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लेखक- डॉ.के. विक्रम राव

मुस्लिम अलगाववाद के नायाब शिल्पी सर सैय्यद अहमद खान का जन्मोत्सव भारत में मनाया जा रहा है। कड़ुए ऐतिहासिक यथार्थ को भुलाकर। दोआबा की तहजीबी संगमी-परंपरा को नजरंदाज कर। भारतीय मुसलमानों की अलग कौमियत को उभारकर उन्होंने वतन को विभाजित कराने की नींव डाली थी। असल में दिल्ली के जामिया मिलिया के आदर्श को ज्यादा याद करना चाहिए। सर सैय्यद के बजाय उन मुस्लिम विद्वानों की चर्चा हो जिन्होंने एक भारत के लिए अपना जीवन लगा दिया : हकीम अजमल खान, सैय्यद फजल-उल हुसैन (हसरत मोहनी), अली बंधु आदि जो मजहब को राष्ट्र का आधार नहीं मानते थे।

इसी सिलसिले में पहले गत सप्ताह के कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडाल में आगरे की चार साल की बालिका फातिमा ताहिर के पांव पंडितों द्वारा धोने तथा पूजा की बात हो। बंगाल के 24-परगना का गांव है अर्जुनपुर जहां से महाष्टमी के दिन देश को समावेशी संप्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया गया। परंपरा को तोड़ा जिसके अनुसार केवल ब्राह्मण बालिका की ही कन्या पूजा होती है। तमाल दत्ता तथा मौसमी दत्ता ने एक उस परिपाटी को दुहराया जो स्वामी विवेकानंद ने बनाई थीं। उन्होंने महिलाओं के महत्व को देने हेतु बेलूर मठ में कुमारी पूजा प्रारंभ की थी। कश्मीर के खीर भवानी मंदिर में 1898 में शिकारा के मुसलमान नाविक की बेटी की पूजा स्वामीजी ने की थी। सवा सौ साल पूर्व ही कौमी एकता को पनपाया था। 
 क्या विडंबना है कि सर सैय्यद अहमद खान भारतीय मुसलमानों को अलग नागरिक मानते रहे। मोहम्मद अली जिन्ना के लिए वैचारिक अस्त्र तैयार कर दिया था। वर्षों बाद इसी जिन्ना ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को “पाकिस्तान” का अस्त्रागार बताया था।

भारत की एकजुटता में सर सैय्यद की पृष्ठभूमि क्या थी ? वे 1857 में सम्राट बहादुर शाह जफर का पतन चाहते थे। उन्होंने कंपनी में क्लर्क की नौकरी से जीवन प्रारंभ किया था। उनके रहते दो मुगल युवराज खिज्र खां और मिर्जा मुगल को कप्तान हडसन ने दिल्ली के खूनी दरवाजे पर गोली से उड़ा दिया था। अपने परदादा नसीरुद्दीन हुमायूं के मकबरे में ये मुगल राजकुमार छिपे हुये थे। अंग्रेजों के खिलाफ तब पूरा भारत लड़ रहा था। मगर 1857 की क्रांति की सर सैय्यद ने मुखालफत की थी।
 उस समय तक हिंदुस्तानी ही भारत की देशी भाषा थी। फिर सर सैय्यद ने किताब लिखी “असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिन्द जिसमें उर्दू को भारतीय मुसलमानों की अलग भाषा बनाने पर ज़ोर दिया।” उर्दू अलहदा जुबां बन गई। मगर यह इस्लामी पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी। क्यों ? पंजाबी, सिंधी, अरबी, बांग्ला (पूर्वी क्षेत्र में) आदि सदियों पुरानी थी। पाकिस्तान बनने पर एक वाकया हुआ। मियां मोहम्मद अली जिन्ना से पूछा गया कि : “आपको उर्दू आती है ?” जवाब मिला : “अपने खानसामा को हुकुम देने भर की।” इसीलिए बहुत पीड़ा होती है कि बहुतायत मुसलमानों ने मौलाना अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान, अबुल समद खान, रफी अहमद किदवाई आदि को अपना नेता कभी नहीं माना। हालांकि वे सब राष्ट्रवादी थे।

