
लेखक-अरविंद जयतिलक
आज राष्ट्रीय कैंसर जागरुकता दिवस है। कैंसर भारत सहित दुनिया भर में गैर-संचारी रोगों की वजह से होने वाली बीमारियों एवं मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। भारत में कैंसर का खतरा लगातार बढ़ रहा है। 29 अप्रैल, 2026 को जारी राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यालय (एनसीआरपी) की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 2 लाख, 31 हजार 671 नए कैसर मामलों का अनुमान लगाया गया है, जो कि देश के सभी राज्यों में सबसे ज्यादा है। 2030 तक यह आंकड़ा 2 लाख, 54 हजार तक पहुंचने का अनुमान है। इसी तरह आंध्रप्रदेश में 65000, असम में 51734, तेलंगाना में 46762 कैंसर के नए मामले सामने आए हैं। देश के अन्य राज्यों की भी तकरीबन ऐसी ही स्थिति है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 8 जुलाई, 2026 को अपनी ग्लोबल स्टेटस रिपोर्ट आॅन कैंसर 2026 जारी की है। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में भारत में कैंसर के 15.6 लाख नए मामले दर्ज किए गए हैं। भारत में 2024 के दौरान कैंसर से 9,01,828 मौतें हुई जबकि करीब 33.2 लाख लोग निदान के बाद जीवन जी रहे हैं। वैश्विक स्तर पर बात करें तो वर्ष 2024 में विश्व भर में कैंसर के लगभग 2.06 करोड़ नए मामले सामने आए हैं और लगभग एक करोड़ लोगों की मौत हुई है। माना जा रहा है कि अगर इस स्थिति पर नियंत्रण नहीं लगा तो वर्ष 2050 तक कैंसर के नए मामलों की संख्या 3.5 करोड़ वार्षिक तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में हर पांच में से एक व्यक्ति को अपने जीवन काल में कभी न कभी कैंसर होने की आशंका है। इसके अलावा परिवार के किसी सदस्य के निदान को शामिल करें तो लगभग 92 फीसद लोग किसी न किसी रुप में इस बीमारी से प्रभावित होते हैं। अच्छी बात यह है कि 2010 से वैश्विक स्तर पर तंबाकू के उपयोग में 27 फीसद की गिरावट आई है जिससे फेफड़ों के कैंसर के मामलों में कुछ कमी आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर के उपचार के विकल्प को मात्र तीन तरीके से पाटा जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले वैश्विक समुदाय को विकासशील देशों में कैंसर की जांच के लिए कार्यक्रम चलाने में मदद देनी चाहिए। इसके तहत रेडियोथेरेपी मशीनें उपलब्ध कराने के साथ ही भारत सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की तरह आम लोगों के लिए बुनियादी स्वास्थ्य बीमा को अपनाने का बढ़ावा दिया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हर साल कैंसर के उपचार में पूरी दुनिया में 320 अरब डाॅलर का निवेश किया जाता है तो कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या आधी हो जाएगी। अगर सर्वाइकल व स्तन कैंसर से पीड़ित महिलाएं समय रहते पपानीकोलाउ (पैप) स्मीयर और मैमोग्राम स्क्रीनिंग टेस्ट कराकर तुरंत इलाज कराएं तो इस भयंकर बीमारी से छुटकारा मिल सकता है। आईएमआरसी के मुताबिक बेहतर उपचार होने की स्थिति में बचने वाले पांच मरीजों में से चार विकासशील देशों के होंगे। लेकिन विडंबना है कि कैंसर पीड़ित मरीजों विशेषकर महिलाओं में इस भयावह बीमारी को लेकर जागरुकता का घोर अभाव है और दूसरा तथ्य यह भी कि उन्हें समय पर इलाज भी नहीं मिल रहा है। भारत की बात करें तो तकरीबन 15 लाख कैंसर के नए मामले हर वर्ष सामने आते हैं। एक रिपोर्ट सेें उद्घाटित हो चुका है कि हर आठ मिनट में ग्रीवा के कैंसर से एक महिला की मौत होती है। हर दिन दो हजार से अधिक लोगों की मौत तंबाकू सेवन से उपजे कैंसर के कारण होती है। 19 वर्ष की उम्र तक हर वर्ष तकरीबन 50 हजार बच्चे कैंसर के शिकार होते हैं। 