चौरासी माल’ से ‘तराई’ तक की रोचक कथा
लेखक: प्रयाग पाण्डे
‘नाम’ की महिमा निराली है। ‘नाम’ को लेकर अनेक मत और मान्यताएं हैं। कुछ लोग कहते हैं नाम में क्या रक्खा है? जबकि कुछ लोगों के लिए ‘नाम’ की बहुत अहमियत होती है। कहा जाता है ‘नामी रोए नाम को…..।’ अधिकांश स्थान, गाँव, नगर -कस्बे और गली – मोहल्लों के नामों में वहाँ का राजनीतिक इतिहास, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक मान्यताएं एवं आर्थिक महत्व, भौगोलिक स्थिति और जलवायुगत विशेषताएं छिपी होती हैं। कतिपय स्थानों के नामों से संबंधित स्थान की विशेषताओं का बोध भी होता है। तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार स्थानों के नामों में बदलाव होता रहता है। नामांतरण की यह प्रक्रिया सतत जारी रहती है। इधर एकाध दशक से यह प्रक्रिया यकायक तेज हो गई है।
हालाँकि स्थानों के नामांतरण का यह सिलसिला सदियों पुराना है। इतिहास के प्रत्येक कालखंड में सत्ता में बदलाव के बाद क्षेत्र, शहर, नगर-कस्बों, सड़क -रास्तों और गाँवों के नाम और पहचान बदलती रही है। नाम के बदलाव के मामले में कुमाऊँ का तराई क्षेत्र और वहाँ के नगर- कस्बों का अपना दिलचस्प इतिहास रहा है। तराई के कई नगरों के नामों में कुमाऊँ के चंद राजवंश के राजाओं का इतिहास जुड़ा है।
मौजूदा तराई क्षेत्र के नगर-कस्बों के पूर्व प्रचलित नामों के बहाने तराई क्षेत्र और वहाँ के नगरों के अतीत को बखूबी जाना और समझा जा सकता है।
आज से 236 साल पहले कुमाऊँ में देशज राजवंश चंद शासकों का राज था। 1565- 1597 के दौरान रुद्रचंद कुमाऊँ के राजा थे।राजा रुद्रचंद,सम्राट अकबर के समकालीन थे। तराई का क्षेत्र शारदा से पीली नदी तक चौरासी कोस लंबा था, इसलिए तब तराई को “चौरासी माल” कहा जाता था। उस दौर में तराई क्षेत्र का भू-राजस्व नौ लाख रुपये निर्धारित था, इस वजह से तराई का दूसरा नाम “नौलखिया माल” था। तराई से नौ लाख रुपये की आमदनी के चलते कुमाऊँ के तत्कालीन राजा को “नौलखिया” राजा भी कहा जाता था। तब इस क्षेत्र को “मलवारा” और “माल” नाम से भी जाना जाता था।
कुमाऊँ 1790 में गोरखा सैनिक शासन के चुंगल में आ गया। इसके पैंतीस वर्ष बाद 1815 में यहाँ ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना आधिपत्य जमा लिया। कुमाऊँ में ब्रितानी हुकूमत कायम होने के बाद अंग्रेजों ने इस क्षेत्र को “तराई” नाम दिया।आज भी इसे इसी नाम से जाना-पहचाना जाता है।
चंद वंश के शासनकाल में तराई क्षेत्र के गाँव, कस्बे एवं नगरों को दूसरे नामों से जाना जाता था। ब्रिटिश राज में भी कमोबेश पुराने नाम प्रचलन में रहे। ब्रिटिशकालीन दस्तावेजों में वर्तमान रुद्रपुर के पुराने नाम- भूक्सी, भुक्सर और किलपुरी बताए गए हैं। चंद राजा रुद्रचंद ने 1588 में यहाँ एक नगर बसाया था,जिसे रुद्रपुर नाम दिया गया। चंद राजा रुद्रचंद के सूबेदार काशीनाथ अधिकारी ने 1639 में काशीपुर नगर की स्थापना की,सो इस नगर को काशीपुर के नाम से जाना गया। काशीपुर का पुराना नाम “कोटा” था। चंद राजा बाज बहादुर चंद ने (1638-1678) बाजपुर नगर बसाया, उन्हीं के नाम पर इस नगर का नाम बाजपुर पड़ा। इससे पहले इस क्षेत्र को “मुंडिया” नाम से जाना जाता था।वर्तमान जसपुर का पुराना नाम “सहजगढ़” था। गदरपुर का पुराना नाम “गजरपुर” था। जबकि वर्तमान नानकमत्ता का पुराना नाम “बख्शी” था।
तराई की बेशकीमती जमीन को रोहिल्लों की बुरी नजर से बचाकर इसे पुनः आबाद करने और यहाँ कई नए नगर-कस्बे बसाने में चंद शासकों का अविस्मरणीय योगदान रहा है। रुद्रपुर, बाजपुर और काशीपुर नगर, चंद कालीन शासकों की याद दिलाते हैं।

(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार हैं)

