उज्जैन में सिंहस्थ के लिए सड़क चौड़ीकरण में कम्युनल टेंशन हो गया. सीएम अपना पुश्तैनी घर खुद तोड़ रहे हैं. मंदिर, मस्जिद सब मिल-जुलकर आपसी सहमति से तोड़े जा रहे हैं.
अगर ऐसा होता तो फिर पुश्तैनी कम्युनल चुनावी स्ट्रेटजी फेल हो जाती. शहर काजी जिस पर सहमत हैं, उसे कांग्रेस राज्यसभा सांसद नफरत की पराकाष्ठा कह रहे हैं. उज्जैन का कम्युनल टेंशन तो सुलझ जाएगा, सड़क चौड़ी भी हो जाएगी, लेकिन टेंशन चौड़ा करने का सियासी प्रयास कब बंद होगा. अगर कोई कानूनी उल्लंघन होगा तो कानून के पास जाकर निर्णय कराने का अधिकार सबके पास है.
जो भारत में कहा जा रहा है, जो सियासी नेता कह रहे हैं, वही बात अपने लफ़्ज़ों में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहनवाज शरीफ यूएन असेंबली में कह रहे हैं. शाहनवाज कहते हैं, भारत में मुसलमानों के साथ भेदभाव हो रहा है. धार्मिक नफरत फैलाई जा रही है. मस्जिदों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. पाक पीएम ने सहारनपुर में न्यायालय के आदेश पर मस्जिद तोड़े जाने की घटना को यूएन असेंबली में उठाया.
सबसे चिंता की बात यह है कि भारत के किसी भी सियासी नेता या धर्मगुरु ने शाहनवाज की इस बात के लिए निंदा नहीं की. देश के अंदरूनी मामलों में उन्हें दखल देने का कोई अधिकार नहीं है. भारत के मुसलमान ना केवल सुरक्षित हैं बल्कि समानता के साथ भारत में विकास की मुख्य धारा में भागीदार हैं.
भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मस्जिदें हैं. पाकिस्तान में तो ऐसा कोई महीना नहीं जाता जब मस्जिदों में बम नहीं फटते हों. भारत में ऐसी घटनाएं नहीं होतीं, यहां कानून का राज है. अगर कोई निर्माण अवैध है तो कोर्ट ऑर्डर पर उसे तोड़ा जाता है. अगर शहर के विकास के लिए जरूरी है, तो सभी धर्म, संप्रदाय के लोग मिलकर अपने धार्मिक स्थलों को भी तोड़ते हैं. उज्जैन में ही विकास के लिए कितने मंदिर तोड़े गए हैं.
भारत में हिंदू मुस्लिम पाकिस्तान का एजेंडा हो सकता है. भारत में अंदरूनी सियासी प्रोपेगेंडा हो सकता है. सरकार की नीतियों विकास में कोई भेदभाव भारत में संभव ही नहीं है. यूएन से उज्जैन तक एक जैसा माहौल बनाने का प्रयास अतीत से हो रहा है. पहले कश्मीर इसका केंद्र होता था. अब धारा 370 हटने के बाद कश्मीर के लोगों ने खुद को भावनात्मक रूप से भारत से जोड़ लिया है. अब तो पीओके में भारत से जुड़ने का आंदोलन शुरु हुआ है. शाहनवाज और इमरान अलग-अलग देश में हैं, लेकिन मंदिर मस्जिद को लेकर नफरत की बात एक आवाज में करते हैं.
जहां तक उज्जैन में सिंहस्थ के लिए विकास की बात है, हर बारह साल में यह धार्मिक अनुष्ठान होता है. हर सिंहस्थ के पहले सड़क, पुल और दूसरे विकास के लिए ऐसे ही विवाद खड़े होते हैं. प्रशासन क्यों नहीं इसके लिए एक मास्टर प्लान तैयार करता. हर सिंहस्थ में हजारों करोड़ रुपए खर्च होते हैं. शहर अस्त-व्यस्त होता है. फिर भी अगले सिंहस्थ के पहले वही सब दोबारा किया जाता है. अगर ईमानदारी से सिंहस्थ का मास्टर प्लान एक बार इंप्लीमेंट कर दिया जाए तो फिर बार-बार शहर के भीतर तोड़-फोड़ की आवश्यकता ही नहीं होगी.
