लेखक-अरविंद जयतिलक
♂÷हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका समेत 13 देशों ने ‘हिंद-प्रशांत आर्थिक समूह’ (आईपीईएफ) व्यापारिक समझौते को आकार देकर इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती दादागीरी और धौंसबाजी पर निर्णायक लगाम लगाने की कवायद तेज कर दी है। इस आर्थिक ढांचे से जुड़ने वाले देशों में अमेरिका के अलावा आस्टेªलिया, ब्रुनेई, भारत, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, न्यूजीलैंड, फिलिपीन, सिंगापुर, थाइलैंड और वियतनाम शामिल हैं। इस आर्थिक समूह में शामिल सदस्य देशों का उद्देश्य आपसी समन्वय को धार देते हुए अर्थव्यवस्था को मजबूत और प्रतिस्पद्र्धी बनाना है। समूह के संयुक्त घोषणापत्र में स्पष्ट कहा गया है कि यह समूह कोरोना महामारी और यूक्रेन पर रुस के हमले से उत्पन मौजूदा कई समस्याओं जैसे सप्लाई चेन में बाधा, महंगाई में वृद्धि, डिजिटल धोखाधड़ी से निपटने में आपसी सहयोग की दिशा सुनिश्चित करेगा। दो राय नहीं की सदस्य देशों के बीच सप्लाई चेन मजबूत होती है तो चीन पर से विश्व की निर्भरता कम होगी और उसका दबदबा कम होगा। अमेरिका ने आर्थिक समूह में शामिल सदस्य देशों को भरोसा दिया है कि वह अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए हरसंभव प्रयास करेगा जिससे कि इस क्षेत्र में विकास और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त हो। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खुले, मुक्त एवं समावेशी हिंद-प्रशांत की प्रतिबद्धता पर जोर देते हुए आर्थिक समूह की रुपरेखा को वैश्विक आर्थिक ग्रोथ का इंजन बनाने की बात कही। उन्होंने भारत की महत्ता को रेखांकित करते हुए यह भी कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कारोबार प्रवाह में भारत सदियों से एक प्रमुख केंद्र रहा है। मौजूदा दौर में भी भारत इस क्षेत्र को समावेशी और समान अवसर वाला क्षेत्र बनाने के लिए दृढ़संकल्पित है। उन्होंने एक टिकाऊ सप्लाई चेन की स्थापना के लिए 3 टी यानी ट्रस्ट (भरोसा), ट्रांसपैरेंसी (पारदर्शिता), और टाइमलीनेस (सामयिकता) का मंत्र भी दिया। उल्लेखनीय है कि जापान की राजधानी टोक्यो में आयोजित ‘हिंद-प्रशांत आर्थिक समूह’ इस मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इसमें क्वाड देशों के अलावा चीन की हमलावर नीति से भयभीत-परेशान वे सभी देश हैं जो इस क्षेत्र में शक्ति-संतुलन के हिमायती हैं। गौर करें तो चीन पहले से ही क्वाड समूह से भयभीत है। उसे लग रहा है कि क्वाड में शामिल देश उसके खिलाफ साजिश रच रहे हैं। संभवतः उसके दिमाग में यह भी चल रहा है कि क्वाड देश समुद्र में उसके आसपास अपने वर्चस्व को बढ़ाकर उसे निशाना बना सकते हैं। वह क्वाड को एक उभरता हुआ ‘एशियाई नाटो’ के तौर पर देख रहा है। वह जानता है कि क्वाड की मजबूती से इस क्षेत्र में उसकी मनमानी पर नियंत्रण लगेगा और समुद्र के जरिए दुनिया पर राज करने की उसकी मनोकामना पूरी नहीं होगी। जबकि यह सच्चाई है कि क्वाड का उद्देश्य प्रशांत महासागर, अमेरिका और आस्टेªलिया में विस्तृत नेटवर्क के जरिए जापान और भारत के साथ मिलकर इस क्षेत्र में एक ऐसा वातावरण निर्मित करना है जिससे एक स्वतंत्र, खुली और समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त हो। चूंकि क्वाड के अलावा ‘हिंद-प्रशांत आर्थिक समूह’ भी आकार ले लिया है ऐसे में चीन को लगने लगा है कि इस क्षेत्र में उसकी काली करतूतों और उसके जहाजों पर कड़ी नजर रखना कठिन नहीं होगा। किसी से छिपा नहीं है कि दुनिया भर के प्राकृतिक संसाधनों पर गिद्ध दृष्टि लगाए बैठे चीन इस क्षेत्र में चोरी-छिपे मछलियों का बड़े पैमाने पर शिकार करता है। इस क्षेत्र में नब्बे फीसदी से अधिक मछलियों के शिकार के लिए एकमात्र बीजिंग ही जिम्मेदार है। उसके जहाज जबरन विशेष आर्थिक जोन की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं और पर्यावरण के साथ-साथ बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान को अंजाम देते हैं। चीन की इस हरकत से सभी देश परेशान है। दूसरी ओर वह इस इलाके में सुरक्षा बेड़ा खड़ा कर अन्य देशों की संप्रभुता और सुरक्षा को भी चुनौती परोस रहा है। ऐसे में उस पर नकेल कसना बेहद जरुरी हो गया है। अच्छी बात है कि ‘हिंद-प्रशांत आर्थिक समूह के सदस्य देशों के बीच सहमति बन गयी है कि वह सैटेलाइट सिस्टम का इस्तेमाल कर चीन की हरकतों पर लगाम कसने को तैयार हैं। ऐसे में चीन की बेचैनी और छअपटाहट बढ़ना लाजिमी है। उसने इस समझौते को लेकर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा है कि इससे इलाके में शांति को चोट पहुंचेगी। चूंकि 