लेखक -अमित मिश्रा
विजयादशमी पर देश के अनेक शहरों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का पथ संचलन निकला। हजारों स्वयंसेवक सड़कों पर उतरे, कदम से कदम मिलाकर चले और घोष की लय के साथ अनुशासन का परिचय दिया। इन आयोजनों ने एक महत्त्वपूर्ण सवाल सामने रखा—क्या बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी वाला कार्यक्रम आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी दिए बिना संपन्न हो सकता है? आज जब सार्वजनिक उत्सवों के साथ तेज संगीत, लंबे जाम और सड़कों पर बिखरे कचरे की समस्या जुड़ती जा रही है, तब पथ संचलन का उदाहरण इस सवाल का व्यावहारिक उत्तर प्रस्तुत करता है। उत्सव की भव्यता बनाए रखते हुए भी सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक सुविधा का ध्यान रखा जा सकता है।भारत उत्सवों और सामूहिक आयोजनों का देश है। धार्मिक पर्व, सांस्कृतिक कार्यक्रम, विवाह समारोह और राजनीतिक रैलियां सामाजिक जीवन में उत्साह और सहभागिता का संचार करते हैं। लेकिन उत्सव का आनंद तब दूसरों के लिए परेशानी बन जाता है, जब सड़कें घंटों बंद रहें, ध्वनि से लोगों की नींद और स्वास्थ्य प्रभावित हों या आयोजन के बाद सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी छोड़ दी जाए। सड़कें किसी एक समूह की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा संपत्ति हैं। इनका उपयोग राहगीरों, कामकाजी लोगों, विद्यार्थियों, मरीजों और आपातकालीन सेवाओं को भी करना होता है। इसलिए सार्वजनिक आयोजन की सफलता केवल प्रतिभागियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होनी चाहिए कि उससे आम लोगों की दिनचर्या कितनी प्रभावित हुई।किसी भी बड़े आयोजन को व्यवस्थित बनाने की पहली शर्त है—पूर्व नियोजन। मार्ग और समय को लेकर अनिश्चितता यातायात संबंधी समस्याओं को बढ़ाती है, जबकि पहले से तय कार्यक्रम प्रशासन और नागरिकों, दोनों को तैयारी का अवसर देता है। उदाहरण के लिए, नागपुर में पिछले वर्ष तीन पथ संचलनों के मार्ग पहले से घोषित किए गए थे। तीनों संचलन शाम सात बजे अलग-अलग स्थानों से शुरू होकर 7:45 बजे वेरायटी चौक पर एक साथ पहुंचे। इस तरह की समयबद्ध व्यवस्था से कार्यक्रम का संचालन अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिलती है।हालांकि, केवल मार्ग और समय घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। आयोजन समिति, पुलिस, यातायात विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय भी जरूरी है। वैकल्पिक रास्तों की जानकारी, संवेदनशील स्थानों पर यातायात प्रबंधन और एंबुलेंस सहित आपातकालीन वाहनों के लिए रास्ता खुला रखना योजना का हिस्सा होना चाहिए। यदि इन व्यवस्थाओं पर पहले से ध्यान दिया जाए, तो बड़े आयोजनों के दौरान भी आम नागरिकों की असुविधा कम की जा सकती है।पथ संचलन का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष स्वयंसेवकों का कतारबद्ध चलना और सामूहिक लय बनाए रखना है। अनुशासित ढंग से आगे बढ़ने पर भीड़ का अनियंत्रित फैलाव कम होता है और सड़क पर आवागमन लंबे समय तक बाधित होने की आशंका घटती है। यह अनुशासन केवल आयोजन के दिन दिखाई देने वाला व्यवहार नहीं, बल्कि नियमित अभ्यास और सामूहिक जिम्मेदारी से विकसित होने वाली आदत है। दूसरे सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए भी इससे सीख ली जा सकती है कि भीड़ का आकार चाहे जितना बड़ा हो, उचित प्रबंधन और आपसी तालमेल से व्यवस्था बनाए रखना संभव है।ध्वनि का प्रश्न भी सार्वजनिक आयोजनों में विशेष ध्यान देने योग्य है। तेज डीजे और देर रात तक बजने वाले लाउडस्पीकर को उत्सव का अनिवार्य हिस्सा मान लेना उचित नहीं है। अस्पतालों, विद्यालयों और आवासीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जरूरतों का सम्मान करना आयोजकों की जिम्मेदारी है। पथ संचलन में घोष की लय सामूहिकता का भाव पैदा करती है, लेकिन किसी भी आयोजन में ध्वनि का स्तर निर्धारित नियमों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। उत्साह व्यक्त करने के ऐसे तरीके अपनाए जा सकते हैं, जिनसे दूसरों के स्वास्थ्य, नींद और शांति पर अनावश्यक असर न पड़े।