जो “हर” का भक्त वही “हरि” का भी भक्त है

लेखक -अजीत प्रताप सिंह

एक बार विष्णु जी आराम से सोए हुए थे। लक्ष्मी जी उन्हें निहार रही थी। भगवान विष्णु के अधरों पर एकाएक ही मधुर मुस्कान खिल गई। थोड़ी देर पश्चात उनके नेत्र खुले और वे उठकर बैठ गए। माता लक्ष्मी ने पूछा, “क्या हुआ स्वामी? आप निद्रा में एकाएक मुस्कुराने लगे थे और अब एकाएक ही उठकर बैठ गए।”

ऐसा लगा जैसे नारायण ने कुछ सुना ही नहीं, वे ध्यान में बैठे रहे। कुछ समय पश्चात वे बाह्यभाव में आये और माता की प्रश्नवाचक दृष्टि को समझ कर बोले, “देवी, मैंने स्वप्न में कोटि-कोटि चन्द्रमाओं की कांति में, डमरु और त्रिशूल से युक्त, त्रिलोचन भगवान शिव को प्रेम और आनंद से उन्मत्त होकर नृत्य करते देखा। मैंने प्रसन्नमुख प्रभु के दर्शन किये। प्रतीत होता है कि महारुद्र ने मुझ भक्त का स्मरण किया है। चलो, तत्काल चलो। हम कैलाश चल रहे हैं।”

दोनों कैलाश की ओर बढ़े। अभी आधे रास्ते में ही थे कि सामने से उन्हें भगवती उमा के साथ महेश्वर आते दिखे। उधर शिव ने भी नारायण को देख लिया, और देखते ही झटपट आगे बढ़े। दोनों परस्पर प्रेम से मिले। विष्णु कुछ कहते, उससे पूर्व ही महादेव बोल पड़े, “अहोभाग्य जो यहीं आपके दर्शन हुए। आज स्वप्न में मैंने आपकी यह मनोहर छवि देखी थी। मैं समझ गया कि स्वयं नारायण ने अपने इस भक्त का स्मरण किया है। अतः तत्काल ही विष्णुलोक के लिए चल पड़ा। धन्य है आपकी लीला, जो आप मुझे मार्ग में ही मिल गए।”

विष्णु ने जब जाना कि महादेव वैकुंठ आने के लिए निकले हैं तो आग्रह करने लगे कि चलें, वैकुंठ को अपनी चरणरज से धन्य करें। उधर महादेव को ज्ञात हुआ कि विष्णु कैलाश के लिए चले थे, तो उन्होंने भी आग्रह किया कि वे चलकर कैलाश को अपनी उपस्थिति से पवित्र करें।

बड़ी समस्या उत्पन्न हुई। दोनों भक्त अपने-अपने भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि वे उनके घर चलें। निर्णय कठिन हो गया। आदेश हो तो निभाया भी जाये, पर किसका आग्रह अधिमान्य हो, विकट प्रश्न। तभी देवर्षि नारद नारायण-नारायण करते उधर पहुंच गए। उन्हें देख दोनों ने, नारायण और महेश्वर ने उनसे प्रार्थना की कि वे ही निर्णय करें कि कौन किसके घर जाए। पर नारद की स्थिति तो और भी विचित्र। वे तो हरि और हर के इस मिलन को देख प्रेमामग्न हो दोनों के ही गुणगान करने लगे।

