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लेखक-अरविंद जयतिलक

अमेरिका के साथ टैरिफ और ट्रेड डील के बीच बेहद असहज माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा ने दोनों देशों के सभ्यतागत संबंधों को मिठास से भर दिया है। रंग बिखेरती दोस्ती से लबरेज भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापानी प्रधानमंत्री इशिबा के नेतृत्व में दोनों देशों ने कई अहम समझौते पर दस्तखत किए हैं। क्लीन हाइड्रोजन और अमोनिया पर अनुसंधान करने की हामी के साथ वेस्ट वाटर मैनेजमेंट, पर्यावरण, प्रदूषण नियंत्रण, जलवायु परिवर्तन समेत कई मसलों पर दोनों देशों ने प्रतिबद्धता जताई है। दोनों देशों के बीच चंद्रयान-5 मिशन को लेकर भी एक रोडमैप तैयार हुआ है जिसके तहत दोनों देशों की अंतरिक्ष एजेंसियां मसलन भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो और जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जाक्सा मिलकर दक्षिणी ध्रुव का अध्ययन करेंगी। यह समझौता दोनों देशों के लिए अंतरिक्ष में प्रगति का एक बड़ा कदम होगा। अमेरिका द्वारा भारत पर 50 फीसद टैरिफ थोपने के बीच जापान द्वारा भारत को अगले दस सालों में 10 ट्रिलियन येन अर्थात 6 लाख करोड़ रुपए का भारी-भरकम निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित होगा। दोनों देशों के बीच अगले दशक में छोटे और मध्यम इंटरप्राइजेज के अलावा स्टार्टअप को जोड़ने पर भी सहमति बनी है। दोनों देशों के बीच तकरीबन 5 लाख लोगों का आदान-प्रदान होगा जो एकदूसरे की प्रगति का हिस्सेदार बनेंगे। इसके तहत 50 हजार स्किल्ड और सेमी स्किल्ड लोग जापान जाएंगे और वहां की आर्थिक व सांस्कृतिक प्रगति का संवाहक बनेंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने जापान-इकोनॉमिक फोरम के मंच से विश्व को संदेश दिया कि भारत निवेश के लिए सबसे सुरक्षित जगह है जहां पूंजी बढ़ती ही नहीं बल्कि कई गुना अधिक हो जाती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि 80 फीसद कंपनियां भारत में विस्तार करना चाहती है और 75 फीसद पहले से ही मुनाफे में हैं। प्रधानमंत्री का कथन स्पष्ट है कि जो भारत में निवेश करेगा वह फायदे में रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी की जापान यात्रा से दोनों देशों की आर्थिक प्रगति का एक और नया द्वारा खुलेगा जिससे दोनों देश लाभान्वित होंगे। दृष्टि दौड़ाएं तो पिछले दो वर्षों में जापानी कंपनियों ने भारत के साथ लगभग दो सैकड़ा एमओयू पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत सुजुकी मोटर गुजरात में अपना विस्तार करने के लिए तकरीबन चालीन हजार करोड़ रुपए निवेश कर रही है। इसी तरह निप्पॅन स्टील भी गुजरात और आंध्रप्रदेश में सात हजार करोड़ रुपए निवेश कर रही है। टोयोटा किर्लोस्कर कर्नाटक और महाराष्ट्र में लगभग 23 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। कई रियल एस्टेट और स्टील कंपनियां भारतीय शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों करोड़ रुपए निवेश करने जा रही हैं। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था का गतिमान होना तय है। बड़े पैमाने पर गांवों का कायाकल्प होगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। गौर करें तो भारत और जापान के बीच द्विपक्षीय आर्थिक कारोबार में लगातार वृद्धि हो रही है। वित्त वर्ष 2024 के दौरान भारत के साथ जापान का द्विपक्षीय व्यापार कुल 22.85 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। जापान से भारत को निर्यात 17.69 बिलियन अमेरिकी डॉलर और आयात 5.15 