांश मजदूर विरोधी मालिकान, इन श्रम कानूनों को लागू नहीं करना चाहते थे और हमने श्रम कानून लागू करने की मुहिम छेड़ दी थी। इसी से चिढ़कर मेरठ के मालिकान की एक साजिश के तहत, पहले तो प्रशासन ने हमें “जिला बदर” करने का फरमान जारी किया गया और बाद में दीवान रबर के मालिक ने, इसी साजिश के तहत झूठे केस में फंसा कर, हमें जेल भिजवा दिया, जिसमें हमें 60 दिन जेल में रहना पड़ा और हमारे ऊपर एक साजिश के रूप में 17 धाराएं लगा दी गईं, जिसकी जमानत इलाहाबाद हाईकोर्ट से हुई थी। यहीं पर ध्यान देने वाली बात है कि उस समय हमारी आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। हमारे पास कोई रोजगार नहीं था। हमारी जमानत कराने में उस समय के साम्यवादी नेताओं,,,, सुखबीर सिंह हुड्डा, विजेंद्र सिंह सांगू, महकारसिंह, श्यामवीर राठी और मजदूर नेता धर्मपाल सिंह का बहुत बड़ा योगदान रहा था।
उस समय भी मजदूरों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि अधिकांश कारखानेदार, उद्योगपति और पूंजीपति वर्ग के लोग, अधिकांश श्रम कानूनों को लागू नहीं कर रहे थे, मजदूरों का न्यूनतम वेतन नहीं दे रहे थे, बोनस का पेमेंट नहीं करते थे, ईएसआई एक्ट को लागू नहीं करते थे, भविष्य निधि के प्रावधानों को लागू नहीं करते थे, जिस कारण मजदूरों को अपनी सुरक्षा कवच,,, “हड़ताल के अधिकार”,,, का इस्तेमाल करने पर मजबूर होना पड़ता था। 80 के दशक में भी हकीकत यह थी कि अधिकांश लुटेरे मालिक श्रम कानूनों को लागू करने को तैयार नहीं थे।
1991 में नई आर्थिक नीतियों और उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद जैसे इन श्रम कानूनों को लागू करने के चलन को तिलांजलि ही दे दी गई हो। इसके बाद अधिकांश पूंजीपति वर्ग, कारखानेदारों ने और उद्योगपतियों ने अधिकांश श्रम कानूनों का पालन नहीं किया, उनको लागू नहीं किया। धीरे-धीरे आर्थिक संकट बढ़ता चला गया और लाखों कारखाने बंद हो गये। जिस कारण करोड़ों मजदूरों की नौकरियां चली गईं, करोड़ों मजदूरों की जिंदगी पर संकट आ गया, जिसमें अधिकांश कारखानों के मालिकान ने मजदूरों को उनके देयों का कानूनी भुगतान नहीं किया।
मजदूरों को छटनी मुआवजा और कारखाना बंदी मुआवजे का भुगतान नहीं किया गया और और इस प्रकार मजदूरों के अरबों खरबों रुपए मालिकान डकार गए और और बहुत बड़े आश्चर्य की बात यह है कि इनमें से अधिकांश श्रम कानून तोड़ने वाले मालिकान के खिलाफ आज तक भी कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की गई। मजदूरों की कारखाना बंदी का मुआवजा उन्हें नहीं दिलवाया गया, उनकी ग्रेच्युटी उन्हें नहीं दिलवाई गई, उनका बोनस उन्हें नहीं दिलवाया गया।
1914 में मोदी सरकार आने के बाद यह उम्मीद की गई थी कि अपने नारों के तहत मोदी सरकार श्रम कानूनों का पालन करा कर, मजदूरों के हितों की रक्षा करेगी, उन्हें न्यूनतम वेतन का भुगतान कराएगी और श्रम कानूनों को लागू करवाएगी, मगर आज तो हालत और भी गंभीर हो गए हैं। आज बहुत सारे कारखानों में श्रम कानूनों को लागू नहीं किया जाता है, मजदूरों का न्यूनतम वेतन नहीं दिया जाता है, कारखाना बंदी का मुआवजा नहीं दिया जाता है, नौकरी से निकालने पर छंटनी मुआवजा नहीं दिया जाता है। मालिका द्वारा 90 परसेंट मजदूरों को नियुक्ति पत्र और वेतन पर्चियां नहीं दी जातीं। हालात यहां तक खराब है कि बहुत सारे कारखानों, बडी बडी दुकानों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में मजदूरों से 12, 12 घंटे काम कराया जाता है मगर उन्हें मासिक तनख्वाह सिर्फ 8 000 या ₹9000 ही दी जाती है। इस प्रकार उनका डबल ओवरटाइम तो क्या, उन्हें उनका न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जा रहा है।
असली हालात को हमारी बातों को और हमारी मांगों को सच साबित करते हुए, 2022 को हिंदुस्तान अख़बार में खबर आई कि भारत के 85% मजदूरों को न्यूनतम वेतन का भुगतान मालिकान द्वारा नहीं किया जाता है। इस खबर को पढ़कर बेहद अफसोस हुआ और बहुत बुरा लगा। बहुत सारे मजदूरों और मजदूर नेताओं, जजों और वकीलों के होश उड़ गए और हमें लगा कि 75 साल की आजादी के बाद भी मजदूरों को आजादी नहीं मिली है। जब हमने इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के जज को इस ख़बर की जानकारी दी तो वे आश्चर्य चकित हो गए।
