लेखक~ओमप्रकाश तिवारी
♂÷महाराष्ट्र में 2019 के विधानसभा चुनाव के दौरान यह नारा खूब चल रहा था – दिल्ली में नरेंद्र, महाराष्ट्र में देवेंद्र। लेकिन दुर्योग कुछ ऐसा बना कि उस समय भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी दल शिवसेना द्वारा अचानक पाला बदलकर कांग्रेस-राकांपा की गोद में बैठ जाने के कारण यह नारा तब फलीभूत नहीं हो सका। करीब डेढ़ माह पहले यह फलीभूत हुआ भी तो देवेंद्र फडणवीस को उपमुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा। लेकिन अब भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने फडणवीस को केंद्रीय चुनाव समिति में स्थान देकर उनका पदार्पण केंद्रीय राजनीति में करवा दिया है।
इसके कई कारण माने जा रहे हैं। पहला तो महाराष्ट्र में शिवसेना के जिस गुट के साथ वह सरकार चला रहे हैं उसे यह संदेश दिया जाना कि उन्हें राज्य में उपमुख्यमंत्री के रूप में भले शपथ दिलवा दी गई हो, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा उनपर ही सर्वाधिक है। क्योंकि एकनाथ शिंदे का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए स्वयं देवेंद्र फडणवीस द्वारा घोषित करने के कुछ ही देर बाद जब टीवी चैनलों पर आकर पार्टी अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा ने फडणवीस को उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने का आदेश दिया, तभी से भाजपा में फडणवीस का विरोधी गुट यह कहने लगा था कि उनका कद छोटा करने के लिए ही केंद्रीय नेतृत्व ने यह नीति अपनाई है। खुद फडणवीस भी केंद्रीय नेतृत्व के इस निर्णय से खुश नहीं थे। राजभवन में शपथ लेते समय यह नाखुशी उनके चेहरे पर साफ पढ़ी भी जा सकती थी। लेकिन आनेवाले समय में महाराष्ट्र भाजपा के लिए कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। कुछ ही महीनों में यहां बड़े पैमाने पर स्थानीय निकायों के चुनाव होनेवाले हैं, जो मिनी चुनाव जैसा दृश्य उत्पन्न करेंगे। इन चुनावों में सफलता पाकर ही भाजपा अगले लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों के लिए अपने को तैयार कर पाएगी। लोकसभा सीटों की दृष्टि से उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र ही सबसे बड़ा राज्य है। यहां लोकसभा की 48 सीटें हैं। चूंकि अब शिवसेना भी उसके साथ नहीं, बल्कि विरोध में होगी। इसलिए फडणवीस को मजबूती देकर ही इस राज्य में पार्टी को मजबूत किया जा सकता था।
केंद्रीय चुनाव समिति में महाराष्ट्र से फडणवीस को ही लिए जाने का एक और बड़ा कारण यह भी है कि पार्टी का वर्तमान केंद्रीय नेतृत्व पार्टी के जनाधार विस्तार की जिस रणनीति पर चल रहा है, देवेंद्र उसमें बिल्कुल फिट बैठते हैं। 2014 की प्रबल मोदी लहर के दौरान जिस समय पार्टी ने सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर शिवसेना से नाता तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया, उस समय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वही थे। तब आसान नहीं था, शिवसेना से 25 साल पुराना गठबंधन तोड़कर अकेले चुनाव मैदान में जाने की हिम्मत जुटा पाना। लेकिन देवेंद्र ने न सिर्फ ऐसा किया, बल्कि अकेले दम पर 122 सीटें लाने में भी सफल रहे। सच कहा जाय, तो यह हिम्मत उनसे पहले प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे और नितिन गडकरी जैसे दिग्गज भी नहीं