(मुकेश सेठ)
(मुम्बई)
बीएचयू के कुलपति ने वरिष्ठ पत्रकार व लेखक विजय विनीत की पुस्तक‘काशी के कुशवाहा कांत’ का नागरी प्रचारिणी सभा के 133वें वार्षिकोत्सव में किया विमोचन
कुछ पुस्तकें केवल प्रकाशित नहीं होतीं, वे समय की धूल में दबे इतिहास के पन्नों को फिर से खोलती हैं। कुछ लोकार्पण केवल औपचारिक आयोजन नहीं होते, बल्कि वे सांस्कृतिक स्मृतियों के पुनर्जागरण का अवसर बन जाते हैं। नागरी प्रचारिणी सभा के 133वें वार्षिकोत्सव में ऐसा ही एक क्षण उपस्थित हुआ, जब वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक विजय विनीत की बहुप्रतीक्षित पुस्तक “काशी के कुशवाहा कांत” का लोकार्पण काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने किया। यह केवल एक नई पुस्तक के विमोचन का अवसर नहीं था, बल्कि हिंदी के उस जनप्रिय साहित्यकार को पुनः स्मरण करने का सांस्कृतिक संकल्प था, जिसकी रचनाओं ने कभी लाखों पाठकों के हृदय पर राज किया था।
नागरी प्रचारिणी सभा के आर्य भाषा पुस्तकालय सभागार में आयोजित समारोह का वातावरण साहित्यिक गरिमा, ऐतिहासिक चेतना और आत्मीय संवाद से भरा हुआ था। मंच पर विद्वानों की उपस्थिति और सभागार में बैठे साहित्यकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति प्रेमियों की उत्सुकता इस बात का संकेत दे रही थी कि यह आयोजन किसी सामान्य पुस्तक विमोचन से कहीं अधिक महत्व रखता है। समारोह में भारत कला भवन के निदेशक प्रो. श्री रूप रे चौधुरी की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ा दिया।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार तथा नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत ने एक ऐसे साहित्यकार को नई पीढ़ी के सामने पुनः स्थापित करने का कार्य किया है, जिसकी लोकप्रियता हिंदी साहित्य के इतिहास में अद्वितीय रही है। उन्होंने कहा कि 1940 और 1950 के दशक में कुशवाहा कांत केवल उपन्यासकार नहीं थे, बल्कि लाखों पाठकों की कल्पना, संवेदना और रोमांच के केंद्र थे। उनकी रचनाओं ने हिंदी के लोकप्रिय साहित्य को नई ऊंचाई दी और एक ऐसा पाठक वर्ग तैयार किया, जो हर नई कृति की प्रतीक्षा करता था।
व्योमेश शुक्ल ने कहा कि समय के साथ साहित्यिक विमर्श बदलता गया और अनेक जनप्रिय रचनाकार धीरे-धीरे इतिहास के हाशिए पर चले गए। ऐसे दौर में विजय विनीत की यह पुस्तक केवल एक लेखक की जीवनी नहीं, बल्कि हिंदी के जनप्रिय साहित्य की उस धारा का पुनर्पाठ है, जिसने हिंदी भाषा को घर-घर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने बताया कि पुस्तक के लेखन के दौरान नागरी प्रचारिणी सभा ने लेखक को दुर्लभ अभिलेख, पत्र, दस्तावेज और संदर्भ सामग्री उपलब्ध कराई। यह शोध केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लेखक ने उपलब्ध अभिलेखों, समकालीन स्रोतों और साहित्यिक संदर्भों के आधार पर कुशवाहा कांत के व्यक्तित्व और कृतित्व का एक प्रामाणिक चित्र निर्मित किया है।

व्योमेश शुक्ल ने कहा कि कुशवाहा कांत उन विरले साहित्यकारों में थे, जिनके उपन्यासों पर फिल्में बनीं और जिनकी लोकप्रियता का दायरा हिंदी भाषी क्षेत्रों से कहीं आगे तक फैला। उन्होंने कहा कि उस दौर में अनेक युवाओं ने केवल कुशवाहा कांत के उपन्यास पढ़ने के लिए हिंदी सीखना शुरू किया। यह किसी भी लेखक की लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण है कि उसकी रचनाएं भाषा सीखने की प्रेरणा बन जाएं।
उन्होंने कहा कि कुशवाहा कांत का जीवन जितना रचनात्मक था, उतना ही संघर्षपूर्ण भी। उनकी असामयिक हत्या ने हिंदी साहित्य से एक ऐसे लेखक को छीन लिया, जिसकी रचनात्मक यात्रा अभी और लंबी हो सकती थी। लेकिन साहित्य की यही विशेषता है कि वह लेखक के जाने के बाद भी जीवित रहता है। विजय विनीत की पुस्तक इसी अमर साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी के सामने विश्वसनीय और शोधपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है।
अपने संबोधन में व्योमेश शुक्ल ने विजय विनीत के लेखकीय व्यक्तित्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक जनसरोकारों की पत्रकारिता करने वाले विजय विनीत ने अपने लेखन में हमेशा समाज, इतिहास और संस्कृति को केंद्र में रखा है। पत्रकारिता की तथ्यपरक दृष्टि और साहित्य की संवेदनशील भाषा का जो संतुलन उनकी लेखनी में दिखाई देता है, वही इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता भी है।
उन्होंने यह भी बताया कि “काशी के कुशवाहा कांत” की भूमिका लिखना उनके लिए व्यक्तिगत रूप से सम्मान का विषय रहा। उनके अनुसार ऐसी पुस्तकें केवल किसी लेखक के जीवन का परिचय नहीं करातीं, बल्कि वे उस पूरे सांस्कृतिक परिवेश को समझने का अवसर देती हैं, जिसमें महान रचनाकार जन्म लेते हैं और अपनी साहित्यिक पहचान बनाते हैं।