सर सैय्यद की खास उपलब्धि अलीगढ़ विश्वविद्यालय रही। मई 1875 में उन्होने 'मदरसतुलउलूम' नामक एक मुस्लिम स्कूल स्थापित किया। सेवानिवृत्ति के बाद 1876 में उन्होने इसे कॉलेज बनाया। तब संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर जान स्ट्रेचे ने मौलवी समीदुल्ला खान को भूमि आवंटित की। शीघ्र ही मुस्लिम राजनीति में सर सैयद की परंपरा मुस्लिम लीग (1906) के रूप में उभरी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1885) के विरूध्द उनका प्रोपेगंडा था कि कांग्रेस सिर्फ हिन्दू पार्टी है।

तुलनात्मक रूप से राष्ट्रवादी मुस्लिम शिक्षण संस्था जामिया मीलिया पर नजर डालें। यह गांधीवादी सेक्युलर केंद्र है। इसके संस्थापकों का आस्थामंत्र है: हुबुल वतन, मीनल ईमान (अर्थात देश के प्रति तुम्हारा प्रेम, तुम्हारे विश्वास का हिस्सा है)। दशकों से जामिया मीलिया इस्लामिया राष्ट्रवाद का सर्वाधिक उम्दा प्रतीक रहा। भले ही अनभिज्ञ हिन्दू के लिए जामिया मिलिया एक मदरसानुमा है जहाँ केवल इस्लाम पढ़ाया जाता है। इस्लामिस्टों की नजर में यह धर्मविरोधी केन्द्र रहा। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने मुसलिम अलगाववाद को गहरा कर दिया था और हिन्दू-मुस्लिम को दो राष्ट्र के रूप में पेश किया था। जामिया ने इन दोनों अवधारणाओं की जमकर मुखालफत की थी। जामिया की स्थापना ही बड़े सेक्युलर ढंग से हुई। मुस्लिम युनिवर्सिटी से अलग होने के बाद अलीगढ़ में सेठ किशोरी लाल के कृष्णा आश्रम में 31 अक्तूबर 1920 में इसकी नींव पड़ी। हकीम अजमल खान, हसरत मोहानी, मौलाना शौकत अली, मौलाना मोहम्मद अली आदि ने जामिया भवन बनाया। वे सब अलीगढ़ युनिवार्सिटी के संकुचित, सांप्रदायिक सिद्धांतो से असहमत थे। यहां एक तुलना उल्लेखनीय है। अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के संस्थापक सैय्यद अहमद खान को उनकी सेवा के एवज में ब्रिटिश सरकार ने “सर” के खिताब से नवाजा था। ठीक इसी समय जामिया मिलिया की स्थापना मौलाना महमूद हसन ने की जो तभी मालटा में ब्रिटिश जेल की कैद से रिहा होकर भारत लौटे थे। उनके इस राष्ट्रवादी शैक्षणिक अभियान में मौलाना अबुल कलाम आजाद, डा. सैफुद्दीन किचलू, डा. मुख्तार अहमद अंसारी, मौलाना अब्दुल बारी फरंगीमहली तथा मौलाना हुसैन अहमद मदनी शामिल थे।

गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में जामिया मिलिया इस्लामिया के अध्यापक सत्याग्रही बनकर ब्रिटिश जेलों में रहे। वे लोग सरदार पटेल के बारदोली आन्दोलन से जुडे़ थे। मौलवी साद अंसारी, छात्र नेता हुसैन हसन, खादीधारी और गांधीटोपी लगानेवाले शफीकुर रहमान किदवई स्वाधीनता संग्राम में जेल गए। जब गांधी जी ओखला-स्थित जामिया मिलिया के परिसर में (2 नवम्बर 1927) आये थे तो उनके स्वागत में खादी पहने, तकली से सूत कातते छात्र प्रवेशमार्ग की दोनों ओर खड़े थे। “मुझे लगता है मैं अपने घर आ गया हूँ”, कहा था तब बापू ने। 

जामिया के राष्ट्रीय स्वरूप पर बेहतरीन टिप्पणी की थी उसके पुराने छात्र राणा जंग बहादुर ने जो बाद में “टाइम्स आफ़ इंडिया” के सम्पादक बने और इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के संस्थापक थे। राणा ने कहा थाः “हिन्दुस्तान की प्यासी जवानी का जामिया के पनघट पर मेला लग गया था|” मगर अब वोट बैंक के लुटेरे जामिया को भी दूसरा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाना चाहते हैं।
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(लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट व वरिष्ठ पत्रकार/स्तंभकार हैं)

By Mukesh Seth

Chief Editor

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