वैश्विक संकट और ऊर्जा युद्ध के बीच आत्मनिर्भरता की राह पर भारत!

वैश्विक संकट और ऊर्जा युद्ध के बीच आत्मनिर्भरता की राह पर भारत!

लेखक-ओपी पाल

समंदर में महा-सर्वे और जमीन पर कोयले के गैसीफिकेशन

दुनिया में तेजी से बदलती ऊर्जा राजनीति और युद्धों के इस दौर में, भारत ने यह भली-भांति समझ लिया है कि लंबे समय की संप्रभुता और आर्थिक प्रगति केवल और केवल आत्मनिर्भरता के मार्ग से ही संभव है। इसलिए बंगाल की खाड़ी की लहरों के ऊपर चक्कर काटते आधुनिक सर्वे जहाज और देश के भीतर कोयला खदानों के पास स्थापित होते अत्याधुनिक गैसीफिकेशन प्लांट इस बदलते हुए नए भारत की जीवंत तस्वीर कही जा सकती है। मसलन समुद्र के नीचे छिपे हाइड्रोकार्बन के अथाह भंडार और जमीन पर मौजूद ‘काले सोने’ (कोयले) का वैज्ञानिक रूपान्तरण, भारत की आने वाली पीढ़ियों के ऊर्जा भविष्य को पूरी तरह सुरक्षित करने की क्षमता रखता है। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स(डीजीएच) के नेतृत्व में तैयार किया जा रहा यह महाभियान भारत के अब तक के सबसे आधुनिक भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षणों में से एक है। डीजीएच का यह महा-सर्वे और नेशनल कोल गैसीफिकेशन मिशन सिर्फ दो सरकारी परियोजनाएं नहीं हैं, बल्कि ये भारत की एकीकृत राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा नीति के दो मजबूत स्तंभ और उस आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला हैं, जो किसी भी वैश्विक संकट के सामने अडिग रहने का हौसला रखता है। आने वाले दो से पांच वर्ष इस दिशा में बेहद क्रांतिकारी साबित होने वाले हैं, जब इन अभियानों के परिणाम धरातल पर दिखाई देंगे और भारत दुनिया के मंच पर एक ऊर्जा-सुरक्षित महाशक्ति के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ेगा।

वैश्विक परिदृश्य आज एक अभूतपूर्व भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में ईरान और अन्य शक्तियों के बीच सुलगते युद्ध की आग ने पूरी दुनिया की खासकर ऊर्जा सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखला) की चूलें हिला दी हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष की निरंतरता और रेड सी (लाल सागर) संकट ने कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को न केवल बेहद खर्चीला बना दिया है, बल्कि अत्यधिक असुरक्षित भी कर दिया है। ऐसे समय में भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है, एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में होने वाली जरा सी भी हलचल या कच्चे तेल की कीमतों में उछाल सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था की वित्तीय सेहत, चालू खाता घाटे और घरेलू महंगाई दर को प्रभावित करती है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश की जनता से ऊर्जा और ईंधन की बचत करने की अपील इसी गहरे संकट की गंभीरता का प्रतीक है। लेकिन यह केवल बचत करना इस संकट का स्थाई समाधान नहीं हो सकता। इसलिए इसी दूरगामी सोच के साथ, केंद्र की मोदी सरकार ने एक साथ दो मोर्चों पर भारत के इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा अभियानों की चुपचाप शुरुआत कर दी है। इसमें पहले मोर्चे के रुप में बंगाल की खाड़ी और पूर्वी तट के गहरे समुद्र में छिपे तेल व गैस के असीमित भंडारों का महा-सर्वे और दूसरा मोर्चा भारत के पास मौजूद विशाल कोयला भंडार को अत्याधुनिक ‘गैसीफिकेशन’ तकनीक के जरिए ‘सिनगैस’ (सिंथेटिक गैस) में बदलकर विदेशी एलपीजी और एलएनजी का पूर्ण स्वदेशी तोड़ तैयार करना शामिल है। ये दोनों परियोजनाएं संयुक्त रूप से भारत के ऊर्जा भविष्य को बदलने और विदेशी निर्भरता के चक्रव्यूह को तोड़ने वाले ‘ब्रह्मास्त्र’ के रूप में उभरने की राह पर हैं।