13 सदस्यीय हिंद-प्रशांत आर्थिक समूह’ के अलावा क्वाड देशों की बैठक में भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर अहम निर्णय लिए जाने है इससे भी चीन की बेचैनी का सतह पर उभरना लाजिमी है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की दादागीरी नहीं चलने वाली है। चीन के खिलाफ यह पहल इसलिए भी आवश्यक है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र वैश्विक अर्थव्यवस्था की मुख्य धुरी है। मौजूदा समय में यह क्षेत्र भू-राजनीतिक व सामरिक रुप से वैश्विक शक्तियों के मध्य रण का क्षेत्र बना हुआ है। गौर करें तो इस क्षेत्र की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या के तकरीबन एक तिहाई से ज्यादा है। विश्व के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 60 फीसदी और विश्व व्यापार का 75 फीसदी कारोबार इसी क्षेत्र से होता है। देखें तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अवस्थित बंदरगाह विश्व के व्यस्ततम बंदरगाहों में शुमार हैं। यह क्षेत्र इसलिए भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि यहां उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाने वाले क्षेत्रीय व्यापार और निवेश की अपार संभावनाएं हैं। किसी से छिपा नहीं है कि यह क्षेत्र उर्जा व्यापार के लिहाज से भी इस क्षेत्र के देशों के लिए अति संवेदनशील है। ऐसे में इस क्षेत्र को आर्थिक व सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रखने के लिए क्वाड के अलावा ‘हिंद-प्रशांत आर्थिक समूह’ जैसे नई-नई युगलबंदी आकार लेती है तो यह स्वाभाविक ही है। तथ्य यह भी कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र को ‘मुक्त एवं स्वतंत्र’ क्षेत्र बनाने के लिए अमेरिका भारत-जापान संबंधों के महत्व को सार्वजनिक रुप से स्वीकार चुका है तथा साथ ही अमेरिका के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र की नीति सर्वोच्च प्राथमिकता में है। दो राय नहीं कि विगत दशकों में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर चीन की विशिष्ट पहचान बनी है और वह आर्थिक सुधारों के जरिए विश्व की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन चुका है। लेकिन अब वह जिस आक्रामक तरीके से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी दखलदांजी बढ़ा रहा है उससे अमेरिका, भारत, आस्टेªलिया, जापान के अलावा इस क्षेत्र से जुड़े अन्य देशों का चिंतित होना लाजिमी है। पाश्चात्य अर्थशास्त्रियों और रक्षा विषेशज्ञों की मानें तो चीन भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था के समानान्तर ध्रुव के एक नए धुमकेतु के रुप में उभरकर अपने पड़ोसियों को परेशान करने की योजना पर काम कर रहा है। उसके निशाने पर मुख्य रुप से भारत, फ्रांस, आस्टेªलिया और जापान है। चीन इन देशों की मौजूदा गोलबंदी को समझ रहा है इसीलिए वह इन देशों की भू-संप्रभुता व सामुद्रिक सीमा का लगातार अतिक्रमण कर रहा है। दरअसल उसकी मंशा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत, आस्टेªलिया, फ्रांस और जापान की भूमिका को सीमित कर अपने प्रभाव का विस्तार करना है। उसे भय है कि अगर इस क्षेत्र में इन देशों की निकटता बढ़ी तो परिस्थितियां उसके प्रतिकूल होगी। इसलिए और भी कि जापान ‘एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग’ (एपीईसी) संगठन में भारत की सदस्यता का लगातार वकालत कर रहा है। उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक के प्रारंभ में सर्व-एशियावाद के विकास हेतु ‘एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग’(एपीईसी) संगठन बना जिसका जापान सहयोगी संस्थापक देश है। चीन समेत कुल 21 देश इस संगठन के सदस्य हैं। अभी तक भारत इस संगठन का सदस्य नहीं है। चीन अच्छी तरह जानता है कि अगर भारत इस संगठन का सदस्य बनता है तो उसकी मनमानी और विस्तारवादी नीति पर लगाम लगेगा। चीन इस तथ्य से भी सुपरिचित है कि भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए आस्टेªलिया और न्यूजीलैंड से भी द्विपक्षीय सहयोग के साथ-साथ बहुपक्षीय मंचों जैसे आसियान, हिंद महासागर रिम, विश्व व्यापार संगठन इत्यादि मंचों पर सुचारु रुप से सहयोग विकसित कर रहा है। यह सच्चाई भी है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका, भारत, फ्रांस, आस्टेªलिया और जापान के बीच गोलबंदी तेज हुई है और चीन की मुश्किलें बढ़ी है। अब जब 13 सदस्यीय ‘हिंद-प्रशांत आर्थिक समूह’ भी आकार ले चुका है ऐसे में चीन की पेशानी पर बल पड़ना तय है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















