लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷यह स्वागतयोग्य है कि सर्वोच्च अदालत ने संविधान के 103 वें संशोधन को संविधानपरक मानतेे हुए आर्थिक रुप से पिछड़े वर्ग के लोगों को शिक्षा संस्थानों व सरकारी नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी है। फैसले पर नजर डालें तो पांच न्यायाधीशों वाली पीठ में शामिल जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला त्रिवेदी व जेबी पारदीवाला ने कोटे के पक्ष में तथा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यूयू ललित एवं जस्टिस रविंद्र भट्ट ने कोटे के खिलाफ मत दिया है। उल्ल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 में संसद ने 103 वें संविधान संशोधन के जरिए देश में गरीबों के लिए अलग से दस फीसद आरक्षण की व्यवस्था की। इसे सर्वोच्च अदालत में 40 याचिकाओं के जरिए चुनौती दी गयी। सर्वोच्च अदालत को इस मामले में तीन सवालों पर विचार करना था। मसलन, क्या 103 वां संशोधन संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है? क्या इस संशोधन में एससी-एसटी एवं ओबीसी को कोटे से बाहर रखना संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है? क्या सर्वोच्च अदालत के इंदिरा साहनी फैसले से तय आरक्षण की सीमा को पार करना संविधान के खिलाफ है?। इन सभी मसलों पर सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई करते हुए बहुमत से कहा है कि आर्थिक आधार पर कोटा देना और इसके लिए 50 फीसद की सीमा को पार करना संविधान की मूल भावना के खिलाफ नहीं है। यह फैसला इस मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि अभी तक देश में आरक्षण सिर्फ सामाजिक और शैक्षिण पिछड़ापन के ही आधार पर दिया जाता था। लेकिन मौजूदा फैसले से साफ है कि आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक पिछड़ेपन को आधार बनाकर भी गरीब सामाजिक वर्ग के लोगों को आरक्षण दिया जा सकता है। गौर करें तो सरकार ने यह फैसला आर्थिक रुप से कमजोर लोगों को लाभ पहुंचाने के साथ-साथ सामाजिक न्याय एवं अवसर की समानता के ताने-बाने को मजबूत करने के लिए ही लिया था। सरकार ने अनुसूचित जाति-जनजाति एवं ओबीसी को पहले से मिल रहे आरक्षण में किसी प्रकार की कटौती किए बिना ही आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग के लोगों को आरक्षण का प्रावधान किया। सर्वोच्च अदालत ने इसे संविधान के खिलाफ नहीं माना है। हालांकि 25 सितंबर, 1991 को जब नरसिंहा राव की सरकार ने आर्थिक रुप से पिछड़ों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण देने की अधिसूचना जारी की तब सर्वोच्च अदालत ने दो टूक कहा था कि संविधान में आरक्षण का आधार किसी समूह या जाति की सामजिक स्थिति है न कि आर्थिक स्थिति। लेकिन मौजूदा मामले में न्यायालय ने सरकार के फैसले पर मुहर लगा दी। ऐसा इसलिए कि संविधान में संशोधन के जरिए गरीबों के लिए आरक्षण का जो प्रावधान किया गया उसमें पहले से मिल रहे आरक्षण में किसी प्रकार की कटौती नहीं की गयी। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने कहा भी है कि आरक्षण वंचित वर्ग को समाज में शामिल करने में अहम भूमिका निभाता है। इस संदर्भ में ईडब्ल्यूएस कोटा संविधान के मूल ढांचे को न तो नुकसान पहुंचाता है, न समानता के सिद्धांत को तोड़ता है। जस्टिस बेला त्रिवेदी ने भी कहा कि एससी, एसअी, ओबीसी को पहले से कोटा मिला है, आर्थिक रुप से कमजोर लोगों को भी अलग वर्ग मानना सही होगा। इन्हें कोटा देना संविधान का उलंघन नहीं कहा जा सकता। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कोटे का समर्थन करते हुए कहा कि ईडब्ल्यूएस कोटा सही है पर इसे अनंतकाल तक नहीं बढ़ाना चाहिए। आरक्षण किसी मसले का आखिरी हल नहीं हो सकता। यह समस्या की समाप्ति की शुरुआत भर है। जस्टिस जेबी पारदीवाला का विचार इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि आरक्षण का लक्ष्य समय से पूरा होना चाहिए न कि अनंतकाल तक जारी रहना चाहिए। अभी पिछले साल ही मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को अगड़े समुदाय के लोगों को उच्च शिक्षा और नौकरियों में आर्थिक आधार पर आरक्षण की संभावना तलाशने के निर्देश दिए। तब जस्टिस किरबाकरन द्वारा कहा गया