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हुआ। अर्थात् भारत को जापान का निर्यात भारत के कुल आयात का 2.62 फीसद और जापान को भारत का निर्यात भारत के कुल निर्यात का 1.18 फीसद था। गौर करें तो जापान भारत का सिर्फ आर्थिक कारोबार तक सीमित साझीदार वाला मित्र नहीं है। बल्कि वह भारत का रणनीतिक-सामरिक साझीदार मित्र भी है। याद होगा गत वर्ष पहले डोकलाम विवाद पर जापान ने खुले तौर पर भारत का पक्ष लेते हुए कहा था कि चीन डोकलाम की वास्तविक स्थिति को एकतरफा बदलने की कोशिश कर रहा है, जो कि गलत है। ध्यान दें तो कुछ वर्षों के दरम्यान भारत एवं जापान के बीच रक्षा-सुरक्षा रणनीतिक समझौता बेहद मजबूत हुआ है। जापान भारत के साथ एटमी करार को आकार दे चुका है। भारत ऐसा पहला देश है जिसने एनपीटी (परमाणु हथियार अप्रसार संधि) पर हस्ताक्षर नहीं किया है, इसके बावजूद भी जापान ने उसके साथ समझौता किया है। भारत द्वारा कालेधन के विरुद्ध छेड़े गए वैश्विक अभियान में सहयोग करते हुए जापान द्वारा दोहरा कराधान बचाव संधि (डीटीएए) में संशोधन का भी समर्थन किया जा चुका है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच साझा विजन डॉक्यूमेंट 2025 के अंतर्गत कई अहम समझौते हुए हैं। जापान द्वारा भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट के लिए सवा तीन अरब के स्पेशल फंड बनाने का वादा किया जा चुका है। जापान का भारत की रेल परियोजनाओं में भी जबरदस्त दिलचस्पी है। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि दोनों देशों की दोस्ती अर्थव्यवस्था, निवेश व विकास को गति देने तक ही सीमित नहीं है बल्कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में यह दोस्ती कुटनीतिक व भू-रणनीतिक संदर्भों को भी समेटे हुए है। कुटनीतिक पहलू पर नजर डालें तो भारत और जापान के साथ आने से भारत की पूर्वोंन्मुख नीति को नई धार मिली है। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद से ही भारत की पूर्वोन्मुख नीति उसकी विदेशनीति की महत्वपूर्ण आधार रही है। कहा भी जाता है कि भारत का श्रम और बुद्धि बल तथा जापान की पूंजी और तकनीकी मिलकर दक्षिण एशिया में शांति और समृद्धि का वातावरण निर्मित कर सकती है। भारत और जापान के संबंधों की पड़ताल करें तो दोनों देशों का सभ्यतागत संबंध 1400 साल पुराना है। जापानी ओडीए भारत के त्वरित आर्थिक विकास प्रयत्नों विशेषकर उर्जा, पारगमन, पर्यावरण और मानवीय जरुरतों के जुड़ी परियोजनाओं को सहायता प्रदान करता है। भारत की सभी मेट्रो रेल परियोजनाएं भी जापानी आधिकारिक विकास सहायता की ही घटक हैं। जापान भारत के दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा में भी भागीदार है। यह गलियारा 90 अरब डॉलर की एक वृहत आधारिक संरचना परियोजना है जो जापान के वित्तीय और तकनीकी सहयोग से फलीभूत हो रहा है। दिसंबर 2006 में इस परियोजना के एमओयू पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किया। 2011 में इस परियोजना के क्रियान्वयन हेतु मंत्रिमंडल ने दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा विकास निगम ने 18500 करोड़ रुपए की मंजूरी प्रदान की। इस पर काम तेजी से हो रहा है। दोनों देश दोस्ती की नई इबारत लिख रहे हैं। वार्षिक सम्मेलनों के जरिए दोनों देश हर बार प्रगति के नए बीज रोप रहे हैं जिससे निकलने वाली कपोंले दोनों देशों के रिश्ते को एक नया क्षितिज प्रदान किया है।

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(लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं)

By Mukesh Seth

Chief Editor

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