लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷यह बेहह चिंताजनक है कि भारत के 640 जिलों में से 448 जिलों में मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के तहत निर्धारित लक्ष्य से बहुत अधिक है। यह खुलासा जर्नल पीएलओस ग्लोबल पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन से हुआ है। अध्ययन के मुताबिक शोधकर्ताओं ने 2017-2019 के दौरान स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली (एचएमआईएस) में दर्ज 61,982,623 जीवित बच्चों की संख्या और 61,169 माताओं की मृत्यु के आंकड़ों के विश्लेषण के जरिए यह निष्कर्ष निकाला है। गौरतलब है कि स्वाथ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली एक वेब आधारित निगरानी प्रणाली है जिसे स्वाथ्य परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा लगाया गया है। इस अध्ययन में विश्लेषण का निष्कर्ष हासिल करने के लिए 2011 की जनसंख्या को आधार बनाया गया है। संभवतः यहीं वजह है कि 2022 के 773 जिलों के बजाए सिर्फ 640 जिलों के आंकड़ों को ही इस्तेमाल किया गया है। जिला स्तर पर मातृ मृत्यु दर के अध्ययन से उद्घाटित हुआ है कि देश के 70 फीसद यानी 448 जिलों में मातृ मृत्यु दर 70 से अधिक उल्लेखनीय है कि मातृ मृत्यु दर प्रति एक लाख जन्म पर प्रजनन या गर्भावस्था की जटिलताओं के चलते होने वाली माताओं की मृत्यु को कहा जाता है। सतत विकास लक्ष्यों के तहत संयुक्त राष्ट्र ने 2030 के लिए मातृ मृत्यु दर 70 निर्धारित किया है जबकि भारत में मातृ मृत्यु दर 113 है। शोधकर्ताओं के अध्ययन पर दृष्टिपात करें तो मातृ मृत्यु दर के मामले में विश्व में 15 प्रतिशत माताओं की मौत भारत में हुई है। इस मामले में नाइजीरिया के बाद भारत दूसरे स्थान पर है। नाइजीरिया में मातृ मृत्यु दर 19 प्रतिशत है। मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ पाॅपुलेशन साइंसेज, यूनिवर्सिटी आॅफ पोट्र्समाउस ब्रिटेन और यूनिवर्सिटी आॅफ वेस्टर्न आॅस्टेªलिया के शोधकर्ताओं ने पाया है कि सर्वाधिक मातृ मृत्यु दर अरुणाचल प्रदेश में 284 और सबसे कम महाराष्ट्र में 40 है। इसी तरह पंजाब में मातृ मृत्यु दर 143, मध्यप्रदेश में 179, उत्तर प्रदेश में 208, दिल्ली में 162, जम्मू-कश्मीर में 151, राजस्थान में 162, छत्तीसगढ़ में 144, बिहार में 164, लक्षद्वीप में 208 और असम में 209 है। हालांकि अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह भी पाया है कि भारत में प्रति एक लाख शिशु के जन्म पर मातृ मृत्यु दर 130 से घटकर 113 हो गयी है। शोधकर्ताओं के अध्ययन के मुताबिक हिमाचल प्रदेश के किन्नौर और लाहौल-स्पीति जिले में मातृ मृत्यु दर सबसे कम है। इसी तरह 115 जिलों में मातृ मृत्यु दर 210 से अधिक या समान है। 125 जिलों में 140-209 है। जबकि 210 जिलों में 70 से 139 है। वहीं सिर्फ 190 जिलों में में ही मातृ मृत्यु दर अनुपात 70 से कम है। गौर करें तो यह पहली बार नहीं कि जब किसी शोध के जरिए प्रसव व गर्भावस्था में जान गंवा रही माताओं के विचलित करने वाले आंकड़े उजागर हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र की विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से उजागर हो चुका है कि भारत में प्रत्येक वर्ष गर्भधारण संबंधी जटिलताओं के कारण और प्रसव के दौरान तकरीबन 5 लाख से अधिक माताएं दम तोड़ती हैं। चिकित्सकों की मानें तो मातृ मृत्यु दर का सबसे प्रमुख कारण महिलाओं में 30 प्रतिशत रक्तस्राव, 19 प्रतिशत एनीमिया, 16 प्रतिशत संक्रमण, 10 प्रतिशत जटिल व जोखिम वाले प्रसव एवं 8 प्रतिशत मृत्यु दर उच्च रक्तचाप संबंधी विकारों से होती है। गर्भवती महिलाओं में कुपोषण के कारण कभी-कभार उन्हें गर्भपात भी कराना पड़ता है जिससे उनकी जान जाने का खतरा बना रहता है। मेटरनल माॅर्टेलिटिी रेशियो (एमएमआर) और इंटरनेशनल प्रेग्नेंसी एडवाइजरी सर्विसेज की रिपोर्ट की मानें तो भारत में असुरक्षित गर्भपात से हर दो घंटे में तकरीबन एक स्त्री की जान चली जाती है। