लेखक: योगेश प्रसाद
चंबल की तस्वीर बदलने के दावे के बीच मंगलवार को मालनपुर में जो तमाशा हुआ उसने सरकार और मुख्यमंत्री की मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मंच पर आए, फीता कटा, तालियां बजीं और घोषणा हुई कि गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स की चौथी नवीन एकीकृत विनिर्माण इकाई शुरू हो गई। साथ में 450 करोड़ के निवेश और 600 नई नौकरियों का ढोल भी पीटा गया।
पर हकीकत यह है कि गोदरेज मालनपुर से 35 साल का रिश्ता निभा रहा है। 1991 में यहीं पहली साबुन फैक्ट्री लगी थी। 70 एकड़ की जमीन पर पहले से तीन यूनिट चल रही हैं। कंपनी की एग्जिक्यूटिव चेयरपर्सन निसाबा गोदरेज ने खुद कहा कि यह विस्तार है, जो पुरानी पार्टनरशिप को आगे बढ़ाता है। कंपनी के आंकड़े भी यही बताते हैं कि साइट पर अब तक कुल 850 करोड़ का निवेश है।
फिर सवाल उठता है कि विस्तार को नई इकाई क्यों बताया गया। 450 करोड़ का ब्रेकअप क्यों नहीं दिया गया। कितनी नई मशीनें आई, कितनी नई बिल्डिंग बनी, कितने नए प्लांट लगे। इन सबका हिसाब गायब है। रोजगार का आंकड़ा भी हवा में है। कहा गया कि स्टाफ 2200 से बढ़कर 2800 होगा। पर इसमें कितनी भर्ती स्थानीय युवाओं की होगी, कितने लोग दूसरे प्लांट से शिफ्ट होंगे, इसका जिक्र नहीं।
सरकार के लिए यह इवेंट जरूरी था। भौगोलिक सूचना प्रणाली 2025 में 30.77 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिले थे। सरकार कह रही है कि 30 फीसदी प्रस्ताव जमीन पर उतर चुके हैं। आंकड़ा 10 लाख करोड़ तक पहुंचता है। ऐसे में कोई बड़ी
घोषणा चाहिए थी। पुराने विस्तार को नई उपलब्धि बनाकर पेश कर दिया गया। पिछले दो महीने में ग्वालियर-चंबल में यह तीसरा उद्घाटन है। पहले गुना में सीमेंट और शिवपुरी में डिफेंस प्लांट का उद्घाटन हुआ।
कंपनी का तर्क है कि प्लांट में नई ऑटोमेशन और डिजिटाइजेशन वाली लाइन लगी है। इसके बाद मालनपुर एशिया की सबसे बड़ी इंटीग्रेटेड सोप मैन्यूफैक्वरिंग साइट बन गई है। यहां हर मिनट 4000 साबुन बनेंगे। कंपनी का दावा है कि उत्पादन बढ़ेगा और निर्यात भी। MD आसिफ मलवारी ने राज्य सरकार की इज ऑफ टूईंग बिजनेस की तारीफ की और कहा कि मालनपुर गोदरेज की मैन्यूफैक्चरिंग का दिल है। पर जमीन पर लोग नाराज हैं। स्थानीय उद्योग संघ के लोगों का कहना है कि चंबल को उद्योग चाहिए, इवेंट नहीं। अगर विस्तार को ही नई फैक्ट्री बता दिया जाएगा तो असली निवेश और फर्जी निवेश में फर्क कौन करेगा। एक स्थानीय नेता ने कहा कि सरकार आंकड़े दिखाकर अपनी पीठ थपथपा रही है।
जनता को सिर्फ बैनर और भाषण मिल रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा है। चंबल दशकों तक पिछड़ेपन, पलायन और दस्यु समस्या के लिए जाना जाता था। अब जब यहां उद्योग आने लगे हैं तो पारदर्शिता सबसे जरूरी है। अगर सरकार और कंपनी मिलकर पुरानी बोतल में नई शराब परोसेंगी तो भरोसा टूटेगा।
इस पूरे मामले में तीन बातें साफ होनी चाहिए। पहला, 450 करोड़ का निवेश कहां और कैसे हुआ। मशीन, बिल्डिंग और तकनीक का ब्यौरा सार्वजनिक हो। दूसरा, 600 नई नौकरियों का सबूत। नियुक्ति पत्र, PF और ESI का डेटा। तीसरा, उत्पादन क्षमता में वास्तविक इजाफा। क्या वाकई आउटपुट बढ़ा और निर्यात हुआ। सरकार कह रही है कि एमपी में बेरोजगारी दर सबसे कम है और औद्योगिक प्रगति में राज्य अब्बाल है। एमपी से 76 हजार करोड़ का निर्यात भी हो रहा है। ये आंकड़े अच्छे हैं। पर इन्हें बचाने के लिए झूठे उद्घाटनों की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
अंत में सवाल वही रह जाता है कि गोदरेज प्रबंधन किसे धोखा दे रहा है। सरकार को या जनता को? और सरकार इस धोखे में साथी बन रही है या शिकार? जवाब के लिए पारदर्शिता जरूरी है। वरना चंबल का विकास फिर सिर्फ फाइलों और मंचों तक सीमित रह जाएगा.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)




