लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷संयुक्त राष्ट्र के इंटर गवर्नमेंट पैनल आॅन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) का खुलासा चिंतित करने वाला है कि 2030 तक अगर हम कार्बन उत्सर्जन के स्तर में कमी नहीं ला सके तो इस सदी के अंत तक पृथ्वी को बेहद गर्म होने से रोक पाना मुश्किल होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर 2025 से कार्बन उत्सर्जन घटाना शुरु कर दिया जाए तब भी ऐसी तकनीकों की जरुरत पड़ेगी जो 2050 के बाद आकाश और वातावरण में बढ़ चुके कार्बन को सोखने में मदद करे। रिपोर्ट के मुताबिक 2020 तक कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए जो नीतियां सामने रखी गई थी अगर वे सब लागू हों तब भी इस सदी के आखिरी तक पृथ्वी का औसत तापमान 3.2 डिग्री सेल्सियस से अधिक होगा। तापमान पर नियंत्रण के लिए 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को शुन्य करना होगा। ऐसा इसलिए कि जितना कार्बन विश्व ने पिछले दस साल में उत्सर्जित की है, इस सदी के अंत तक हम उतना ही और कार्बन उत्सर्जन सह सकते हैं। एक आंकड़ें के मुताबिक अब तक वायुमण्डल में 36 लाख टन कार्बन डाइआॅक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और वायुमण्डल से 24 लाख टन आॅक्सीजन समाप्त हो चुकी है। अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक पृथ्वी के तापक्रम में लगभग 4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि तय है। वैज्ञानिकों की मानें तो बढ़ते तापमान के लिए मुख्यतः ग्लोबल वार्मिंग है और इससे निपटने की त्वरित कोशिश नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में धरती का खौलते कुंड में परिवर्तित होना तय है। अमेरिकी वैज्ञानिकों की मानें तो वैश्विक औसत तापमान पिछले सवा सौ सालों में अपने उच्चतम स्तर पर है। औद्योगिकरण की शुरुआत से लेकर अब तक तापमान में 1.25 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। आंकड़ों के मुताबिक 45 वर्षों से हर दशक में तापमान में 0.18 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हुआ है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने वायु में मौजूद आॅक्सीजन और कार्बन डाईआॅक्साइड के अनुपात पर एक शोध में पाया है कि बढ़ते तापमान के कारण वातावरण से आॅक्सीजन की मात्रा तेजी से कम हो रही है। पिछले दस सालों में वातारवरण से आॅक्सीजन काफी रफ्तार से घटी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है उस पर काबू नहीं पाया गया तो अगली सदी में तापमान 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर पृथ्वी के तापमान में मात्र 3.6 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होती है तो आर्कटिक के साथ-साथ अण्टाकर्टिका के विशाल हिमखण्ड पिघल जाएंगे। देखा भी जा रहा है कि बढ़ते तापमान के कारण उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव की बर्फ चिंताजनक रुप से पिघल रही है। अगर बर्फ का पिघलना थमा नहीं तो आने वाले वर्षों में न्यूयाॅर्क, लाॅस एंजिल्स, पेरिस और लंदन, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पणजी, विशाखापट्टनम कोचीन और त्रिवेंद्रम नगर समुद्र में होंगे। वर्ष 2007 की इंटरगवर्नमेंटल पैनल की रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ते तापमान के कारण दुनिया भर के करीब 30 पर्वतीय ग्लेशियरों की मोटाई अब आधे मीटर से कम रह गयी है। हिमालय क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर 2 से 5 किलोमीटर सिकुड़ गए हैं। 76 फीसद ग्लेशियर चिंताजनक गति से सिकुड़ रहे हैं। कश्मीर और नेपाल के बीच गंगोत्री ग्लेशियर भी तेजी से सिकुड़ रहा है। अनुमानित भूमंडलीय तापन से जीवों का भौगोलिक वितरण भी प्रभावित हो सकता है। कई जातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो जाएंगी। जातियों के वितरण में इन परिवर्तनों का जाति विविधता तथा पारिस्थितिकी अभिक्रियाओं इत्यादि पर गहरा असर पड़ेगा। यहां ध्यान रखना होगा कि पृथ्वी पर करीब 12 करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीवों के समाप्त होने का कारण भूमंडलीय तापन ही था। आंकड़ों पर गौर करें तो 2000 से 2010 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन की दर प्रतिवर्ष 3 फीसद रही जबकि भारत के कार्बन उत्सर्जन में यह वृद्धि 5 फीसद रही। कार्बन उत्सर्जन के लिए सर्वाधिक रुप से कोयला जिम्मेदार है। हालांकि ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट की रिपोर्ट पर गौर करें तो अमेरिका और चीन ने