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि स्वास्थ्य जागरुकता के बावजूद आज भी गांवों में 40 प्रतिशत से अधिक प्रसव बेहद खतरनाक स्थिति में घरों में कराए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की पापुलेशन फंड-इंडिया की रिपोर्ट में पहले ही उजागर हो चुका है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में 50 प्रतिशत और राजस्थान में 41 प्रतिशत से ज्यादा महिलाओं ने अपने घरों में शिशुओं को जन्म दिया। देश के अन्य राज्यों की हालात भी कमोवेश ऐसी ही है। इससे न सिर्फ गर्भवती महिलाओं की जान जोखिम में पड़ रही है बल्कि वे खतरनाक बीमारियों की चपेट में आ रही हैं। यहां यह भी ध्यान देना होगा कि भारत में गर्भवती महिलाओं की मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण गर्भपात है। गत वर्ष पहले सरकारी संस्था नेशनल सैंपल सर्वे आॅफिस (एनएसएसओ) की एक रिपोर्ट से उद्घाटित हुअ था कि शहरों में 20 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों में हर सातवें गर्भधारण का अंत गर्भपात के रुप में होता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भपात का प्रतिशत 2 तथा शहरी क्षेत्रों में 3 है। गौर करें तो भारत में गर्भपात की इजाजत कुछ विशेष परिस्थितियों में दी गयी है। मसलन अगर गर्भ के कारण किसी महिला की जान खतरे में है या गर्भ में पल रहे बच्चे की विकलांगता की आशंका बढ़ गयी है अथवा महिला के साथ बलात्कार हुआ है तभी वह गर्भपात करा सकती है। लेकिन विडंबना है कि देश में गर्भपात अब एक चलन का रुप ले लिया है और इसे जीवन की स्वतंत्रता व वैयक्तिक अधिकारों से जोड़कर देखा जाने लगा है। इसका कुपरिणाम यह है कि किशोरियों में गर्भपात का प्रचलन बढ़ रहा है। गत वर्ष पहले एक सर्वे से खुलासा हुआ था कि भारत में बड़े राज्यों में सिर्फ 73 प्रतिशत जिला अस्पतालों के पास ही सुरक्षित गर्भपात संबंधी व्यवस्थाएं हैं। यानी 27 प्रतिशत जिला अस्पताल असुरक्षित गर्भपात के केंद्र हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो दुनिया में हर साल एक हजार में से लगभग 28 मामलों में असुरिक्षत गर्भपात होता है जिनमें भारत और अफ्रीकी देशों को आंकड़ा सर्वाधिक है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में होने वाले गर्भपात में से दो तिहाई गर्भपात बेहद असुरक्षित होते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 80-90 प्रतिशत गर्भपात के मामले पहले ट्राइमेस्टर में होते हैं और बाकी दूसरे ट्राइमेस्टर में, क्योंकि इसी समय गर्भ में भ्रूण के लिंग का पता चल पाता है। जब यह पता चलता है कि गर्भ में पल रहा भू्रण लड़की का है तो उसी समय गर्भपात के विचार अंकुरित होने लगते हैं। इसका मूल कारण यह है कि भारत में बेटियों की अपेक्षा लड़कों को ज्यादा तरजीह दी जाती है। इन परिस्थितियों में महिलाएं सुरक्षित व कानूनी विकल्प के अभाव में असुरक्षित गर्भपात को अंजाम देती हैं जिससे उनकी जान पर बन आता है। एक अन्य शोध से यह भी उद्घाटित हुआ है कि गर्भपात के कारण न सिर्फ महिलाओं की जान जा रही है बल्कि वे गंभीर बीमारियों की चपेट में भी आ रही हैं। इनमें से एक स्तर कैंसर है जो 20 से 25 साल की आयु वर्ग की गर्भपात कराने वाली युवतियों में सर्वाधिक पाया जा रहा है। इसके अलावा एक सच यह भी है कि देश में विशेषकर गांवों में डाॅक्टरों की भारी कमी है। इसकी वजह से अधिकांश गर्भवती महिलाएं स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए झोला छाप डाॅक्टरों पर निर्भर हैं। बहुतायत अस्पतालों में न तो डाॅक्टर हैं और न ही दवा। जहां अस्पताल और डाॅक्टर हैं वहां चिकित्सकीय उपकरण एवं अन्य जरुरी सुविधाएं नदारद हैं। दूसरी ओर देश में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की भी भारी कमी है। सेव द चिल्ड्रेन संस्था की मानें तो भारत मां बनने के लिहाज से दुनिया के सबसे खराब देशों में शुमार है। देश के जिन हिस्सों में भूखमरी, गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और जागरुकता की कमी है, वहां प्रसव के दौरान मातृत्व मृत्यु दर अधिक है। कम उम्र में लड़कियों का विवाह भी मातृत्व मृत्यु दर में वृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारण है। कम उम्र में विवाह से लड़कियां शीध्र मां बन जाती हैं जिससे उनमें खतरनाक बीमारियां पनपती हैं और प्रसव के दौरान काल के मुंह में समा जाती हैं। ऐसे में मातृ मृत्यु दर कम करने का एकमात्र उपाय यही है कि देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया जाए और महिला स्वास्थ्य संबंधी जनजागरुकता कार्यक्रम को प्रभावी बनाया जाए।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