एक और बहुत गज़ब की हकीकत का उल्लेख करना यहां बहुत जरूरी है। वह यह है कि इस देश के हजारों श्रम न्यायालयों और औद्योगिक ट्रिब्युनल्स में जो लाखों मजदूरों के केस चल रहे हैं। उनमें अधिकांश में मालिकान द्वारा मजदूरों के साथ जुल्म ज्यादती की गई हैं, उन्हें गैरकानूनी रूप से नौकरी से हटाया गया है, न्यूनतम वेतन का भुगतान नहीं किया गया है, ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं किया गया है, कार्य के दौरान हुई दुर्घटना के फल स्वरुप हुई मौत का क्षतिपूर्ति का मुआवजा नहीं दिया गया है, ईएसआई और प्रोविडेंट फंड का पैसा मजदूरों के वेतन से काट कर, संबंधित कार्यालयों में जमा नहीं किया गया है। इन लाखों मामलों में भी मालिकान और पूंजीपतियों ने श्रम कानूनों का पालन नहीं किया है और उनका सरेआम उल्लंघन किया है।
सरकार द्वारा मजदूरों को सस्ता और सुलभ न्याय देने में कोई यकीन नहीं है। हालात इतने खराब हैं कि अधिकांश श्रम न्यायालयों में पीठासीन अधिकारी नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में 26 श्रम न्यायालयों में से 16 श्रम न्यायालयों में पिछले तीन-चार साल से पीठासीन अधिकारी नहीं हैं और इंडस्ट्रियल लॉ रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशनों द्वारा लगातार धरने, प्रदर्शनों और ज्ञापन देने के बाद भी, सरकार इस और कोई ध्यान नहीं दे रही है और हजारों लाखों मजदूर और उनके परिवार सस्ते और सुलभ न्याय का इंतजार कर रहे हैं। मगर लगातार मांग करने के बाद भी सरकार ने जैसे मजदूरों को सस्ते और सुलभ न्याय से आंखें बंद की हुई हैं।
अगर कारखानों पर नजर दौड़ाई जाए तो हालत बहुत गंभीर हैं। लगभग सौ और पिछत्तर साल पहले और उसके बाद बनाए गए तमाम श्रम कानूनों को जैसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है और पूंजीपतियों ने अधिकांश श्रम कानूनों को लागू करना बंद कर दिया है। अधिकांश मजदूर गुलामों के स्तर तक पहुंच गए हैं। अब मजदूरों की सुनने वाला कोई नहीं है। सारे का सारा श्रम विभाग लगभग आंख बंद किए हुए बैठा है। उसने अपने अधिकारों अपने कर्तव्यों को तिलांजलि दे दी है और अब उनके यहां अधिकांश मजदूरों की समयबद्ध तरीके से कोई सुनवाई नहीं है। वे अंधे तमाशबीन बन गए हैं। मजदूर समर्थक कानूनों को सरकार ने लगभग खत्म कर दिया है और उनके स्थान पर मालिकान के इशारे पर और उनके मुनाफों को बढ़ाने के ध्यान में रखकर जो चार श्रम संहिताएं लायी गई हैं, वे मजदूरों के गले के आधुनिकतम फंदे हैं जो मजदूरों को आधुनिक गुलाम बनाने के अलावा कुछ भी नहीं है।
भारत की आजादी के 79 साल बाद भी अधिकांश मजदूरों को मालिकान के मनमाने शोषण और अन्याय से मुक्ति नहीं मिली है। सरकार और सत्ता वर्ग की इस निर्मम और क्रूर बेरुखी का नतीजा है कि आज भी मजदूरों को 85% मजदूरों को उनका न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है, 90% मजदूरों को नियुक्ति पत्र और वेतन पर्चियां नहीं मिलती हैं और बेहद परेशान करने वाली बात यह है कि सरकार का मजदूरों को न्यूनतम वेतन दिलाने का कोई इरादा नहीं है और यह मुद्दा उनके एजेंडे में ही नहीं है। अब तो हालात और भी खराब होते जा रहे हैं। नौकरियों के स्वरूप को बदलकर, स्थाई की जगह अस्थाई और टेंपरेरी किया जा रहा है। इन परिस्थितियों में हमारे अधिकांश मजदूर अपने संगठन बनाकर, मालिकान के इस अन्याय और शोषण का सामना नहीं करने की स्थिति में नहीं रह जायेंगे। इन परिस्थितियों में हमारे देश के समस्त मजदूर किसान छात्र नौजवान और बुद्धिजीवी मिलकर और एकजुट होकर ही संघर्ष के माध्यम से इस शोषण और अन्याय का सामना कर सकते हैं। हम तो यही कहेंगे,,,,
छात्र नौजवान एकता जिंदाबाद
किसान मजदूर एकता जिंदाबाद
श्रम कानूनों को पूरी तरह से लागू करो
श्रम कानून तोड़ने वाले मलिकान को सख्त सजा दो।
(लेखक श्रमिक नेता और वामपंथी विचारक हैं)





