लेखक: संजय राय
आईफोन आज के दौर में सिर्फ एक मोबाइल फोन नहीं रह गया है। खासकर युवाओं के एक वर्ग के लिए यह आधुनिक जीवनशैली, प्रतिष्ठा और स्टेटस का प्रतीक बन चुका है। महंगा फोन रखना अब कई बार जरूरत से ज्यादा सामाजिक पहचान का सवाल बन जाता है। समस्या तब गंभीर हो जाती है, जब इस चाहत को पूरा करने के लिए आर्थिक सीमाओं, पारिवारिक रिश्तों और यहां तक कि जीवन की कीमत को भी नजरअंदाज कर दिया जाए। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में एक परिवार के तीन सदस्यों की मौत से जुड़ी घटना इसी खतरनाक मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सामने आई जानकारी के अनुसार, 18 वर्षीय कुणाल ने आईफोन खरीदा था, लेकिन उसकी भारी-भरकम किस्तें चुकाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था। इसी बात को लेकर पिता से उसका विवाद हुआ और नाराज होकर वह आत्मघाती कदम उठाने के इरादे से पहाड़ी पर पहुंच गया। गांव वालों ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना। अपने बेटे को बचाने के लिए पिता ने उसे पीछे खींचने की कोशिश की और इसी दौरान दोनों का संतुलन बिगड़ गया। दोनों गहरी खाई में जा गिरे। बेटे और पति को गिरता देख मां ने भी पहाड़ी से छलांग लगा दी। इस तरह एक महंगे फोन की चाहत से शुरू हुआ विवाद एक पूरे परिवार के लिए त्रासदी में बदल गया। इस घटना को केवल एक हादसा मानकर भूल जाना आसान है, लेकिन इसके पीछे छिपे सामाजिक सवाल कहीं ज्यादा गंभीर हैं।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि समस्या आईफोन या किसी एक ब्रांड की नहीं है। असली समस्या उस मानसिकता की है, जिसमें किसी वस्तु की कीमत व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना बन जाती है। जब महंगा फोन सफलता का प्रमाण और सामान्य फोन हीनता का प्रतीक समझा जाने लगे, तब उपभोक्तावाद केवल बाजार की प्रवृत्ति नहीं रहता, बल्कि मानसिक दबाव में बदल जाता है।
आज सोशल मीडिया ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगातार ऐसी जीवनशैली दिखाई जाती है, जिसमें महंगे फोन, ब्रांडेड कपड़े, लग्जरी कारें, विदेश यात्राएं और आलीशान जीवन सफलता के प्रतीक के रूप में पेश किए जाते हैं। युवा स्वाभाविक रूप से अपने आसपास के लोगों से तुलना करते हैं, लेकिन अब तुलना केवल पड़ोस या स्कूल-कॉलेज तक सीमित नहीं है। उनकी नजर पूरी डिजिटल दुनिया पर है। किसी दोस्त के हाथ में नया आईफोन देखकर दूसरे युवा के मन में भी वही फोन पाने की इच्छा पैदा होना सामान्य है। समस्या तब शुरू होती है जब इच्छा जरूरत पर हावी हो जाती है और उस इच्छा को पूरा करना प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता है।
महंगे स्मार्टफोन के लिए ईएमआई लेना अपने आप में कोई गलत बात नहीं है। आज बड़ी संख्या में लोग अपनी जरूरत के सामान किस्तों पर खरीदते हैं। लेकिन जब आमदनी और आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च केवल इसलिए किया जाए कि समाज या दोस्तों के बीच अपनी स्थिति कमतर न लगे, तो वही ईएमआई मानसिक और आर्थिक बोझ बन सकती है। कई परिवारों में बच्चों की मांग पूरी करने का दबाव इतना बढ़ जाता है कि माता-पिता अपनी जरूरतों में कटौती करके महंगी वस्तुएं खरीदते हैं। बच्चों को खुश रखने की इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें यह समझाना भी उतना ही जरूरी है कि हर इच्छा तुरंत पूरी होना आवश्यक नहीं है।
आईफोन को लेकर सामने आई कुछ अन्य घटनाएं इस समस्या का भयावह चेहरा दिखाती हैं। केरल में एक नाबालिग लड़की पर अपने दोस्तों के साथ मिलकर दादा की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा। पुलिस के मुताबिक, आईफोन और दूसरे महंगे सामान की चाहत इस मामले की एक वजह थी। लखनऊ में आईफोन की डिलीवरी लेकर पहुंचे डिलीवरी कर्मचारी की हत्या का मामला भी सामने आया, जिसमें आरोपियों पर महंगा फोन हासिल करने के लिए हत्या करने का आरोप लगा। ऐसी घटनाएं समाज को झकझोरती हैं, लेकिन इनके पीछे मौजूद मानसिकता को समझना भी उतना ही जरूरी है।
