लोकतंत्र को बचाने और मजबूत करने के हर कदम का कोई स्वागत करे या ना करे लेकिन लोकतंत्र खुद अपनी जड़ों को मजबूत करता जा रहा है. सेव डेमोक्रेसी मार्च देश में डेमोक्रेसी की मजबूत जड़ों का नमूना है.
लोकतंत्र के नाम पर सियासी अरमान सब पूरा करना चाहते हैं, लेकिन उसकी मर्यादा और स्वाभिमान की रक्षा करने वाले को लोकतंत्र पहचान लेता है.
चुनाव आयोग ही सांसदों को चुनावी जीत का प्रमाण पत्र देता है. विपक्षी सांसदों ने चुनाव आयोग के खिलाफ़ दिल्ली में लोकतंत्र बचाओ मार्च निकाला है. लोकतंत्र ने ऐसा किया है जिसके कारण कांग्रेस पार्टी फ्रस्ट्रेशन के चरम पर पहुंच गई है. जो पचास साल से ज्यादा देश में शासन करती रही, जो पार्टी चुनाव आयोग में खुद नियुक्ति करती रही,चुनाव आयुक्तों को रिटायरमेंट के बाद पद, पुरस्कार और मंत्री पद देती रही वह चुनाव आयोग को लोकतंत्र का हत्यारा बता रही है.
चुनाव आयोग तो एक बहाना है, असली निशाना मोदी सरकार को हटाना है. भारत के लोकतंत्र में जो बदलाव आया, उससे कांग्रेस में घबराहट है. उनको लगता है कि लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव में जीत दर्ज करना उनके लिए दूर की कौड़ी है. वह भ्रम की राजनीति के जरिए अराजकता पैदा करना चाहते हैं.
कांग्रेस की ऐसी अनुभूति है कि अतीत में उसके खिलाफ़ ऐसे ही परसेप्शन बनाए गए. चाहे आपातकाल के खिलाफ़ माहौल बनाया गया हो, बोफोर्स का करप्शन का मामला उछाला गया हो, यूपीए सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के अभियान चलाए गए हों, सभी मामलों में उसके विरोधियों द्वारा फेक नेरेटिव बनाकर उसकी सत्ता छीनी गई. किसी भी मामले में कोई प्रमाण नहीं होने के बाद भी नेरेटिव बना. मतदाता भ्रमित हुए और उसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा.
पार्टी इसी रणनीति पर अब खुद आगे बढ़ रही है. वह जानती है, कि वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण प्रक्रिया के अंतर्गत हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट में भी इसके मामले गए, लेकिन प्रक्रिया को रोका नहीं गया.
कांग्रेस अपने दांव चल रही है, तो बीजेपी भी लगातार अपना नेरेटिव जनता के बीच में ला रही है. लोकतंत्र को राजनीतिक दल नहीं बल्कि देश के लोग बचाते और मजबूत करते हैं. राजनीति में जो बदलाव आया है, मोदी सरकार पहली बार जब बनी, तब हुए चुनाव कांग्रेस की सरकार के दौरान ही हुए थे. उस समय के चुनाव आयुक्त कांग्रेस द्वारा ही नियुक्त किए गए थे.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बीजेपी की मदद करने का आरोपी बताने वाली कांग्रेस यह जानती है कि उनकी नियुक्ति तीनों लोकसभा चुनाव के बाद हुई है. तीनों बार बीजेपी को जो विजय मिली है, उसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कोई भूमिका नहीं है. फिर भी लोगों के बीच संदेह पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं.
सियासत में सच और झूठ अपने-अपने होते हैं. एक ही मुद्दे पर दो राजनीतिक दल दो तरह की बात रखते हैं. उनकी बातों की सत्यता मतदाताओं को आंकना होता है. लोकतंत्र में जनादेश ही अंतिम पैमाना होता है. अब तो कोशिश यह हो रही है कि इस पैमाने को ही संदिग्ध बना दिया जाए.
राहुल गांधी वोट चोरी के नेरेटिव काफी पहले से खड़े कर रहे हैं. उनके इस नेरेटिव का कांग्रेस को तो कोई फायदा नहीं हुआ लेकिन इतना लाभ जरूर मिला कि जिन क्षेत्रीय दलों ने उनके जनाधार को लूटा था, वह सब एक-एक करके अपने-अपने राज्यों में धराशाई हो रहे हैं.
भारत में अराजकता की मानसिकता नहीं है. लोकतंत्र के असली रक्षक भारत के लोग हैं. जब भी लोकतंत्र पर वह खतरा महसूस करते हैं तब जनादेश ऐसा फैसला करता है जो गवर्नेंस और राजनीति की दिशा बदल देता है. लोकतंत्र कांग्रेस की पुरानी नीतियों से काफी आगे निकल चुका है.
सिलेक्टेड डेवलपमेंट की शैली से डेवलपमेंट फॉर ऑल तक लोकतंत्र मार्च कर चुका है. अब जो भी नीतियां बन रही हैं, वह सबके लिए हैं. जनधन में चोरी से डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर तक लोकतंत्र मार्च कर चुका है. भारत का लोकतंत्र आतंकवादी घटनाओं में पाकिस्तान को डोजियर देने में अब भरोसा नहीं रखता.
अब घर में घुसकर आतंकवादियों को मारने के ऑपरेशन सिंदूर तक देश पहुंच गया है. जिसे वोट चोरी कहा जा रहा है, वह वास्तव में दिल चोरी का मामला है. मोदी सरकार के जनहित के कामों ने लोगों का दिल चुराया है. यही दिल ईवीएम में वोट के रूप में बोलता है.
विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी को यह अधिकार है कि वह संसद में अथवा सड़क पर सरकार के विरोध में अपनी बात कह सकते हैं. लोकतांत्रिक मर्यादा और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा के प्रति जरूर उन्हें जवाबदेह दिखना होगा. उनके हर कदम को जनता देख रही है.
बीजेपी ने विपक्ष के लोकतंत्र बचाओ मार्च पर प्रतिक्रिया में भारत के मतदाताओं की यह कहकर प्रशंसा की, कि उनकी जीत ज्ञानेश के कारण नहीं, गणेश के कारण हो रही है. इसको स्पष्ट करते हुए भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि भगवान गणेश बुद्धि, विवेक और ज्ञान के देवता हैं. मतदाताओं के बुद्धि विवेक और ज्ञान के कारण बीजेपी जीतती है. जितनी देश में जागरूकता बढ़ रही है, कांग्रेस के अतीत और वर्तमान कारनामे जहां-जहां तक पहुंच रहे हैं, उनमें इतनी बुद्धि है कि वह विवेकपूर्ण फैसला ले सकें.
मतदाताओं के विवेकपूर्ण फैसलों को वोट चोरी बताना उनको चिढ़ाना है. जिस आयोग का जीत प्रमाण पत्र लेकर सांसद बने हैं, उसको ही चोर-चोर के नारे लगा रहे हैं. सांसद रहते हुए चुनाव आयोग को चोर कहना, चोर मचाए शोर माना जाएगा.
नेरेटिव वार में आखिरी फैसला जनादेश का होगा. ना राहुल का होगा, ना ज्ञानेश का होगा. लोकतंत्र सुरक्षित है. उसको असुरक्षित करने वाले अपनी सुरक्षा की चिंता करें.


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



