(संजय राय) (नई दिल्ली)
कोविड काल में सरकारी अस्पतालों में सुविधा नहीं मिलने पर निजी अस्पताल में इलाज कराने का खर्च चुकाने का आदेश
मान्यता प्राप्त पत्रकार कल्याण समिति ने फैसले का किया स्वागत


दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकारी अस्पतालों में आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण यदि किसी मान्यता प्राप्त पत्रकार या उसके परिजन को निजी अस्पताल में इलाज कराना पड़ता है, तो सरकार चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति से इनकार नहीं कर सकती। अदालत ने दिल्ली सरकार को एक पत्रकार की पत्नी के इलाज पर खर्च हुई 11.83 लाख रुपये की शेष राशि आठ सप्ताह के भीतर चुकाने का निर्देश दिया है।न्यायमूर्ति अमित महाजन की पीठ ने यह फैसला रविंदर गुप्ता बनाम स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक, दिल्ली सरकार मामले में सुनाया। दिल्ली सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार रविंदर गुप्ता ने अपनी पत्नी के इलाज पर सर गंगा राम अस्पताल और सर गंगा राम सिटी अस्पताल में खर्च हुए 11,83,105.21 रुपये की प्रतिपूर्ति की मांग की थी। उनकी पत्नी को अगस्त 2021 में गंभीर बीमारी के चलते तत्काल संवहनी शल्य चिकित्सा की जरूरत थी। जीबी पंत अस्पताल में आवश्यक सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें निजी अस्पताल रेफर किया गया था।गुप्ता ने दिल्ली प्रेस रिपोर्टर एवं चिकित्सा सहायता नियम, 1955 के तहत प्रतिपूर्ति का दावा किया था। हालांकि, स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक ने जुलाई 2025 में यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि सर्जरी आपातकालीन प्रकृति की नहीं थी।अदालत ने अस्पताल के आपातकालीन प्रमाणपत्र और जीबी पंत अस्पताल के रेफरल का परीक्षण करने के बाद माना कि मरीज को तत्काल भर्ती और उपचार की आवश्यकता थी। सरकार की इस दलील को भी अदालत ने खारिज कर दिया कि नियमों के तहत निजी अस्पताल में इलाज की प्रतिपूर्ति केवल सरकारी अस्पतालों में हड़ताल होने की स्थिति में ही की जा सकती है। अदालत ने कहा कि कोविड काल में सरकारी अस्पतालों को कोविड अस्पताल घोषित किए जाने और हड़ताल के कारण सामान्य मरीजों को नियमित चिकित्सा सुविधाएं नहीं मिल पाने की परिस्थितियां मरीज के दृष्टिकोण से समान हैं।हाईकोर्ट ने प्रतिपूर्ति का दावा खारिज करने वाले सरकारी आदेश को निरस्त करते हुए आठ सप्ताह में पूरी शेष राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया। साथ ही, जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी से इस राशि की वसूली करने की स्वतंत्रता भी सरकार को दी।इस फैसले का मान्यता प्राप्त पत्रकार कल्याण समिति ने स्वागत किया है। समिति के महासचिव रजनीकांत तिवारी ने कहा कि यह निर्णय केवल एक पत्रकार को चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि पत्रकारों और उनके परिवारों की स्वास्थ्य सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से पत्रकारों के लिए एक समान और स्पष्ट चिकित्सा सहायता नीति बनाने की मांग की।तिवारी ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने, विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी या आपातकालीन परिस्थितियों में निजी अस्पतालों में इलाज कराने पर प्रतिपूर्ति के नियम सरल और पारदर्शी होने चाहिए। चिकित्सा दावों के निस्तारण के लिए समय-सीमा तय करने और अनावश्यक प्रशासनिक अड़चनों को दूर करने की भी जरूरत है। उन्होंने कहा कि आपातकालीन स्थिति में मरीज की जान बचाना प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि उसे पूर्व अनुमति और कागजी औपचारिकताओं में उलझाना।



