♂️÷नरेन्द्र मोदी को ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जानसन से दिल्ली में गत सप्ताह (21 अप्रैल 2022) हुयी भेंट में गुलाम राष्ट्र द्वीप फॉकलैंड को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति की चर्चा करनी चाहिये थी। प्रयास करना चाहिये थे। उनका मौन बड़ा मुखर रहा। कारण यही कि एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र पर आधिपत्य बनाये रखना अमानुषिक, अक्षम्य अपराध है। भारत को ऐसी ही पीड़ा हजार वर्षों से रही। तब गजनी और गोरी के डकैत हमारे राष्ट्र पर हमला करते थे। ब्रिटिश साम्राज्यवादी शोषकों के जुल्मों—सितम से सर्वाधिक दु:खी और पीड़ित भारत ही रहा है।
अत: भारतीय जनमानस स्वभावत: ब्रिटिश उपनिवेशी शोषण से ग्रसित फॉकलैंड की जनता से बेशक हमदर्दी संजोयेगा। लेकिन विदेशनीति का नेहरुवादी नियम चला आ रहा है कि राष्ट्रहित गौण होता है। निजी छवि हेतु। हमारे मूल्यों और प्राचीन ”विश्वबंधुत्व” वाली भावना के यह प्रतिकूल है। यह निर्विवाद है कि फॉकलैंड की जंगे आजादी का ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरंट थैचर द्वारा क्रूर दमन मानवाधिकार पर निर्मम प्रहार रहा है। थैचर ब्रिटिश कसर्वेटिव पार्टी की पुरोधा रही जिनकी समता 1975—77 के इंदिरा गांधी शासन से किया जाता है। दोनों लौह महिला कहलाती थीं। समकालीन थीं।
जब अर्जेन्टीना जिसका फॉकलैंड द्वीप एक भूभाग है के विदेश मंत्री संतियोगो आन्द्रे कफीरा गत सप्ताह भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से दिल्ली में संवाद—आयोग में वार्ता कर रहे थे तो फॉकलैंड से ब्रिटिश सेना को हटाये जाने के लिये उन्होंने समर्थन मांगा। पर निराशा ही हाथ लगी। तात्पर्य यही कि महाबली ब्रिटेन से पारम्परिक याराना भारत कैसे छोड़ देता ? दु:ख तो इस बात का रहा कि पूर्व भाजपा मंत्री सुरेश प्रभु इस संवाद में आमंत्रित थे पर वे अमेरिका चले गये। भाजपा प्रवक्ता शाजिया इल्मी भी चन्द लम्हों के लिये सभा में आई और फिर अदृश्य हो गयी। स्पष्ट था कि दमन के शिकार अर्जेन्टीना से संवेदना के बजाये इन भाजपाईयों ने तटस्थता दिखायी। वे सब भूल गये कि पीड़ित और शोषक के बीच संग्राम में, दासता के विरुद्ध संघर्ष में निर्लिप्त रहना दमन का साथ देना माना जाता है।
अब यहां 1983 के असहाय अर्जेन्टीना पर ब्रिटिश नौसेना तथा हवाई हमले का जिक्र हो। तब अपने बिछुड़े फॉकलैंड द्वीप समूह को मातृभूमि में समाहित करने हेतु अर्जेन्टीना की मुक्ति सेना ने कार्रवाही की थी। राष्ट्रपति क्रिश्चियन फर्नांण्डिस किचनर ने भारत तथा अन्य स्वाधीनता—प्रेमी राष्ट्रों से ब्रिटिश आणविक आक्रमण के विरुद्ध बचाव की याचना की थी। उसी असमान युद्ध में लंदन के पंसारी की पुत्री निर्दयी प्रधानमंत्री थैचर ने अपनी महाशक्ति का कठोर प्रदर्शन किया था। भारत में इंदिरा गांधी तभी सत्ता पर दोबारा लौटीं थीं। उन्होंने भी अर्जेंटीना की त्राहिमामवाली पुकार को नजरअंदाज कर दिया। तब ”दिया और तूफान” के बीच वाले इस युद्ध में सभी को पता था कि क्या होगा। थैचर तभी संसदीय चुनाव का सामना कर रहीं थीं। अपनी हर नुक्कड सभा में वे बघारती थी कि किसी प्रकार ब्रिटिश वायु और नौसेना ने अर्जेन्टीना की सेना को रौंदा। भारत के तरह विश्व भी तमाशाबीन रहा। जंगे आजादी के दीवाने शहीद हो रहे थे। उधर साम्राज्यवादी शक्ति हथौड़े से चींटी को मार रही थी।
