(चन्द्रगुप्त-चाणक्य में नरेंद्र मोदी-वकील साहब तक गुरु-शिष्य परंपरा की अनूठी ऐतिहासिक कड़ी)


इतिहास की बड़ी यात्राएं हमेशा बड़े मंचों से ही शुरू नहीं होतीं। कई बार उनकी शुरुआत किसी छोटे से नगर, किसी साधारण मुलाकात या किसी अनुभवी व्यक्ति की उस एक नज़र से होती है, जो भीड़ में छिपी प्रतिभा को अपनी पारखी नजरों से पहचान लेती है। कई विश्व-प्रसिद्ध ऐसी हस्तियां मिल जाएंगी जिन्हें बचपन में इतिहास ने कोई योग्य गुरु या पहचान लिया और उसे अपने मार्गदर्शन में शिक्षा-दीक्षा देकर ऐसा तराशा कि वह बालक सिर्फ प्रसिद्ध ऐतिहासिक व्यक्तित्व बन गया। सामान्य भाषा में इसे गुरुशिष्य के रूप में जाना जाता है।
भारतीय सनातन जीवन शैली में गुरु वह महान व्यक्तित्व है जो शिष्य रूपी अनगढ़ मानव को शिक्षा के वेदी पर तराशकर पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करता है और यही व्यक्तित्व समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपना योगदान देकर महान परिवार, समाज, राज्य, शहर और राष्ट्र के निर्माण में योगदान देता है। गुरु की दृष्टि संभावनायें देखती है, शिष्य का परिश्रम उस संभावना को उपलब्धि में बदलता है और समय उन दोनों के योगदान को इतिहास में दर्ज कर देता है।
यूनानी इतिहास में अरस्तू और सिकंदर, भारत में गुरु समर्थ रामदास और छत्रपति शिवाजी महाराज, मुगल इतिहास में बैरम खां और अकबर, गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद), साम्ब्राडो आचरेकर और सचिन तेंदुलकर, संगीत में उस्ताद अलाउद्दीन खान और पंडित रविशंकर इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं। सिकंदर शासक में पैदा हुआ था, परंतु उसके राजा बनने से ही उस समय के महान दार्शनिक अरस्तू ने उसे दर्शन, राजनीति, विज्ञान और विचार की शिक्षा देकर ऐसा तराशा कि वह इतिहास में आज भी सिकंदर महान के रूप में जीवित है। गुरु समर्थ रामदास जी ने छत्रपति शिवाजी महाराज व्यक्तित्व और स्वराज की अवधारणा के निर्माण में गुरु की भूमिका निभाई। बैरम खां ने भी हुमायूँ के आकस्मिक मृत्यु के बाद बालक अकबर को ऐसा तराशा कि अकबर मुग़ल काल का सबसे महान सम्राट बन गया।
गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद) के व्यक्तित्व को निखारकर स्वामी विवेकानंद के रूप में विश्वविख्यात बनाया। क्रिकेट में रमाकांत आचरेकर ने सचिन की प्रतिभा को पहचानकर और निरंतर साधना के रास्ते में डालकर विश्व प्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी बना दिया। संगीत में उस्ताद अलाउद्दीन खान ने पंडित रविशंकर को तराशकर संगीत की दुनिया का बेताज बादशाह बना दिया। इन उदाहरणों में क्षेत्र अलग-अलग हैं, लेकिन सूत्र एक ही है-प्रतिभा की पहचान करना, मार्गदर्शन और संवर्धन के लिए तैयार किया। इसी कड़ी के आधुनिक उदाहरण हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में वकील साहब के नाम से जाने जानेवाले वरिष्ठ प्रचारक श्री लक्ष्मणराव इनामदार जी।
दुर्लभ कुलमा कुम्हार के, गढ़ि गढ़ि काढै खोट।
अंतर हाथ सहार दै, बाहर-बाहर चोट
संत कबीरदास के इस दोहे में मानव जीवन में गुरु और शिष्य के बीच संबंध का बहुत सटीक उदाहरण दिया है। गुरु शिष्य को ठीक उसी तरह संभालकर सुन्दर घड़ा का रूप देता है। जैसे एक कुम्हार मिट्टी (जिसे संसार सबसे निम्न श्रेणी की वस्तु समझता है), को भी तराशकर उसमें से छोटी-छोटी कमियों को दूर कर उसे सुन्दर घड़ा का रूप दे देता और वह घड़ा दैनिक जीवन का अत्यंत ही उपयोगी वस्तु बन जाता है। ठीक उसी प्रकार एक गुरु शिष्य को तराशकर उसके सर्वोत्तम भविष्य का निर्माण करता है। भारतीय इतिहास और संस्कृति में गुरु-शिष्य संबंध केवल शिक्षा की व्यवस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज निर्माण का एक महत्वपूर्ण परंपरा भी रहा है। क्योंकि एक-एक पूर्ण व्यक्तित्व मिलकर सम्पूर्ण सुसंगठित, सुसंस्कृत राष्ट्र का निर्माण करता है। गुरु रूपी एक एक व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण का मार्गदर्शक है। यहां गुरु साधन है और शिष्य साध्य।