कोयले पर अपनी निर्भरता काफी कम कर दी है। इसके स्थान पर वह तेल और गैस का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन भारत की बात करें तो उसकी कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी कोयले पर निर्भर है। अच्छी बात यह है कि भारत ने गत वर्ष पहले पेरिस जलवायु समझौते को अंगीकार करने के बाद क्योटो प्रोटाकाल के दूसरे लक्ष्य को अंगीकार करने की मंजूरी दे दी है। इसके तहत देशों को 1990 की तुलना में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 18 फीसद तक घटाना होगा। भारत के इस कदम से अन्य देश भी इसे अंगीकार करने के लिए आगे आएंगे। उल्लेखनीय है कि उद्योगों से निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए 11 दिसंबर, 1997 को जापान के क्योटो शहर में संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में 192 देशों के बीच यह संधि हुई। 16 फरवरी, 2005 को यह प्रभावी हुई। विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को लक्ष्य पूरा करने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद उपलब्ध कराना भी इसका हिस्सा है। संधि का पहला लक्ष्य 2008-12 के लिए तय हुआ था। इसमें औद्योगिक अर्थव्यवस्था वाले 52 देशों ने चार ग्रीन हाउस गैसों (कार्बन डाई आॅक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आॅक्साइड और सल्फर हेक्साफ्लोराइड) का उत्सर्जन 1990 की तुलना में 5 फीसद तक घटाने का लक्ष्य रखा था। अन्य देशों ने भी इसके लिए अपने-अपने लक्ष्य रखे थे। गौर करें तो पेरिस जलवायु समझौते पर भी भारत ने दुनिया को राह दिखायी है। उल्लेखनीय है कि 2020 से कार्बन उत्सर्जन को घटाने संबंधित प्रयास शुरु करने के लिए दिसंबर, 2015 को यह संधि हुई। इस संधि पर 192 देशों ने हस्ताक्षर किए। 126 देश इसे अंगीकार कर चुके हैं। भारत ने 2 अक्टुबर, 2016 को इसे अंगीकार करके अन्य देशों को भी अंगीकार करने की राह दिखायी। फिर कुछ अन्य देशों द्वारा इसे अंगीकार किए जाने पर 4 नवंबर, 2016 को यह प्रभावी हुआ। इसके तहत बढ़ते वैश्विक औसत तापमान को दो डिग्री सेल्सियस पर ही रोकने का लक्ष्य तय है। पृथ्वी के तापमान को स्थिर रखने और कार्बन उत्सर्जन के प्रभाव को कम करने के लिए कंक्रीट के जंगल का विस्तार और अंधाधुंध पर्यावरण दोहन पर लगाम कसना होगा। जंगल और वृक्षों का दायरा बढ़ाना होगा। पेड़ और हरियाली ही धरती पर जीवन के मूलाधार हैं। वनों को धरती का फेफड़ा कहा जाता है। धरती पर प्राणवायु आॅक्सीजन से लेकर जरुरी भोजन मुहैया कराने के लिए यही वृद्ध जिम्मेदार हैं। वृक्षों और जंगलों का विस्तार होने से धरती के तापमान में कमी आएगी। लेकिन विडंबना है कि वृक्षों और जंगलों का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र की ‘ग्लोबल फॅारेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट’ (जीएफआरए) की रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 से 2015 के बीच कुल वन क्षेत्र तीन फीसद घटा है और 102,000 लाख एकड़ से अधिक का क्षेत्र 98,810 लाख एकड़ तक सिमट गया है। यानी 3,190 लाख एकड़ वनक्षेत्र में कमी आयी है। गौर करें तो यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रीका के आकार के बराबर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक वन क्षेत्र में कुल वैश्विक क्षेत्र की दोगुनी अर्थात छः फीसद की कमी आयी है। उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्रों की स्थिति और भी दयनीय है। यहां सबसे अधिक 10 फीसद की दर से वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है। वनों के विनाश से वातावरण जहरीला हुआ है और प्रतिवर्ष 2 अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआॅक्साइड वायुमण्डल में घुल-मिल रहा है। अभी गत वर्ष ही ब्रिटेन में मौसम विभाग के कार्यालय और एक्जेटर विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि हवाई स्थित मौना लोआ वेधशाला में वायुमंडल में कार्बन डाईआॅक्साइड की सघनता में 1958 से करीब 30 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई है। गौर करें तो इस स्थिति के लिए काफी हद तक कार्बन डाईआॅक्साइड का उत्सर्जन ही जिम्मेदार है। ओजोन को पृथ्वी का सुरक्षा कवच कहा जाता है क्योंकि यह जीवों की सूर्य की पराबैगनी किरणों से रक्षा करता है। बेहतर होगा कि वैश्विक समुदाय बढ़ते तापमान से निपटने के लिए कार्बन डाईआॅक्साइड के उत्सर्जन पर नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम उठाए।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















