लेखक :विमल मिश्र
समुद्र से उठती सनसनाती हवाओं और लहरों का गर्जन और दैत्याकार क्रेन्स और मुंबई बंदरगाह में चलती गतिविधियों की पृष्ठभूमि में लंगर डाले पास खड़े जहाजों का विहंगम नजारा। यहां घूमते एकबारगी लगता है भटक कर कहीं लंदन की सड़कों पर तो नहीं आ पहुंचे हैं!’
हरे-भरे पेड़ों से घिरी चौड़ी-चिकनी सड़कों पर एक जैसी डिजाइन, समान ऊंचाई और शैली की खुली-खुली हवादार बिल्डिंग्ज। 12 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में फैले बेलार्ड इस्टेट को यूरोपीय पुनर्जागरण काल की एडवर्डियन नियोक्लासिकल शैली की सुंदर, पिक्चर पोस्टकार्डनुमा आकर्षक और महंगी बिल्डिंग्ज से भरा मुंबई का आधुनिक रूप से नियोजित पहला कारोबारी परिसर होने का श्रेय हासिल है। बेलार्ड इस्टेट उत्तर में जीपीओ के पास हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी बिल्डिंग से दक्षिण में एशियाटिक लाइब्रेरी तक फैला है। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट ने अलेक्जेंड्रा डॉक्स (इंदिरा डॉक) की खोदाई से निकली मिट्टी, गाद और पत्थरों से 1914-1918 के बीच इसका निर्माण कराया। गेटवे ऑफ इंडिया बनाने वाले जॉर्ज विटेट को मुंबई पोर्ट ट्रस्ट ने इसे मुंबई के पहले नियोजित क्षेत्र और बिजनेस सेंटर के रूप में डिजाइन किया और उसका मॉडल रखा लंदन। 1923 में फ्रेट डॉक के उत्तर-पूर्वी छोर को छोड़कर रिक्लेमेशन का काम पूरा हो गया था। इसे नाम दिया गया कर्नल जे. ए. बेलार्ड के नाम पर जो मुंबई पोर्ट ट्रस्ट का संस्थापक होने के साथ यहां की गोदी व बेलार्ड इस्टेट के निर्माता भी थे। यात्री गोदियों ने यहां घर बनाया, तब यह मुंबई का सबसे रोबदार आफिस एड्रेस बन गया, जब तक नरीमन पाइंट ने इसका स्थान नहीं लिया।
यहीं आई थी सबसे पहले बिजली
टिकाऊपन, अच्छा सामान, वाजिब दाम और जीभ का चटखारा – यहां शॉपिंग से बेहतर कुछ और नहीं। सीजन के पहले अल्फांसो से लेकर लेटेस्ट फैशन – सब कुछ सबसे पहले फोर्ट के क्राफर्ड मार्केट (महात्मा ज्योतिराव फुले मंडई) के ही हिस्से आता है। मॉल्स और सुपर मार्केट्स का लोगों ने जब नाम तक नहीं सुना था यह बाजार तब से ही मुंबई के परिवारों का फैमिली शॉपिंग-कम-इंटरटेनमेंट है। क्राफर्ड मार्केट 1882 में देश का पहला ऐसा पहला इलाका बना, जहां के घरों और सड़कों पर बिजली के बल्ब जले।
मार्केट में प्रविष्ट होते ही उस जमाने के जाने-माने समाजसेवी सर कावसजी जहांगीर द्वारा भेंट किया पत्थर का बना सुंदर फव्वारा दिखता है। बाहर अहाते में एक सजावटी फव्वारे पर सर किप्लिंग द्वारा गढ़ी देवी रूपा तीन मुख्य नदियों और पशुओं की अन्य सुंदर कलाकृति है और पूर्वी छोर पर रॉट ऑयरन की रेलिंग्ज। कुर्ला रोड़ी, पोरबंदर कोनिया, बीच-बीच में बसीन के लाल पत्थरों से बनी साफ-सफाई में सुविधा के लिए आयातित फ्लैगस्टोन की फ्लोरिंग वाले तीन विशाल गलियारों और मुख्य हॉल