जब हम नरेन्द्र मोदी जी के जीवन का इतिहास देखते हैं तो इनके जीवन और इतिहास प्रसिद्ध सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवन में अनूठी समानता मिलती है। विश्व प्रसिद्ध आचार्य चाणक्य जब मगध सम्राट महापद्मनंद के दरबार से अपमानित होकर तक्षशीला लौट रहे थे तो रास्ते में एक गुलाम बालक को “राजकीयम” नामक खेल खेलते हुए देखा जिसमें एक बालक राजा का अभिनय कर रहा था और राज्यदरबार लगाकर बैठा था तथा उस खेल के बाकी बच्चे दरबारी और अन्य अभिनय कर रहे थे। कुछ बच्चे फरियाद लेकर दरबार में उपस्थित थे। चाणक्य बड़ी ही उत्सुकता से उस राजा बने बालक को अभिनय देखते लगे। उन्हें उसमें भारत का भावी सम्राट दिखा और उन्होंने उस बालक को उसके मालिक से खरीद लिया तथा तक्षशीला लेकर आ गए। उस समय की ऐतिहासिक अनुश्रुतियों के अनुसार चन्द्रगुप्त की उम्र लगभग 11-12 वर्ष की रही होगी और आचार्य चाणक्य की उम्र लगभग 42-45 के बीच।
बालक चन्द्रगुप्त को तक्षशीला ले गए, जहां उसे लगभग 7-8 वर्षों तक वेद, सैन्य कला, राजनीति, कानून और युद्ध रणनीति की कठोर शिक्षा दी। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को केवल ज्ञान नहीं दिया, बल्कि उसे राज्य, समाज, राजनीति, कूटनीति और शक्ति संतुलन को समझने की दृष्टि प्रदान की। हम सभी को पता है कि इसका नया गुलाम बालक मौर्य साम्राज्य की स्थापना की जिसका मुख्यमंत्र ही प्रजा कल्याण था।
ठीक इसी तरह बाल नरेन्द्र मोदी वडनगर में अपने पिता की चाय की दुकान पर चाय बिक्री में हाथ बटाने के बाद संघ की शाखा में जाया करते थे। एक दिन वरिष्ठ संघ प्रचारक श्री लक्ष्मणराव इनामदार जी वडनगर शाखा में आए थे। उसी दिन बाल नरेन्द्र मोदी जी की मुलाकात उनसे हुई। उनके प्रोत्साहक गुजरती और सारगर्भित बौद्धिक (भाषण) ने नरेन्द्र मोदी के मन मस्तिष्क में अमिट छाप छोड़ी। इनामदार जी बालक मोदी के दिल में बस गए। उधर वकील साहब की नजरें भी नरेन्द्र मोदी पर अचूक से वंचित नहीं रहीं। उन्होंने उसी मुलाकात में बालक मोदी को संघ में बाल स्वयंसेवक की शपथ दिलाई। ये अद्भुत संयोग की बात कहें या पारख इतिहास के चन्द्रगुप्त और चाणक्य की तरह ही इस देव स्परूप मिलन में भी बालक मोदी मात्र आठ वर्ष के थे और वकील साहब 40-41 वर्ष के। और आगे चलकर वकील साहब ने नरेन्द्र मोदी को गढ़ने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इस तरह से एक तरफ चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को तराशा और दूसरी तरफ वकील साहब ने नरेन्द्र मोदी को। दोनों ही कहानियों में एक अनुभवी पारखी ने एक बालक में वह क्षमताएं देखीं, जिसे सामान्य दृष्टि शायद पहचान नहीं पाती। यहां महत्वपूर्ण विषय यह है कि किसी प्रतिभा को सही समय पर पहचानकर एक कुशल जौहरी ने नया दिशा दी। वाला एक गुलाम लड़का और एक चाय बेचने वाले लड़के को कोई पहचानता। लेकिन आज दोनों ऐतिहासिक पुरुष रूप में जुड़े हैं। इन दोनों ही कहानियों में समय और परिस्थितियां अलग-अलग थीं, क्षेत्र अलग थे, लेकिन दूर एक था, गुरु ने संभावना देखी और शिष्य ने उस संभावना को भावना में बदल दिया।
वडनगर का वह बालक वकील साहब के स्नेहमई मार्गदर्शन में आगे चलकर संगठन के अनुशासन से गुजरता हुआ स्वयंसेवक बना, फिर प्रचारक के रूप में कार्य किया और धीरे-धीरे संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालते संभालते गुजरात का मुख्यमंत्री और अब भारत का प्रधानमंत्री बन पूरे विश्व में भारत का नाम रौशन कर रहा है। यह यात्रा किसी एक दिन या किसी एक व्यक्ति के कारण पूरी हुई, ऐसा कहना भी सचित्र उचित नहीं होगा। किसी भी बड़े व्यक्तित्व के निर्माण में परिवार, समाज, शिक्षा, संगठन, अनुभव, संघर्ष, अवसर और स्वयं का परिश्रम, सभी की भूमिका होती है। बशर्ते बालक आसमान का पंछी हो या शिकारी का, उसकी तो धार गंगा की धार जैसा मुक्त हो जो सदियों इतिहास बनाती है।