यह जरूर है कि इस बार सड़क चौड़ीकरण के लिए पहले से सभी स्टेक होल्डर से संवाद किया गया. जिस सड़क पर मस्जिद के कुछ हिस्से को हटाने के लिए विवाद खड़ा हुआ है, इसी सड़क पर सीएम डॉ. मोहन यादव का पुश्तैनी घर है. एक दिन पहले उसके भी कुछ हिस्से को तोड़ा गया. देखने में बहुत सुखद लगा कि सीएम ने खुद अपने पुशतैनी घर को तोड़ने की शुरुआत की.
जब सीएम अपने पुश्तैनी घर पर गैंती चला रहे थे, तब यह देखा गया कि वह भाव-विह्वल हो गए. कोई भी अपने पुश्तैनी घर के टूटते समय ऐसा ही होगा.
राजनीति क्रूर हकीकत पर चलती है. इसमें भावनात्मक पक्ष भी एक सियासी स्वरूप ही बन जाता है. सीएम दिल से क्या महसूस कर रहे थे इससे किसी को खास फर्क नहीं पड़ता. उनके आलोचक और विरोधी तो इसे भी इमेज बिल्डिंग का एक मैनेजमेंट मान रहे हैं. विकास के नाम पर तमाम सारे लोगों की जमीनें जाती हैं. उनके पुश्तैनी मकान तोड़े जाते हैं. ऐसी ही भावनाएं उन सभी की होती होंगी. लेकिन जब दूसरे का कुछ टूटता है, तो मंत्री और सीएम की आंखों में आंसू नहीं होते. तब तो सरकार की मजबूरी होती है.
सीएम ने अपने पुश्तैनी घर का कुछ हिस्सा बलिदान कर अन्य लोगों के लिए उदाहरण पेश किया है. यही तो पब्लिक लीडर से चाहती है. कथनी और करनी में अंतर ना हो यही तो सच्चे लोकतंत्र के निशानी है.
सिंहस्थ के लिए किसानों की भूमि लेने के पुराने नियमों पर जब किसानों ने आंदोलन शुरू किया था, तब अगर बिना आंदोलन के ऐसी भावनाएं दिखाई पड़ती तो ज्यादा बेहतर होता. अभी तो सिंहस्थ में समय है. बहुत सारे अधिग्रहण और निर्माण आगे भी होंगे. भव्य और सफल सिंहस्थ पूरे उज्जैन की भावना है. इसके लिए अपना कुछ बलिदान करना उज्जैन वासियों के लिए खुशी का विषय है. माहौल तब खराब होता है, जब पिक एंड चूज होता है. जब प्रशासन भेदभाव करता है, जब निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, जब इसमें सियासत का ज्यादा हस्तक्षेप होता है.
यूएन असेंबली में पाक पीएम का भारत में मुसलमान की स्थिति और मस्जिद को लेकर दिए गए भाषण की निंदा भारत सरकार ने तो कर दी है. विदेश मंत्री जयशंकर प्रसाद ने इसका करारा जवाब यूएन में ही दे दिया है. नया भारत जवाब देने में देर नहीं करता. भारत के मुसलमानों को लेकर कुछ भी कहने का अधिकार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को नहीं है.
यूएन से उज्जैन तक हिंदू-मुसलमान को लेकर नफरत की एक जैसी आवाज इमरान और शाहनवाज करते हैं, तो यह भारत की समानता और संविधान अवमानना है. आपसी मसले दोनों समुदाय सुलझा लेंगे. पाकिस्तान पहले अपने देश के मुसलमान की रक्षा कर ले फिर भारत को नसीहत दे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



