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लेखक- राजेंद्र द्विवेदी

देश में तीन दशक में जाति और धर्म की सियासत ने समाज में ऐसा जहर घोला है कि आने वाले दिनों में जाति और सांप्रदायिक दंगे बहुत बड़ी समस्या बन जायेंगे। हालांकि आज भी समाज में इतना जहर फ़ैल चुका है कि छोटी- छोटी बातों पर संघर्ष, हिंसा और हत्याएं हो जा रही है। इस जाति और धार्मिक उन्माद से देश का कोई भी राज्य चाहे वह भाजपा हो या गैर भाजपा राज्य शासित हो, कोई भी नहीं बचा है।

सियासत ने युवाओं के दिमाग में ऐसा उन्माद और अराजकता भर दी और जाति एवं धर्म के आधार पर खुलेआम समर्थन भी करते हैं। कोई मुस्लिम हिन्दुओं पर अमर्यादित टिप्पणी करता है तो घोषित- अघोषित रूप से मुस्लिम समाज उसके समर्थन में आ जाता है यही स्थिति हिन्दू समाज की भी है। जब कोई बाबा या हिन्दू धर्माचार्य मुस्लिम समाज पर टिप्पणी करता है तो हिंदुत्व का नाम लेकर अमर्यादित टिप्पणी करने वाले का समर्थन करते हैं। यही स्थिति जातीय संघर्ष की है।

जब दो जातियों के बीच विवाद होता है या कोई जाति से जुड़ा व्यक्ति पीड़ित होता है तो सियासत करने वाले दोषी पर करवाई करने की मांग से ज्यादा जातिय उन्माद को बढ़ावा देते हैं। नेता चाहे जितना बड़ा हो जो जिस जाति का हो, उसके बयान पीड़ित या आरोपित के समर्थन में रहता है।

बहराइच सहित प्रदेश के कई जनपदों में दुर्गा विसर्जन के दौरान हिंसक घटनाएं हुई जिनमें जाने भी गयी और सम्पति का भारी नुकसान हुआ। पूरे प्रदेश में कई स्थानों पर सांप्रदायिक तनाव भी बने हुए हैं। पिछले दिनों एक एनकाउंटर को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ के बीच आरोप- प्रत्यारोप का दौर चला। दोनों की बयान को सभ्य समाज उचित नहीं कह सकता। मणिपुर पिछले 20 महीने से अधिक समय से जल रहा है। देश की सियासत में पक्ष व विपक्ष दोनों में केवल आरोप- प्रत्यारोप ही चल रहे हैं। समाधान को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता एक साथ एक मंच पर नहीं आ रहे हैं। आखिर सियासत इतनी गंदी हो चुकी है। मणिपुर की घटना इतनी अमानवीय कृत्य है इसे सोच सोच कर आम भारतीय भी चिंतित है।

सवाल यह है कि कमजोर और छोटे राज्य जो सत्ता तक पहुंचाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते उन्हें नजरअंदाज करना यह लोकतंत्र के लिए भी बहुत घातक हैं। जाति और धार्मिक संघर्ष से अखबार, सोशल मीडिया भरे पड़े हैं। इन दोनों बुराइयों से कोई भी राज्य अछूता नहीं है लेकिन सियासत ने आँख पर पट्टी बांध रखी है और उनके कान सियासत के लाभ हानि पर ही खुलती है। बहुत ही चिंता का विषय है कभी सपने में भी नहीं सोचा गया था कि 70 के दशक में जिस प्यार मोहब्बत के साथ समाज एकजुट था। गरीबी जरूर थी लेकिन वैमनस्ता नहीं थी।

मुझे याद होली, दिवाली, ईद और गांव और आस-पास लगने वाले मेले में सभी जाति-धर्म, सम्प्रदाय प्यार के साथ मिलते थे, जाते थे और आपस में त्यौहारों को मनाते थे। मुहर्रम में बहुत सारे हिन्दू ताजिया रखते थे, उनके साज-बाज में भी शरीक होते थे। इसी तरह मुस्लिम होली खेलते थे, दिवाली मानते थे। आर्थिक दिक्कतें होने के बाद भी समाज बहुत खुशहाल था। आजादी के 75 साल होने के बाद देश ने विकास किया लेकिन हमारी सामाजिक मान्यताएं पारिवारिक ताना- बाना सब कुछ बिखर गया। परिवार डूब गए समाज में जाति और धार्मिक उन्माद चरम पर है। सियासत करने वाले सत्ता के लिए टूटते समाज, बढ़ते जातीय संघर्ष में खुल कर रोटी सेक रहे है। कोई भी दल का नेता राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय सभी एक ही रंग में है। कोई भी समाज में जहर घोलने से पीछे नहीं है। आने वाले दिन में विकास चाहे जितना कर ले लेकिन बढ़ते सामाजिक और धार्मिक संघर्ष के कारण हमें विनाश से भी रोकना रोकना चुनौती होगी।

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

By Mukesh Seth

Chief Editor

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