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में चर्चा में आया ‘पंच परिवर्तन’ अभियान भी नागरिक व्यवहार के इस व्यापक प्रश्न से जुड़ता है। इसके पांच आयाम हैं—स्व-बोध, नागरिक कर्तव्य, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और कुटुंब प्रबोधन। इनका उद्देश्य व्यक्ति और समाज के बीच जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करना है। स्वच्छता, समयपालन, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और कानून का सम्मान केवल सरकारी निर्देशों के विषय नहीं हैं; इन्हें सामाजिक संस्कार का हिस्सा बनाना भी जरूरी है। सह सरकार्यवाह आलोक कुमार ने भी नागरिकों से अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों और दूसरों के अधिकारों का ध्यान रखने का आग्रह किया है। सार्वजनिक आयोजनों में इस विचार की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।उत्सव मनाना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार के साथ दूसरों की सुविधा का सम्मान करने की जिम्मेदारी भी आती है। धार्मिक आस्था, सामाजिक परंपरा या व्यक्तिगत खुशी के नाम पर यातायात रोकना, निर्धारित समय के बाद तेज ध्वनि जारी रखना और सार्वजनिक स्थानों पर कचरा छोड़ना उचित नहीं ठहराया जा सकता। नियमों का पालन किसी आयोजन की गरिमा कम नहीं करता, बल्कि उसे अधिक जिम्मेदार बनाता है। यही बात गणेशोत्सव, दुर्गा विसर्जन, विवाह समारोहों और राजनीतिक रैलियों पर भी लागू होती है।हर आयोजक कुछ बुनियादी उपाय अपनाकर इस दिशा में योगदान दे सकता है। कार्यक्रम का मार्ग और समय पहले से घोषित किया जाए तथा प्रशासन के साथ तालमेल रखा जाए। ध्वनि का स्तर नियंत्रित हो और अस्पतालों, विद्यालयों तथा रिहायशी इलाकों में विशेष सावधानी बरती जाए। सड़क का पूरा हिस्सा घेरने के बजाय सामान्य यातायात और आपातकालीन वाहनों के लिए पर्याप्त जगह छोड़ी जाए। कार्यक्रम निर्धारित समय पर समाप्त हो और आयोजन के बाद सड़क तथा आसपास के सार्वजनिक स्थानों की सफाई की जिम्मेदारी आयोजक स्वयं लें। ये उपाय छोटे जरूर हैं, लेकिन सामूहिक रूप से शहरों की व्यवस्था और नागरिक जीवन की गुणवत्ता में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।इसके लिए प्रशासन की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। नियम सभी आयोजनों पर समान रूप से लागू हों और व्यवस्था आयोजन की प्रकृति, प्रतिभागियों की संख्या तथा स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जाए। उद्देश्य उत्सवों पर अनावश्यक रोक लगाना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना होना चाहिए जिसमें लोगों को अपनी परंपराओं और खुशियों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता मिले और दूसरे नागरिकों के अधिकार भी सुरक्षित रहें। उत्सव और व्यवस्था के बीच संतुलन ही स्वस्थ सार्वजनिक जीवन की पहचान है।विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है। आज इसके संदेश को व्यापक अर्थ में देखने की जरूरत है। जिस तरह बुराई पर विजय के लिए संयम, संकल्प और सही आचरण आवश्यक हैं, उसी तरह सार्वजनिक जीवन में भी शोर, दिखावे और अव्यवस्था पर नियंत्रण जरूरी है। किसी आयोजन की भव्यता उसकी आवाज की तीव्रता या सड़क पर उसके विस्तार से नहीं, बल्कि उसके अनुशासन और सामाजिक संवेदनशीलता से तय होनी चाहिए।पथ संचलन का संदेश स्पष्ट है—सामूहिक उत्साह और नागरिक अनुशासन साथ-साथ चल सकते हैं। यदि धार्मिक आयोजनों से लेकर विवाह समारोहों और राजनीतिक रैलियों तक यह समझ विकसित हो जाए कि खुशी मनाने का अधिकार दूसरों को परेशान करने का अधिकार नहीं है, तो शहरों में जाम, ध्वनि प्रदूषण और गंदगी जैसी समस्याओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उत्सव समाज को जोड़ने के लिए होते हैं, उसे असुविधा में डालने के लिए नहीं। आयोजन कितना बड़ा है, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि वह कितनी मर्यादा, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ संपन्न होता है। यही उत्सव संस्कृति को अधिक सभ्य, अनुशासित और नागरिक हितैषी बनाने की दिशा है।
(लेखक सामाजिक चिंतक हैं)