तारीख थी 13 अप्रैल 1982 की। ब्रिटिश नाकेबंदी के नतीजे में फॉकलैंड द्वीप की ढाई हजार जनता भूख प्यास से मरने लगी। राजधानी ब्यूनस आयर्स पर बमबारी अलग हो रही थी। इसका पूर्ण विवरण (कभी अंग्रेजों के समर्थक रहे ) कोलकाता के अंग्रेजी दैनिक ”स्टेट्समन” ने 25 जुलाई 2012 के अंक में में छापा था। ”ला मालविनास वार” के शीर्षक से लिखे लेख में विश्व विख्यात साहित्यकार गाब्रियाल गार्शिया मार्कज जो नोबेल साहित्य पुरस्कार से नवाजे गये थे ने पसीजे दिल से मर्मस्पर्शी विवरण दिया था जिसे बम्बई की पत्रिका ”इम्प्रिन्ट” ने प्रकाशित भी किया था (1983 के ग्रीष्मकाल में)। यह रपट रोंगटे खड़ी कर देती है। निर्बल अर्जेन्टीना के सैनिक किरमिच के जूते पहने, उस हांड़कंपाने वाली ठंड में लड़े थे। भारतीय सैनिक का 1962 में चीन से युद्ध का मंजर सामने आ जाता हैं जब सूती मोजे पहन के हिमालयी बर्फ पर वे सब थे। इस साहित्यकार ने लिखा था कि ब्रिटिश सेना की अगली पंक्ति में गुरखा (नेपाली) सैनिक थे, जो अपनी खुखरी से अर्जेन्टीना के सिपाहियों के सर धड़ से अलग कर रहे थे। गाजर—मूली की भांति। हर सात क्षणों में एक मुंड गिर रहा था।
स्टेन्ली बन्दरगाह पर इस हमले में सात सौ गुर्खे थे, जिसमें केवल 70 जीवित बचे क्योंकि अर्जेन्टीना के स्वाधीनता सैनिक भी टक्कर दे रहे थे। गार्शिया के शब्दों में इस युद्ध से साफ हो गया कि दक्षिण एशिया (नेपाल) के सैनिकों की कुर्बानी ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथे का साम्राज्य बचाने के लिये मार्गरेट थैचर दे रही थी। इस विख्यात लातिन अमेरिकी लेखक गार्शिया ने लिखा कि ”एक सिपाही ने अपनी मां से फोन पर पूछा कि क्या वह अपने घायल साथी को घर ला सकता है? उसके दोनों हाथ युद्ध में कट गये हैं। मां ने मना कर दिया कि वह इस त्रासदी को देख नहीं पायेगी। तब उसके पुत्र ने अपने को गोली मार दी क्योंकि वह युद्ध में दोनों आंखें खो चुका था।
गार्शिया ने लिखा कि हजारों अर्जेन्टाइन सैनिकों के मलद्वार की शल्य चिकित्सा करनी पड़ गयी क्योंकि उसमें ब्रिटिश सिपाहियों ने संगीने घुसेड़ कर फाड़ डाला था। इतनी क्रूरता और अमानवीय हमले के बाद भी मार्गरेट थैचर ब्रिटिश संसद का चुनाव अपार बहुमत से जीतीं। विपक्ष के सोशलिस्ट (लेबर) पार्टी नेता माइकेल फुट थे जो महात्मा गांधी के भक्त रहे और कश्मीर भारत को अभिन्न अंग मानते थे। वे पराजित हो गये। फॉकलैण्ड पर अपने देश की गुलाम बने रहने पर यह ब्रिटिश सोशलिस्ट नेता शोकाकुल रहा।
तो कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि मोदी सरकार को ब्रिटिश उपनिवेशवाद की पुरजोर भर्त्सना करनी चाहिये थी। सदियों से गुलाम रहा भारत ब्रिटिश शोषकों का साथ क्यों दे ? कैसे दे ? सन् 42 के स्वाधीनता सेनानी—संपादक का आत्मज होने के नाते मेरी सोच यही है।
लेखक~के. विक्रम राव

÷लेखक IFWJ के नेशनल प्रेसिडेंट व वरिष्ठ पत्रकार/स्तम्भकार हैं÷






