:बंगाल की खाड़ी में महा-समुद्री सर्वे

भारत के पूर्वी समुद्री तट को ऊर्जा विशेषज्ञ लंबे समय से एक ‘सोने की खदान’ मानते आए हैं, लेकिन आधुनिक और उच्च तकनीक की कमी के कारण इसका एक बड़ा हिस्सा अब तक अनछुआ रहा है। पश्चिमी तट पर स्थित ‘मुंबई हाई’ ने दशकों से भारत को घरेलू तेल प्रदान किया है, लेकिन अब समय आ गया है कि पूर्वी तट के गहरे समंदर की क्षमता का पूरी तरह दोहन किया जाए, जहां गहरे समंदर के छिपे रहस्यों की खोज हो रही है। शुरुआती भू-वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि बंगाल ऑफशोर बेसिन में समुद्र के नीचे 10 किलोमीटर से भी अधिक मोटी तलछटी परतें मौजूद हैं। पृथ्वी के इतिहास के ‘ईओसीन काल’ से लेकर हाल के भूवैज्ञानिक दौर तक की इन परतों में हाइड्रोकार्बन के प्रचुर भंडार होने के सकारात्मक संकेत मिले हैं। इसके अलावा, महानदी बेसिन में गहरे समुद्री गैस भंडार और जैविक गैस प्रणालियों की मौजूदगी व्यावसायिक स्तर पर तेल-गैस उत्पादन के लिए एक बड़ा अवसर प्रदान करती है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अंडमान का समुद्री क्षेत्र गैस के असीमित भंडारों से भरा हो सकता है। इसका कारण यह है कि अंडमान की भूगर्भीय संरचना सीधे तौर पर म्यांमार और इंडोनेशिया के उन समुद्री क्षेत्रों से मिलती-जुलती है, जहां पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड्स का संचालन हो रहा है। जबकि कृष्णा-गोदावरी बेसिन पहले से ही (रिलायंस का केजी-डी6 ब्लॉक जैसा) भारत का एक स्थापित गैस उत्पादक क्षेत्र है, लेकिन नया सर्वे इसके उन गहरे और अति-गहरे समुद्री हिस्सों पर केंद्रित है जिनकी अब तक आधुनिक तकनीक से मैपिंग नहीं हो पाई थी। वहीं, तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र में स्थित कावेरी बेसिन के गहरे समुद्री हिस्सों और ‘जुरासिक काल’ की प्राचीन परतों में छिपे तेल भंडारों को तलाशने की तैयारी है। इसके इसके अलावा इस मिशन में ‘गैस हाइड्रेट्स’ की खोज को भी प्राथमिकता दी गई है।

:विशेष सर्वे जहाज में पांच तटीय क्षेत्र

डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ हाइड्रोकार्बन्स (डीजीएच) के नेतृत्व में तैयार किए जा रहे इस अभियान को तेज करने की दिशा में हाल ही में आधिकारिक टेंडर जारी कर दिए गये हैं। इन आधिकारिक टेंडर के दस्तावेजों के अनुसार, सरकार देश के पूर्वी तट के विभिन्न बेसिनों में बड़े पैमाने पर डेटा अधिग्रहण की तैयारी कर रही है। इस परियोजना को तकनीकी शब्दावली में (2डी ब्रॉडबैंड समुद्री भूकंपीय और गुरुत्व-चुंबकीय डेटा अधिग्रहण, प्रसंस्करण और व्याख्या) कहा जाता है। इस अभियान के विशेष सर्वे जहाज में अत्याधुनिक तकनीकों से लैस बड़े समुद्री जहाजों को उतारा जाएगा। इस विशाल अभियान का पैमाना यह सर्वे कितना व्यापक है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे लाखों वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले पांच प्रमुख तटीय क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, जिसमें 45-45 हजार किमी लाइन का बंगाल-पूर्णिया एवं महानदी बेसिन, 43-43 हजार किमी लाइन का अंडमान बेसिन और कृष्णा-गोदावरी बेसिन तथा 30 हजार किमी लाइन तक कावेरी बेसिन पर सर्वे होगा।

:भारत के काले सोने का ‘चमत्कारिक’ रूपान्तरण

भारत सरकार ने समुद्र के भीतर तेल तलाशने के साथ-साथ जमीन पर मौजूद अपने सबसे बड़े प्राकृतिक संसाधन कोयले (Coal) का एक क्रांतिकारी और वैकल्पिक उपयोग तलाश लिया है। अब तक भारत में कोयले का उपयोग मुख्य रूप से थर्मल पावर प्लांटों में बिजली बनाने के लिए किया जाता रहा है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण (कार्बन उत्सर्जन) की बड़ी समस्या खड़ी होती थी। लेकिन मोदी सरकार द्वारा लाया गया नया नीतिगत ‘ब्रह्मास्त्र’ कोयले के इस पारंपरिक उपयोग को हमेशा के लिए बदलने जा रहा है। इससे भारत केवल कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि कई प्रकार के ऊर्जा उत्पादों और रसायनों के लिए भी विदेशों पर निर्भर नहीं रहेगा। उत्पादित ‘सिनगैस’ को रिफाइन करके महत्वपूर्ण उत्पाद घरेलू स्तर पर ही बनाए जा सकते हैं, जिसमें स्वदेशी एलएनजी व एलपीजी का विकल्प सीधे तौर पर सिंथेटिक प्राकृतिक गैस बनाई जा सकती है, जो सीधे हमारी रसोई गैस और सीएनजी वाहनों की जरूरत को पूरा करेगी। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने कोयला गैसीफिकेशन के लिए ₹8,500 करोड़ की एक विशेष प्रोत्साहन योजना को पहले ही मंजूरी दी जा चुकी है। इस विजन के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में वर्तमान में ₹6,233 करोड़ की भारी-भरकम लागत वाली 8 बड़ी परियोजनाओं पर निर्माण कार्य और तकनीकी स्थापना का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है। जाहिर सी बात है कि जब तक भारत अपनी ऊर्जा के लिए पश्चिम एशिया या अन्य विदेशी देशों पर निर्भर रहेगा, तब तक उसकी विदेश नीति और आंतरिक अर्थव्यवस्था पर वैश्विक संकटों की तलवार लटकती रहेगी। अमेरिका-ईरान तनाव हो या सऊदी अरब और यमन के बीच संघर्ष, हर बार भारत को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं से समझौता करना पड़ता है। घरेलू स्तर पर तेल की खोज और कोयले से गैस का निर्माण भारत को इन वैश्विक झटकों से एक सुरक्षा कवच प्रदान करेगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

Mukesh Seth

Chief Editor

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