कि आरक्षण के मामले में अगड़े समुदायों के गरीबों की अनदेखी की गयी है और विरोधी स्वर उठने के डर से कोई भी उनके बारे में बोलता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक न्याय तो हर वर्ग को मिलना चाहिए। यह किसी से छिपा नहीं है कि देश में निवास कर रही सभी जातियों में आर्थिक रुप से गरीब और असहाय लोग हैं और उन्हें आरक्षण के दायरे में लाकर उनका विकास किया जा सकता है। भारत एक विविधतापूर्ण भरा समाज है और समाज के सभी अंगों को सुव्यवस्थित रखकर ही देश का विकास संभय है। देश में यह आम धारणा है कि उच्च जातियों के पास पर्याप्त कृषि व आवास योग्य भूमि है और वे शिक्षित हैं लिहाजा उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय नहीं हो सकती। अर्थात वे गरीब नहीं हो सकते। लेकिन यह सही नहीं है। उच्च जातियों में भी ऐसे लोगों की तादाद बहुत अधिक है जिनकी आर्थिक स्थिति दलितों और वंचितों से भी बदतर है। उचित होगा कि देश की सभी राज्य सरकारें आर्थिक रुप से कमजोर व पिछड़े लोगों को चिंह्नित करने के लिए आयोग का गठन करे। आयोग उनकी आर्थिक स्थिति की पड़ताल करे तथा साथ ही आर्थिक स्थिति कमजोर होने से सामाजिक स्थिति में आए बदलाव का भी उल्लेख करे। यह तथ्य है कि माली स्थिति खराब होने पर सामाजिक स्थिति प्रभावित होती है। किसी भी देश व समाज के निर्माण में अर्थ की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लिहाजा आवश्यक है कि आर्थिक रुप से कमजोर लोगों को हर तरह की सुविधा मिले ताकि वे राष्ट्र की मुख्य धारा में समाहित हो सकें। अच्छी बात यह है कि कई राज्यों ने आर्थिक रुप से पिछड़ों की आर्थिक हालत जानने की सुध लेते हुए आयोग गठित किए हंै। उदाहरण के लिए नीतीश सरकार ने 2011 में उच्च जातियों की स्थिति जानने के लिए राज्य आयोग का गठन किया। इस आयोग के अध्यक्ष इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रिटायर्ड न्यायधीश डीके त्रिवेदी बनाए गए। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राज्य के गांवों में उच्च जातियों में कुछ लोग बेहद बदहाली में जीवन गुजर-बसर कर रहे हैं और उनकी आर्थिक स्थिति दलितों और वंचितों जैसी है। इस रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ था कि राज्य में उनकी कुल संख्या 2 करोड़ 18 लाख है जिनमें तकरीबन 15.6 मिलियन आबादी यानी 1 करोड़ 56 लाख ऐसे हैं जो बेहद गरीब हैं। इस रिपोर्ट में आर्थिक रुप से पिछड़े गरीब सवर्णों के उत्थान और उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए तीन मुख्य सिफारिशें की गयी। एक, लोककल्याणकारी योजनाओं में उच्च जाति के गरीबों का भी ख्याल रखा जाए। दूसरा, डेढ़ लाख से कम सालाना आय वाले उच्च जाति गरीबों को भी उन सभी योजनाओं से जोड़ा जाए जो गरीबों और पीछे छुट गए लोगों के लिए बनायी जाती है। और तीसरा, छात्रवृत्ति योजनाओं सहित गरीबों के लिए घर, शौचालय सुविधा और कृषि संबंधित योजनाओं को पुनर्भाषित करते हुए उच्च जाति के गरीबों को भी इसमें शामिल किया जाए। उचित होगा कि बिहार सरकार न्यायाधीश डीके त्रिवेदी की रिपोर्ट को लागू कर उस पर क्रियान्वयन करे ताकि राज्य के सवर्ण गरीबों को उनका हक मिल सके। बिहार ही क्यों? देश के अन्य राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी है कि वह आर्थिक रुप से पिछड़े सवर्णों की पड़ताल के लिए आयोग का गठन करें। अगर यह पहल सभी राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है तो निःसंदेह देश व समाज का भला होगा। देखा जा रहा है कि जो लोग आरक्षित श्रेणी के हैं उनमें बहुतेरे लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत ही मजबूत है। फिर भी वे आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। इसका नुकसान आरक्षित समाज के ही लोगों को उठाना पड़ रहा है। यह स्थिति ठीक नहीं है। अब समय आ गया है कि आरक्षण के स्वरुप और संरचना में बदलाव हो। उचित तो यह होगा कि अब जाति के बजाए समाज के सभी जातियों के उन सभी लोगों को आरक्षण के दायरे में लाया जाए जो वाकई में गरीब और बेसहारा हैं। ऐसा होता है तो इसका लाभ समाज के सभी वर्गों के लोगों को मिलेगा। जाति की सियासत पर विराम लगेगा और देश विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















