लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷यह चिंतित करने वाला तथ्य है कि सरकर की कड़ी निगरानी के बावजूद भी देश में नकली नोटों का प्रवाह थमने का नाम नहीं ले रहा। इसका खुलासा भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट से हुआ है जिसमें कहा गया है कि वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान नई डिजाइन वाले 500 रुपए के नकली नोटों की संख्या सालाना आधार पर 102 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। नई डिजाइन वाले कुल 79,669 नकली नोट पकड़े गए हैं जबकि पिछले वित्त वर्ष 2020-21 के दरम्यान इनकी संख्या 39453 थी। इन नकली नोटों की कुल मनी वैल्यू 3,98,41,500 रुपए है। इसी तरह नई डिजाइन वाले 2000 रुपए मूल्य वाले 13,604 नकली नोट पकड़े गए हैं। इनकी कुल मनी वैल्यू 2,72,08,000 है। 2000 रुपए के नकली नोटों में 55 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसी तरह दस रुपए से लेकर बीस, पचास, सौ और दो सौ रुपए के नकली नोट भी पकड़ में आए हैं। इनसे अर्थव्यवस्था को कुल 8,25,93,560 रुपए की चपत लगी है। गौर करें तो इन जाली नोटों की संख्या में सबसे ज्यादा 500 और 2000 रुपए के नोट हैं। कुल जाली नोटों में इन दोनों की संख्या 87.1 फीसदी है। पिछले साल की बात करें तो दोनों ही नोटों की हिस्सेदारी 85.7 फीसदी रही। अच्छी बात यह है कि 50 रुपए के नकली नोट की संख्या में 28.7 फीसदी की गिरावट और 100 रुपए के जाली नोटों में 16.7 फीसदी की गिरावट आयी है। यहां ध्यान देना होगा कि आरबीआई की रिपोर्ट में वो नकली नोट शामिल नहीं हैं जिन्हें पुलिस, ईडी या अन्य एजेंसियों ने बरामद की है। अगर दोनों आंकड़ों को जोड़ दिया जाए समझा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक के पिछले वर्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2017-18 और 2018-19 में भी नकली नोटों की संख्या में भारी वृद्धि हुई। देखें तो रह वर्ष नकली नोटों की संख्या में वृद्धि हो रही है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 2016-17 में 500 रुपए के नकली नोटों की संख्या सिर्फ 199 थी जो 2018-19 में बढ़कर 22,000 पहुंच गयी। याद होगा कि गत वर्ष पहले सरकार की एक रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ था कि पिछले दस सालों में देश के बैंकिंग तंत्र में लेनदेन के दौरान नकली मुद्रा पकड़े जाने के मामले तेजी से बढ़े हैं। जबकि 2007-08 में सरकार ने पहली बार यह अनिवार्य किया था कि निजी बैंकों और देश में संचालित सभी विदेशी बैंकों के लिए नकली मुद्रा पकड़े जाने संबंधी किसी भी घटना की जिम्मेदारी धनशोधन रोधी कानूनों के प्रावधान के तहत वित्तीय खुफिया इकाई फाइनेंसियल इंटेलिजेंस यूनिट (एफआईयू) को देना होगा। नकली नोटों के लगातार बढ़ते आंकड़ों से साफ है कि देश में बड़े पैमाने पर नकली नोटों का प्रवाह जारी है। गत वर्ष पहले राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा भी खुलासा किया गया था कि देश में सबसे अधिक पांच सौ रुपए के नकली नोट घूम रहे हैं। नोटबंदी से पहले के एक आंकड़े के मुताबिक रिजर्व बैंक और जांच एजेंसियों की संख्ती के बावजूद भी भारतीय बाजार में मौजूद साढ़े ग्यारह लाख करोड़ रुपए की करेंसी में बड़ी संख्या में नकली नोट मौजूद होने का खुलासा हुआ था। यह भी आशंका जाहिर किया गया था कि यह आंकड़ा चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक हो सकता है। नोटबंदी से पहले देश के विभिन्न बैंकों के एटीएम से नकली नोट निकल रहे थे। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के कई बैंकों के चेस्ट में भारी मात्रा में नकली नोट पाए गए थे। किसी से छिपा नहीं है कि देश में ऐसे कई गिरोह हैं जो नकली नोटों का कारोबार कर रहे हैं लेकिन वे जांच एजेंसियों की पकड़ से बाहर हैं। याद होगा गत वर्ष पहले देश की राजधानी दिल्ली में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 6 करोड़ रुपए के नकली नोटों के साथ दो लोगों को गिरफ्तार किया था। दिल्ली पुलिस द्वारा खुलासा किया गया था कि नकली नोटों के ये सौदागर पिछले दो वर्ष से देश के विभिन्न हिस्सों में हर दिन तीन करोड़ रुपए भेज रहे थे। चर्चा यह भी है कि अब भी