वाली फ्लेमिश और मूरिश शैलियों के मिश्रण से बनी विलियम इमर्सन की डिजाइन की हुई ग्रेड-1 की यह हेरिटेज इमारत 128 फुट ऊंचे क्लॉक टावर के साथ अपनी कलात्मकता से आज भी बरबस ही कदम ठिठका लेती है। ऑर्थर क्राफर्ड द्वारा बनवाई 22000 वर्ग मीटर में फैली इस इमारत में एक विशाल केंद्रीय हॉल और और तीन प्रवेशद्वार। मुख्य प्रवेशद्वार की कमान पर संगमरमर के पैनलों पर ग्राम्यजीवन के साथ बाजार का दृश्य देखकर शिल्पकार जे. लॉकवुड किप्लिंग (नोबेले पुरस्कार विजेता रुडयार्ड किप्लिंग के पिता) को दाद देने का मन होता है।
सबसे बड़ी ओपन एयर लांड्री
‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में आपने धोबी घाट को देखा होगा। जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा मुंबई आए थे तो उनकी खास फरमाइश थी कि उन्हें महालक्ष्मी धोबी घाट दिखलाया जाए। इसे विश्व की सबसे बड़ी ओपन एयर लांड्री कहा जाता है और ग्रेड-2 ए की विरासत इमारत का दर्जा हासिल है।
फोर्ट की किलाबंदी हटने के बाद मुंबई के धोबी घाट पहले उस जगह हुआ करते थे, जहां आज छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस और मेट्रो सिनेमा हैं। इन धोबी घाटों पर सेंट जार्ज किले में तैनात फौजियों के कपड़े धुला करते थे। एस्प्लेनेड इलाकों में काफी कुएं थे, जिनकी वजह से धोबी घाट यहां के लिए बिलकुल मुफीद स्थान थे। यहां एक इलाका आज भी धोबी तालाब नाम से ही जाना जाता है। एशिया के इस पहले रेल ठिकाने के लिए जगह बनाने के लिए इसे 1870 के दशक में महालक्ष्मी की मौजूदा जगह स्थानांतरित किया गया। आज यहां ब्रिटिश काल के दो घाट हैं। बड़ा घाट 1888 से अस्तित्व में है।
जॉर्ज पंचम आए थे यहां
अक्टूबर शुरू होने को है। यह लगभग वही वक्त है जब 113 साल पहले (16 अक्टूबर, 1911 को) ऑपेरा हाउस पहली बार संगीत-लहरियों से गूंजा था। यह इमारत तब बननी शुरू ही हुई थी। इमारत के अस्थाई खांचों को पर्दों और कपड़ों से ढंक-ढांककर इंग्लैंड के सम्राट जॉर्ज पंचम के सम्मान में एक कार्यक्रम पेश किया गया। तभी से ‘रॉयल’ इसके नाम से जुड़ा है।
1915 में रॉयल ऑपेरा हाउस के तिमंजिले भवन का निर्माण पूर्ण हुआ। स्क्रीन पर मखमल का पर्दा, प्रसिद्ध कलाकारों द्वारा विशेष रूप से बनवाए गए बॉक्स, रवि वर्मा सरीखों के बनाए तैल चित्र-यहां सभी कुछ स्पेशल था। वास्तुकार थे मॉरिस बैंडमैन। निर्माण में खर्च आया साढ़े सात लाख रुपये। पहले यहां नाटक खेले जाते थे। 1935 में यह रेग्युलर सिनेमा शो का लोकप्रिय सेंटर बन गया। नवंबर, 1952 में गुजरात की गोंदल रियासत के महाराजा विक्रमसिंहजी ने आइडियल पिक्चर्स कंपनी के लिए इसे 999 वर्ष की लीज पर खरीद लिया। कुछ वर्ष पहले हुआ इसका रिस्टोरेशन उन्हींके पुत्र ज्योतेंद्रसिंहजी और महारानी साहेब कुमुद कुमारी गोंदल की देन है।



(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं)