20 हजार बच्चे इलाज के अभाव में और 30 फीसदी बच्चे जांच न हो पाने के कारण दम तोड़ देते हैं। अच्छी बात यह है कि 2016-18 के दौरान ‘वी कैन, आई कैन’ की थीम निर्धारित किए जाने के बाद कैंसर को लेकर जागरुकता बढ़ी है। इसका उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के सामूहिक व व्यक्तिगत स्तर पर वैश्विक रुप से कैंसर की रोकथाम की दिशा में प्रयास करना है। देखा भी जा रहा है कि इस थीम के तहत लोगबाग अपनी जीवनशैली को स्वस्थ रखकर तथा परिवार एवं समुदाय को इसके प्रति जागरुक रखकर कैंसर की रोकथाम और उससे बचाव की दिशा में अहम योगदान कर रहे हैं। यह इसलिए भी आवश्यक है कि गत वर्ष अमेरिकन कैंसर सोसायटी और प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट ने दावा किया जा चुका है कि वर्ष 2030 तक कैंसर से होने वाली मौतों में 60 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है। उसके मुताबिक कैंसर से सालाना 55 लाख महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है। दरअसल विशेषज्ञों ने शोध में पाया है कि वर्तमान समय में दुनिया की प्रत्येक 7 महिलाओं की मौतों में एक की मौत कैंसर से हो रही है। एक अन्य शोध से उद्घाटित हुआ है कि 2030 तक सर्वाइकल (बच्चेदानी का मुंह) कैंसर से पीडित महिलाओं की संख्या में 25 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है। उल्लेखनीय है कि मौजूदा समय में सर्वाइकल कैंसर की चपेट में आकर हर साल दुनिया में तकरीबन तीन लाख महिलाओं की मौत हो रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो सर्वाइकल कैंसर के कारण दम तोड़ने वाली महिलाओं की 85 फीसदी आबादी केवल विकासशील देशों से है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर गौर करें तो कैंसर से सर्वाधिक प्रभावित लोग अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका के हैं। कैंसर के कारण मरने वाले 70 फीसदी से अधिक लोग इन्हीं तीन महाद्वीपों के होते हैं। चिंता की बात यह भी कि कैंसर से पीड़ित महिलाओं के सर्वाधिक मामले भी गरीब देशों में ही देखे जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक विगत वर्षों में महिलाओं के कैसर के मामलों में सर्वाधिक मौतें गरीब देशों में हुई है। उल्लेखनीय तथ्य यह कि गरीब देशों में कैंसर से होने वाली कुल मौतों में दो तिहाई स्तन कैंसर और 10 में से 9 सर्वाइकल कैंसर से होती है। शोधकर्ताओं की मानें तो तेजी से होते आर्थिक बदलाव से बढ़ती शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित खुराक, मोटापा और प्रजनन कारकों के चलते गरीब देशों में कैंसर पीड़ित महिलाओं की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। अगर नियमित शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा दिया जाए तो इससे शरीर संतुलित रहेगा और एक तिहाई कैंसर के मामले रोके जा सकते हैं। ‘इंडस हेल्थ प्लस’ की गत वर्ष प्रकाशि रिपोर्ट से भी खुलासा हो चुका है कि शहरों में बढ़ते हुए मोटापे के कारण 10 से 12 फीसदी जनसंख्या पेट के कैंसर के जोखिम के दायरे में आ गयी है। 25 से 30 वर्ष के आयु वर्ग की 17 फीसदी जनसंख्या में धुम्रपान एवं तंबाकू के सेवन के कारण मुख एवं फेफड़े के कैंसर का उच्च स्तरीय खतरा बन गया है। चिकित्सकों का कहना है कि एक तिहाई से ज्यादा कैंसर तंबाकू या उससे बने उत्पादों के सेवन की देन है जबकि एक तिहाई खान-पान व रहन-सहन या दूसरे कारणों हो होते हैं। जहां तक महिलाओं द्वारा तंबाकू का सेवन का सवाल है तो इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। लेकिन महिलाओं को तंबाकू के सेवन से बचना चाहिए। क्योंकि उनका शरीर तंबाकू के प्रति उच्च संवेदनशील होता है। तंबाकू के सेवन से उनमें सर्वाइकल कैंसर का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। तंबाकू के सेवन के अलावा घर व बाहर का वायु प्रदूषण भी कैंसर के बढ़ते खतरे का शबब बनता जा रहा है। विश्व कैंसर दिवस के संस्थापक ‘यूनियन फाॅर इंटरनेशनल कैंसर कंट्रोल का दावा है कि विकासशील देश में फैली कैंसर की बीमारी उपचार के विकल्प की कमियों का नमूना भर है। यूनियन का कहना है कि अगर ‘एचपीवी टीका’ को कैंसर के मरीजों के बीच अच्छी तरह वितरित किया जाए और जागरुकता प्रसारित किया जाए तो सर्वाइकल कैंसर को समाप्त किया जा सकता है।(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)




