लेखक -संजय राय
चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए गढ़ा गया ‘ब्रिक’ शब्द आज एक व्यापक वैश्विक समूह की पहचान बन चुका है। ब्राजील, रूस, भारत और चीन से शुरू हुई यह यात्रा अब एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका तक अपनी पहुंच बना चुकी है। वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के साथ ‘ब्रिक’ से ‘ब्रिक्स’ बने इस समूह का विस्तार हाल के वर्षों में और हुआ है। आज इसमें 11 देश शामिल हैं और सामूहिक रूप से ये विश्व की करीब आधी आबादी, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 40 प्रतिशत और विश्व व्यापार के करीब 26 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में ब्रिक्स अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं के आर्थिक सहयोग का मंच नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण बहुपक्षीय समूह बन चुका है।
भारत के लिए इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता ऐसे समय में आई है, जब विश्व व्यवस्था तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रही है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता, आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा की चुनौतियां, भू-राजनीतिक तनाव और विकासशील देशों की वित्तीय जरूरतों ने बहुपक्षीय सहयोग की आवश्यकता को और बढ़ा दिया है। 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इसलिए केवल एक नियमित कूटनीतिक आयोजन नहीं है। यह भारत के लिए अपनी आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने तथा ग्लोबल साउथ की आवाज को अधिक प्रभावी ढंग से रखने का अवसर भी है।
भारत की अध्यक्षता का मार्गदर्शक विषय ‘सुदृढ़शीलता, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण’ है। इसमें विकास, स्थिरता और तकनीकी नवाचार को केंद्र में रखा गया है। इस दृष्टि से भारत ब्रिक्स को टकराव के बजाय सहयोग, बयानबाजी के बजाय समाधान और राजनीतिक मतभेदों के बजाय साझा आर्थिक हितों पर केंद्रित मंच बनाने की कोशिश कर रहा है। यही दृष्टिकोण ब्रिक्स की प्रासंगिकता को आगे बढ़ा सकता है।
ब्रिक्स की मूल अवधारणा आर्थिक शक्ति के बदलते वैश्विक भूगोल को पहचानने से निकली थी। वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के शोध-पत्र में ‘ब्रिक’ शब्द का इस्तेमाल ब्राजील, रूस, भारत और चीन की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के संदर्भ में किया गया था। लेकिन इन देशों के बीच सहयोग धीरे-धीरे आर्थिक संभावनाओं के विश्लेषण से निकलकर राजनीतिक और कूटनीतिक संवाद में बदल गया। दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इस प्रक्रिया को नया आयाम मिला और हाल के विस्तार ने इसकी भौगोलिक तथा आर्थिक पहुंच और बढ़ा दी।
इस विस्तार का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ब्रिक्स में अब विभिन्न क्षेत्रों और आर्थिक संरचनाओं वाले देश एक साथ हैं। तेल और ऊर्जा संसाधनों से संपन्न देश, तेजी से विकसित होती एशियाई अर्थव्यवस्थाएं, अफ्रीकी देश और बड़े उपभोक्ता बाजार इस समूह को विविध स्वरूप प्रदान करते हैं। यही विविधता इसकी ताकत भी है और चुनौती भी। अलग-अलग देशों के राजनीतिक हितों और आर्थिक प्राथमिकताओं के बावजूद यदि साझा मुद्दों पर सहमति बनाई जा सके तो ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण के लिए प्रभावी मंच बन सकता है।
भारत की प्राथमिकताओं में आर्थिक और व्यापारिक संतुलन का प्रश्न विशेष महत्व रखता है। पिछले कुछ वर्षों में ब्रिक्स देशों के साथ भारत का व्यापार तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष 2021 में जहां यह व्यापार करीब 203 अरब डॉलर था, वहीं वित्त वर्ष 2026 में बढ़कर लगभग 417 अरब डॉलर हो गया। पहली नजर में यह वृद्धि उत्साहजनक है, लेकिन इसके भीतर छिपा असंतुलन चिंता का विषय है। 417 अरब डॉलर के कुल व्यापार में भारत का निर्यात केवल करीब 95 अरब डॉलर है, जबकि आयात लगभग 321 अरब डॉलर का है। यानी व्यापार बढ़ रहा है, लेकिन उसका लाभ दोनों दिशाओं में समान रूप से वितरित नहीं है।
यह स्थिति भारत की उस बड़ी चुनौती को सामने लाती है, जिसमें उसे अपने बढ़ते घरेलू बाजार को वैश्विक व्यापार में अधिक प्रभावी निर्यात आधार में बदलना है। ब्रिक्स जैसे मंच पर भारत के लिए यह मांग रखना स्वाभाविक है कि सदस्य देश भारतीय उत्पादों के लिए अपने बाजार अधिक खुले और लचीले बनाएं। यदि ब्रिक्स आर्थिक सहयोग का वास्तविक मंच है तो व्यापार में पारस्परिकता भी उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए।
चीन इस संदर्भ में सबसे बड़ी चुनौती है। भारत का चीन के साथ व्यापार लंबे समय से भारी घाटे में है। भारत चीन से सालाना करीब 130 अरब डॉलर का आयात करता है। दूसरी ओर रूस से भी भारत का आयात करीब 55 अरब डॉलर का है। रूस के साथ भारत का ऊर्जा व्यापार बढ़ने से द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि हुई है, लेकिन निर्यात और आयात के बीच संतुलन अब भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसलिए ब्रिक्स के मंच पर व्यापार घाटे को कम करने का प्रयास केवल आंकड़ों को सुधारने की कवायद नहीं होना चाहिए, बल्कि भारतीय उद्योगों के लिए वास्तविक बाजार अवसर पैदा करने की दिशा में होना चाहिए।