फिर भी नरेन्द्र मोदी के एक झाड़ू पोछा करने और रेहड़ी पटरी पर नाम बेचनेवाले के परिवार से निकलकर इस स्थान पर पहुंचने की इस पूरी यात्रा में वकील साहब का स्थान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने प्रारंभिक अवस्था में उस बालक को समझने और सेवा की दिशा में जोड़ने और बाद के वर्षों में उनका मार्गदर्शन किया। वह भी तब जब की आज जितने संसाधन नहीं थे, जीवन यापन काफी कठिन था। तो ऐसे गरीब परिवार की हालत क्या रही होगी। कल्पना उचित नहीं होगा फिर भी प्रखण्डता परीशी की पराकाष्ठा इसी से समझी जा सकती है कि अपनी खुद की पत्नी के परिवार वालों के गरीबी और नहीं कमाने की वजह से नरेन्द्र मोदी को कितना पीना पड़ेगा। पानी के रहने वाले बिना अग्नि के आजीवन गरीबी की प्रताड़ना आजजीवन रही, प्यारो ने साथ रहने से मना कर दिया, ससुराल वालों ने अपनी बेटी दूसरी घर भेजने से मना कर दिया। उस व्यक्ति के साधना का ही कमाल है कि आज संसार के अनेक भंगेरे यहां हुए यहा तक पहुंचे है। और उस मार्गदर्शक का कमाल है जिसने ऐसे बुरे वक्त में उस बालक को स्थिरस्तकर ऐसा बनाया कि आज वह विश्व प्रसिद्ध बन रहा।
चन्द्रगुप्त तौर नरेन्द्र मोदी की जीवन की सफलता देखिए एक को गरीबी की माँ से न मां के रूप में श्रेय में मिला और दूसरे को गरीबी और परिस्थितियों ने ऐसा झोंका कि घर बार छोड़कर की जिंदगी जंगो को मजबूर हो गयी। दोनों ही थियेटरों में एक अनुभवी मार्गदर्शक और जीवन की शुरुआत में खड़ा एक बालक दिखाई देता है। एक का संबंध प्राचीन इतिहास और वीरगाथाओं में दर्ज है, दूसरा आधुनिक भारत के सार्वजनिक जीवन का ज्वलंतजीवंत प्रमाण है।
एक बालक में भविष्य का नेतृत्व दिखाई देना वास्तव नहीं अपितु उनके लिए अनुभव, दृष्टि और चरित्र को समझने की क्षमता चाहिए। दूसरी तरफ शिष्य के भीतर सीखने, अनुशासन स्वीकार करने और लगातार आगे बढ़ने की इच्छा भी आवश्यक होती है। चाणक्य के पास राजनीतिक दृष्टि थी और चन्द्रगुप्त के पास नेतृत्व की कुश्ती। वकील साहब के पास संगठनात्मक अनुभव था और नरेन्द्र मोदी के भीतर आगे बढ़ने की अटूट इच्छा जिज्ञासा तथा परिश्रम की क्षमता। इतिहास में गुरु कभी शिष्य के चयन पर हाथ साफ करता होगा वह दिशा दिखाता है, अवसर देता है, अनुशासन सिखाता है और कठिन समय में मार्गदर्शन करता है। अंतिम यात्रा शिष्य को स्वयं करनी होती है। श्रेय देना है कि चक्रवर्ती साम्राज्य का नाम चन्द्रगुप्त के साथ आएगा तक तब वकील साहब का नाम नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा के साथ भी याद किया जाएगा। 7 अक्टूबर 2001 को उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। 2025 में प्रधानमंत्री कार्यालय में भी इस यात्रा को रेखांकित करते हुए बताया कि 7 अक्टूबर 2001 को मुख्यमंत्री पद के संपादन के बाद से सरकार के प्रमुख के रूप में अपने 25वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। वर्ष 7 अक्टूबर 2026 को उनका राजनीतिक सफर का 25 वर्ष पूरा होगा तब लक्ष्मणराव जीवन को जोड दे तो वास्तव 67 वर्ष हो गया। इस यात्रा के रूप में पूरे देश के प्रधानमंत्री के रूप में आज दुनिया में नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में हासिल की गई उपलब्धियों को लेखा जोखा तकतक अधूरी रहेगी जबतक उनके प्रारम्भिक जीवन के उन अध्यायों पर नजर न डाला जाय जहां से उनकी यात्रा शुरू हुई.
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और लेखक हैं)