आईफोन हासिल करने के लिए किडनी बेचने या स्पर्म डोनेट करने जैसी कहानियां भी समय-समय पर इंटरनेट और मीडिया में चर्चा का विषय रही हैं। इनमें से कुछ घटनाओं के विवरण और दावों की स्वतंत्र पुष्टि हर मामले में संभव नहीं होती, इसलिए उन्हें तथ्य के रूप में प्रस्तुत करते समय सावधानी जरूरी है। फिर भी इन कहानियों का बार-बार चर्चा में आना बताता है कि महंगी वस्तुओं को लेकर पैदा होने वाला जुनून किस तरह सामाजिक कल्पना का हिस्सा बन चुका है। चीन के एक युवक द्वारा आईफोन खरीदने के लिए किडनी बेचने की घटना वर्षों तक चर्चा में रही। बाद में उसके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ने की खबरें सामने आईं। यह कहानी एक प्रतीक की तरह है कि कुछ समय के दिखावे के लिए उठाया गया गलत कदम जिंदगी भर की कीमत वसूल सकता है।
दरअसल, यह समस्या सिर्फ आईफोन की नहीं है। आज कोई महंगा स्मार्टफोन, बाइक, कार, घड़ी, कपड़ा या जूता सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन सकता है। बाजार लगातार हमारी इच्छाओं को बढ़ाता है। हर साल नया मॉडल आता है और उपभोक्ता को यह महसूस कराया जाता है कि पुराना मॉडल अब पर्याप्त नहीं है। विज्ञापन नई चीज को आधुनिकता से जोड़ते हैं और सोशल मीडिया उस आधुनिकता को सामाजिक स्वीकृति प्रदान करता है। धीरे-धीरे जरूरत छोटी होती जाती है और इच्छा बड़ी।
सबसे चिंता की बात यह है कि युवा उम्र में पहचान बनाने की प्रक्रिया चल रही होती है। इस उम्र में दोस्तों की राय, सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया और समाज की स्वीकृति का प्रभाव अधिक होता है। यदि किसी युवा को लगातार यह महसूस कराया जाए कि उसकी हैसियत उसके कपड़ों, फोन या बाइक से तय होती है, तो वह अपनी वास्तविक उपलब्धियों के बजाय वस्तुओं के जरिए अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर सकता है। यही मानसिकता धीरे-धीरे आर्थिक दबाव, निराशा और असुरक्षा में बदल सकती है।
ऐसे माहौल में परिवार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। माता-पिता को बच्चों की हर मांग पूरी करने के बजाय उन्हें जरूरत और इच्छा के बीच अंतर समझाना होगा। उन्हें यह बताना होगा कि महंगा फोन जीवन की सफलता का प्रमाण नहीं है और साधारण फोन किसी व्यक्ति की क्षमता को कम नहीं करता। बच्चे को पैसे का मूल्य, बचत, बजट और जिम्मेदार खर्च जैसी बातें बचपन से सिखाई जानी चाहिए। वित्तीय साक्षरता केवल बड़े लोगों की जरूरत नहीं है; आज के उपभोक्तावादी दौर में यह बच्चों की शिक्षा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए।
स्कूलों और कॉलेजों में भी इस विषय पर खुलकर बातचीत होनी चाहिए। विद्यार्थियों को केवल यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि तकनीक का इस्तेमाल कैसे करें, बल्कि यह भी समझाया जाना चाहिए कि तकनीक और उपभोक्तावाद उनके व्यवहार तथा मानसिकता को कैसे प्रभावित करते हैं। सोशल मीडिया पर दिखने वाली जिंदगी और वास्तविक जिंदगी में अंतर समझाना भी जरूरी है। हर चमकती चीज उपलब्धि नहीं होती और हर महंगी वस्तु आवश्यकता नहीं होती।
साथ ही, समाज को भी सफलता की अपनी परिभाषा बदलनी होगी। यदि हम किसी व्यक्ति को उसके फोन, कार या कपड़ों से आंकेंगे, तो युवाओं पर दिखावे का दबाव बढ़ेगा ही। हमें ऐसी सामाजिक संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें मेहनत, ज्ञान, ईमानदारी, प्रतिभा, संवेदनशीलता और उपलब्धियां व्यक्ति की पहचान बनें, न कि उसके हाथ में मौजूद मोबाइल फोन।
तकनीक हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए है, जीवन का अर्थ बनने के लिए नहीं। आईफोन खरीदना गलत नहीं है, महंगी वस्तु रखना भी कोई अपराध नहीं है। लेकिन किसी वस्तु के लिए अपनी आर्थिक क्षमता से आगे बढ़ जाना, परिवार से रिश्ते खराब कर लेना, अपराध की राह पर चल पड़ना या अपनी जिंदगी को खतरे में डाल देना निश्चित रूप से चिंताजनक है।
छत्रपति संभाजीनगर की त्रासदी हमें बेहद कड़वा सबक देती है। किसी फोन की कीमत चाहे कितनी भी हो, वह किसी इंसान की जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती। बच्चों और युवाओं को यह समझाना होगा कि दुनिया में उनकी कीमत उनके हाथ में पकड़े फोन से नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व और कर्म से तय होती है। आखिरकार सवाल यह नहीं है कि आपके हाथ में कौन-सा फोन है, बल्कि यह है कि उस फोन को इस्तेमाल करने वाले इंसान के भीतर विवेक कितना मजबूत है। तकनीक हमारी जरूरत पूरी करे, हमारी जिंदगी की कीमत तय न करे—यही इस दौर की सबसे बड़ी सामाजिक जरूरत है।

(लेखक आज अखबार में नेशनल ब्यूरो हैं)