भारत के लिए चीन के बाजार में निर्यात बढ़ाने की पर्याप्त संभावना है। भारतीय औषधि, कृषि उत्पाद, खाद्य प्रसंस्करण, इंजीनियरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन और सेवा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मौजूद है। आवश्यकता इस बात की है कि बाजार पहुंच में आने वाली बाधाओं को व्यवस्थित रूप से उठाया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रस्तावित द्विपक्षीय वार्ता इस दृष्टि से महत्वपूर्ण होगी। गलवान की घटना के बाद दोनों नेताओं के बीच पहली औपचारिक द्विपक्षीय बातचीत होने के कारण इस मुलाकात का रणनीतिक महत्व भी है। सीमा पर शांति और स्थिरता के साथ आर्थिक संबंधों को संतुलित करना भारत की दीर्घकालिक प्राथमिकता होनी चाहिए।
रूस के साथ संबंधों में भी भारत को ऊर्जा सुरक्षा के साथ व्यापार संतुलन पर ध्यान देना होगा। रूस भारत का महत्वपूर्ण ऊर्जा और रक्षा साझेदार है। कच्चे तेल की आपूर्ति ने हाल के वर्षों में दोनों देशों के व्यापार को नई ऊंचाई दी है। लेकिन दीर्घकाल में किसी भी बड़े आर्थिक संबंध को टिकाऊ बनाने के लिए यह जरूरी है कि भारत रूस को अधिक वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात करे। रक्षा क्षेत्र में संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग भी इसी दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।
ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत को केवल द्विपक्षीय मुद्दों तक सीमित नहीं रखती। ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करना इसका बड़ा अवसर है। ऊर्जा सुरक्षा, विकास वित्त, वित्तीय सहयोग, तकनीकी हस्तांतरण, आपदा प्रबंधन और महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं की मजबूती जैसे मुद्दे विकासशील देशों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। भारत यदि इन मुद्दों पर साझा एजेंडा तैयार करने में सफल होता है तो ब्रिक्स की उपयोगिता और बढ़ेगी।
आर्थिक अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी से मुकाबला भी आज अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। आर्थिक भगोड़ों को ट्रैक करने, वित्तीय अपराध से जुड़ी सूचनाओं को तेजी से साझा करने और संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के लिए व्यावहारिक व्यवस्था विकसित करने की भारत की पहल को व्यापक समर्थन मिल सकता है। वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बढ़ते डिजिटल लेनदेन के दौर में यह सहयोग और जरूरी हो गया है।
हालांकि ब्रिक्स के सामने अपनी चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सदस्य देशों की राजनीतिक व्यवस्थाएं, आर्थिक हित और विदेश नीति की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद इसका प्रमुख उदाहरण है। रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव तथा वैश्विक भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण भी समूह के भीतर सहमति को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ब्रिक्स को किसी दूसरे समूह के प्रतिरोध या विकल्प के रूप में देखने के बजाय बहुपक्षीय सहयोग के स्वतंत्र मंच के रूप में विकसित करना अधिक व्यावहारिक होगा।
भारत पहले 2012, 2016 और 2021 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर चुका है। चौथी बार अध्यक्षता का अवसर उसकी निरंतर सक्रिय भूमिका को दर्शाता है। लेकिन इस बार चुनौती पहले से बड़ी है। ब्रिक्स अब छोटा आर्थिक समूह नहीं रहा। इसके बढ़ते आकार और प्रभाव के साथ अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं।
नयी दिल्ली सम्मेलन की सफलता इस बात से तय होगी कि घोषणाओं से आगे कितने ठोस परिणाम निकलते हैं। भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता व्यापार असंतुलन को कम करना, निर्यात के नए बाजार खोलना, ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा मजबूत करना तथा वैश्विक दक्षिण के लिए वित्त और विकास के अधिक न्यायपूर्ण अवसर सुनिश्चित करना होना चाहिए।
ब्रिक्स की वास्तविक शक्ति उसके आकार में नहीं, बल्कि सदस्य देशों को साझा हितों पर एक साथ लाने की क्षमता में है। भारत यदि अपनी अध्यक्षता में इस विविध समूह को व्यावहारिक आर्थिक सहयोग, संतुलित व्यापार और साझा विकास की दिशा में आगे बढ़ा सका, तो नई दिल्ली सम्मेलन केवल एक शिखर बैठक नहीं रहेगा। यह बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका और एक अधिक समावेशी वैश्विक व्यवस्था के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

(लेखक आज अखबार में नेशनल ब्यूरो हैं)