अंततः भगवती उमा पर निर्णय छोड़ दिया गया। भगवती बोली, “हे हरि! हे हर! आप दोनों के इस अद्भुत अनन्य और अचल प्रेम को देख यह निश्चित होता है कि आप दो नहीं एक ही हैं। आपके निवास भी भिन्न नहीं। जो कैलाश है, वही वैकुंठ है। जो वैकुंठ है, वही कैलाश है। मात्र नाम का अंतर है। मुझे तो आप दोनों भी एकात्म लगते हैं। आत्मा एक है और शरीर दो। मैं तो स्वयं में लक्ष्मी और लक्ष्मी में स्वयं को देख रही हूं। जो हर का भक्त है, वो हरि का भक्त है। जो हरि का भक्त है, वो हर का भक्त है। जो एक को पूज्य माने और दूसरे को अपूज्य, वो भक्त है ही नहीं। आप दोनों में कोई भेद नहीं। मुझे प्रतीत होता है कि मुझे न्यायाधीश बनाकर आप दोनों विनोद कर रहे हैं। मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप दोनों अपने-अपने लोकों की ओर प्रस्थान करें। श्रीविष्णु यह समझें कि वे शिवरूप में कैलाश जा रहे हैं, और महेश्वर यह मानें कि वे विष्णुरूप में वैकुंठ जा रहे हैं।”

दोनों प्रभुओं ने भगवती की बात मानी और परस्पर प्रणाम करते हुए अपने लोकों की ओर प्रस्थान कर गए।
………….

भक्त के मन में सदैव यह प्रश्न जन्मता है कि विष्णुपुराण में विष्णु, शिवपुराण में शिव को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है, अन्य पुराणों में भी जिस प्रभु के लिए वह पुराण संदर्भित है, उसे श्रेष्ठ बताया गया है। परंतु यदि इन पुराणों को पूरा पढ़ा जाए तो एक ही सिद्धांत निकलता है कि परात्पर आदिब्रह्म ही विभिन्न कल्पों में अपने किसी रूप से अपने अंशों को प्रकट करके सृष्टि, पालन और संहार की लीला करते हैं।

वे ही परात्पर परमब्रह्म कभी शिव रूप में विष्णु और ब्रह्मा को प्रकट करते हैं तो कभी विष्णु रूप में शिव और ब्रह्मा को।

शिवपुराण के अनुसार शिव आदिदेव हैं। वे अजन्मे हैं। उन्होंने सबको पैदा किया है, वे स्वयं किसी से पैदा नहीं हुए। उनसे ही त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश निकले हैं। महेश्वर कभी अपना कर्म नहीं भूलते, इसलिए शिव ने उन्हें अपना रूप, वेश, वाहन, आसन, शस्त्र दिए हैं। शिव से निकले इन त्रिदेव में ही कोई एक किसी एक कल्प में बाकी दो को जन्म देता है।

शिव के दक्षिण भाग से ब्रह्मा का और वाम भाग से विष्णु का और हृदय से महेश का जन्म हुआ।

फिर किसी कल्प में विष्णु की नाभि से ब्रह्मा का और ब्रह्मा के मस्तक से महेश का जन्म हुआ।

देवीभागवत और ब्रह्मवैवर्तपुराण में ये परात्पर परमब्रह्म कृष्ण हैं जिनके दक्षिण भाग से विष्णु, वाम भाग से महेश्वर और नाभि से ब्रह्मा प्रकट होते हैं।

और सभी पुराणों में, वह भगवान स्वयं को दूसरों से पृथक नहीं बताता। जैसे भागवत में विष्णु कहते हैं कि वे ही जगत के परम कारण शिव और ब्रह्मा हैं। देवीपुराण में ब्रह्मदेव को ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहा गया है। शिवपुराण में शिव कहते हैं कि कार्यों के भेद से मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नाम धारण करता हूँ।

मैं शैव हूँ। मैं भगवान शंकर की आराधना करता हूँ। मैं शिवलिंग की अर्चना करता हूँ। मुझे शिवलिंग में मात्र महेश्वर नहीं, उसी परमब्रह्म के दर्शन होते हैं जो कभी ब्रह्मदेव के रूप में आता है, कभी महाविष्णु के रूप में, कभी महादेव के रूप में तो कभी भगवती दुर्गा के रूप में। निराकार परमब्रह्म है शिवलिंग, और साकार रूप हैं शिव, दुर्गा, राम, कृष्ण।

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(लेखक प्रसिद्ध ब्लॉगर हैं)

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