उठा सके थे। उनकी इसी हिम्मत का परिणाम था कि केंद्रीय नेतृत्व ने कई और वरिष्ठों को नजरंदाज कर उन्हें महाराष्ट्र जैसे महत्त्वपूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी। इस जिम्मेदारी को भी उन्होंने कुशलतापूर्वक निभाया। जिस शिवसेना से चुनावपूर्व गठबंधन टूट गया था, उसे भी चुनाव बाद अपने साथ ले आए। पूरे पांच साल सरकार चलाई। शिवसेना के साथ मिलकर 2019 का चुनाव लड़ा गया। इस बार भी भाजपा न सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, बल्कि राज्य के अन्य तीनों बड़े दलों से लगभग दोगुनी सीटें भी लेकर आई। ये और बात है कि शिवसेना का मन साफ नहीं था। वह परिणाम आने के बाद भाजपा का साथ छोड़ उन्हीं दलों की गोद में जा बैठी, जिनके विरुद्ध उसने चुनाव लड़ा था। हालांकि इसका खामियाजा उसे ढाई साल बाद बड़ी टूट के रूप में चुकाना पड़ा, और सत्ता भी हाथ से गई। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह सिद्ध कर दिया कि देवेंद्र सही समय का इंतजार करने एवं समय आने पर सही चोट करनेवाले राजनीतिज्ञ हैं। ढाई साल विपक्ष में रहने के दौरान भी देवेंद्र ने महाविकास आघाड़ी सरकार को चैन से नहीं बैठने दिया। उनकी ही सक्रियता का परिणाम था कि सत्तारूढ़ दलों के दो-दो कैबिनेट मंत्रियों को सलाखों के पीछे जाना पड़ा और उनकी थू-थू होती रही। जाहिर है, भाजपा के वर्तमान नेतृत्व को पार्टी के लिए ऐसे ही नए खून की जरूरत भी है। जबकि जिन गडकरी को इन महत्त्वपूर्ण केंद्रीय समितियों से हटाकर देवेंद्र को स्थान दिया गया, वह पिछले कुछ समय से खुद ही सार्वजनिक रूप से राजनीति से अनिच्छा व्यक्त करते दिखाई दे रहे थे। दूसरी ओर कई बार मंचों पर भाषण देते हुए अचानक अस्वस्थ हो चुके हैं। संभवतः केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी इसी अनिच्छा एवं गिरते स्वास्थ्य के कारण उनके स्थान पर देवेंद्र को आगे लाने की पहली की होगी।
यह भी सच है कि महाराष्ट्र भाजपा में फिलहाल किसी सर्वमान्य नेता की तलाश की जाए, तो आज एक ही नाम सामने आता है। वह है देवेंद्र फडणवीस का। उनकी उम्र भी अभी 50 से कम है। यानी वह पार्टी के लिए लंबी रेस के घोड़े साबित हो सकते हैं। उनकी उपयोगिता और योग्यता न सिर्फ महाराष्ट्र में, बल्कि बिहार और गोवा में भी चुनाव प्रभारी के रूप में आजमाई जा चुकी है। उक्त दोनों राज्यों में पार्टी ने सफलता हासिल की थी। इसके अलावा पार्टी ने हैदराबाद महानगरपालिका चुनाव की जिम्मेदारी भी देवेंद्र को ही दी थी। वहां भी वह पार्टी को लंबी छलांग लगवाने में कामयाब रहे। यानी महाराष्ट्र सहित बिहार, गोवा और हैदराबाद जैसे चुनावों में मिली सफलताओं ने ही केंद्रीय चुनाव समिति में देवेंद्र को लाए जाने की उपयोगिता अपने आप साबित कर दी थी। महाराष्ट्र, बिहार और पंजाब में पार्टी के पुराने सहयोगी दलों के अपने आप कन्नी काट जाने से भविष्य में पार्टी को या तो नए सहयोगियों की जरूरत पड़ेगी, या फिर उसे अकेले ही ताल ठोकने के लिए तैयार रहना होगा। ऐसी स्थिति में उसे देशव्यापी रणनीति बनाने के लिए ऐसे ही नेताओं की जरूरत होगी, जिन्हें सहयोगी संगठनों के साथ बात करने का अनुभव तो हो ही, उनके झटके झेलने का भी अनुभव हो। देवेंद्र को इन दोनों में महारत हासिल है।

÷लेखक महाराष्ट्र राज्य के दैनिक जागरण ब्यूरो प्रमुख हैं÷
(लेख साभार दैनिक जागरण)






