पाकिस्तान द्वारा नकली नोटों का खेप बांग्लादेश के जरिए भारत में भेजा जा रहा है। इसे एजेंटों के द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाया जा रहा है। याद होगा कि वर्ष 2012-13 में एफआईसी ने नकली नोटों की तस्करी के मामले दर्ज किए थे और इस दौरान पांच पाकिस्तानियों को गिरफ्तार किया गया था। गत वर्ष पहले सुरक्षा एजेंसियों द्वारा खुलासा किया गया था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई सालाना दस हजार करोड़ रुपए मूल्य के भारतीय नोटों की नकली करेंसी छापकर भारत में भेजने की योजना पर काम कर रही है। खास बात यह कि नोटबंदी के बाद भी पाकिस्तान इस खेल में जुटा हुआ है। दरअसल उसकी मंशा नकली नोटों के जरिए आतंकवाद को बढ़ावा देना तथा भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाना है। आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2010 में तकरीबन 1600 करोड़ रुपए की नकली करेंसी नेपाल और बांग्लादेश के जरिए भारत भेजी गयी। इसी तरह वर्ष 2011 में 2000 करोड़ रुपए की नकली करेंसी भेजी गयी। इस फेक करेंसी में तकरीबन 60 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान में छापा गया था। वर्ष 2015 में भी इन रास्तों से तकरीबन 3 करोड़ से ज्यादा की करेंसी पकड़ी गयी। अच्छी बात है कि समय-समय पर रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया द्वारा देश के नागरिकों को प्रचार के जरिए असली-नकली नोटों के फर्क को समझाया जाता है। उसके द्वारा बैंकों को भी हिदायत दी जाती है कि वे नोटों को लेने से पहले उसकी जांच जरुर कर लें। दो राय नहीं कि नोटबंदी के उपरांत जाली मुद्रा की तस्करी रोकने में काफी हद तक मदद मिली है लेकिन इस कारोबार से जुड़े लोगों पर अभी तक पूरी तरह शिकंजा नहीं कसा जा सका है। हाालंकि भारत सरकार ने नकली नोटों पर अंकुश रखने के उपाय सुझाने के लिए शैलभद्र बनर्जी की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जिसने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इस रिपोर्ट पर अमल करते हुए मुद्रा निदेशालय में अतिरिक्त सचिव स्तर का महानिदेशक का पद सृजित किया गया है। इसके अलावा कई अन्य और कदम उठाए गए हैं। मसलन सरकार ने बेहद सुरक्षित किस्म के कागजों पर नोट छापने का निर्णय लिया है। इसके लिए मैसूर में एक बेहद आधुनिक तकनीक पर आधारित करेंसी कागज बनाने का कारखाना लगाया गया है। इस कारखाने में निर्मित करेंसी कागज की नकल करना किसी के लिए भी आसान नहीं है। गौरतलब है कि अभी भारत में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश करेंसी कागज आयातित होते हैं। हर वर्ष भारत 1300 करोड़ रुपए मूल्य के कागज आयात करता है। अच्छी बात यह है कि नकली नोटों के अवैध धंधे को रोकने के लिए वित्त मंत्रालय, गृह मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक एवं केंद्र तथा राज्य सरकारों की सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियां मिलकर काम कर रही हैं। गौरतलब है कि एजेंसियों के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए गृहमंत्रालय में एक संयोजन समिति का गठन किया गया है। इसके अलावा रिजर्व बैंक ने नकली नोटों पर लगाम लगाने के लिए गत वर्ष पहले एक तरफ बिना छपाई वर्ष वाले 2005 से पुराने नोटों को परिचालन से बाहर कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ नए नोटों पर सुरक्षा मानक ज्यादा उन्नत बना दिए गए हैं। इसके अलावा रिजर्व बैंक द्वारा पिछले साल से ही नंबर पैनल पर नोटों के नंबर की छपाई बढ़ते हुए आकार में शुरु कर दिया गया है। बेहतर होगा कि भारत सरकार नकली नोटों की समस्या से निपटने के लिए और कड़ा कदम उठाए। इसमें अमेरिका मददगार साबित हो सकता है। इसलिए कि उसके पास नकली नोटों से निपटने की उच्च प्रौद्योगिकी विद्यमान है तथा साथ ही उसके पास हर नकली अमेरिकी डाॅलर का फोटो सहित डाटाबेस भी उपलब्ध है। उसे जानकारी हो जाती है कि नकली डाॅलर कहां और किस रास्ते से आता है और इसे लाने वाले लोग कौन लोग हैं। अगर भारत भी अमेरिकी प्रौद्योगिकी की सहायता लेता है तो निःसंदेह नकली नोटों पर नियंत्रण कसने में मदद मिलेगी।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