व्योमेश शुक्ल ने नागरी प्रचारिणी सभा की गौरवशाली परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संस्था केवल पुस्तकों का संग्रहालय नहीं, बल्कि हिंदी की ऐतिहासिक स्मृति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां सुरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियां, अभिलेख और साहित्यिक धरोहरें आने वाली पीढ़ियों को यह बताती हैं कि हिंदी भाषा का विकास किन महापुरुषों के त्याग, परिश्रम और दूरदृष्टि का परिणाम है।
उन्होंने महामना मदन मोहन मालवीय, बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और राय कृष्णदास जैसी विभूतियों का स्मरण करते हुए कहा कि भारत का निर्माण केवल राजनीतिक नेतृत्व से नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और सहयोग की परंपरा से हुआ है। यदि इस विरासत को जीवित रखना है तो साहित्य और इतिहास के संरक्षण को सामाजिक आंदोलन का रूप देना होगा।
उन्होंने कहा कि “काशी के कुशवाहा कांत” इसी सांस्कृतिक दायित्व की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह पुस्तक केवल एक लेखक के जीवन की कहानी नहीं, बल्कि हिंदी के जनप्रिय साहित्य, काशी की सांस्कृतिक चेतना और उस दौर के सामाजिक परिवेश का ऐसा दस्तावेज है, जो आने वाले समय में शोधार्थियों, साहित्यकारों और पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगा।
कार्यक्रम में अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी राजनीतिक उपलब्धियों से नहीं बनती, बल्कि उसकी सांस्कृतिक स्मृतियां, ज्ञान की परंपरा और साहित्यिक धरोहरें उसे स्थायी पहचान प्रदान करती हैं। उन्होंने कहा कि नागरी प्रचारिणी सभा का इतिहास इसी ज्ञान-परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जिसने एक सदी से भी अधिक समय तक हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया है।
उन्होंने सभा की दान और ज्ञान की गौरवशाली परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत का निर्माण केवल पाने की आकांक्षा से नहीं, बल्कि देने की संस्कृति से हुआ है। यहां समाज ने ज्ञान दिया, संस्कार दिए, पुस्तकालय बनाए, पांडुलिपियां बचाईं और आने वाली पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक विरासत का विशाल भंडार तैयार किया। महामना मदन मोहन मालवीय, बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और राय कृष्णदास जैसी विभूतियों ने इसी परंपरा को अपने कर्म से जीवित रखा। उनके प्रयासों के कारण आज भी हिंदी साहित्य के अनेक दुर्लभ दस्तावेज सुरक्षित हैं।
व्योमेश शुक्ल ने कहा कि आज आवश्यकता केवल अतीत का गुणगान करने की नहीं, बल्कि उसकी रक्षा करने की है। यदि भारत को सांस्कृतिक रूप से और अधिक सशक्त बनाना है तो समाज को अपनी बौद्धिक धरोहरों, साहित्यकारों, पांडुलिपियों और ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण के प्रति गंभीर होना होगा। उन्होंने कहा कि “काशी के कुशवाहा कांत” जैसी कृतियां इसी सांस्कृतिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करती हैं। यह पुस्तक केवल एक साहित्यकार की जीवनी नहीं, बल्कि हिंदी के लोकप्रिय साहित्य, काशी की सांस्कृतिक चेतना और एक पूरे युग की रचनात्मक ऊर्जा का दस्तावेज है। ऐसी पुस्तकें भविष्य की पीढ़ियों को यह समझने का अवसर देती हैं कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति भी होता है।
इसके बाद कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक विजय विनीत की शोधपरक लेखन-यात्रा की मुक्तकंठ से सराहना की। उन्होंने कहा कि किसी जनप्रिय साहित्यकार के जीवन और रचनात्मक अवदान को प्रमाणिक स्रोतों के आधार पर पुस्तकाकार रूप देना अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। विजय विनीत ने यह कार्य केवल एक लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक शोधकर्ता और सांस्कृतिक इतिहास के सजग दस्तावेजकार के रूप में किया है।
कुलपति ने विश्वास व्यक्त किया कि जिस आत्मीयता और उत्सुकता के साथ कभी पाठक कुशवाहा कांत के उपन्यासों की प्रतीक्षा करते थे, उसी प्रकार यह पुस्तक भी नई पीढ़ी के बीच जिज्ञासा और रुचि का विषय बनेगी। उन्होंने कहा कि जब किसी लेखक का साहित्य समय की धूल में दबने लगता है, तब ऐसे शोधपूर्ण प्रयास उसे फिर से समाज की स्मृति में स्थापित करते हैं। “काशी के कुशवाहा कांत” इसी प्रकार की एक महत्वपूर्ण कृति है, जो साहित्य और इतिहास के बीच संवाद स्थापित करती है।
प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि उनके लिए नागरी प्रचारिणी सभा में उपस्थित होना व्यक्तिगत रूप से भी अत्यंत भावुक क्षण है। लंबे समय से उनकी इच्छा थी कि वे इस ऐतिहासिक संस्था को निकट से देखें। उन्होंने आयोजन के लिए नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल, लाल चतुर्वेदी, डॉ. निशांत तथा आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बाबू श्यामसुंदर दास और राय कृष्णदास जैसी विभूतियों ने केवल हिंदी भाषा का विकास नहीं किया, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना को भी नई दिशा दी। उनकी मूल पांडुलिपियां, दुर्लभ चित्र और ऐतिहासिक दस्तावेज आज भी नागरी प्रचारिणी सभा में सुरक्षित हैं। यह धरोहर केवल काशी की नहीं, बल्कि पूरे देश की साझा बौद्धिक संपदा है।
अपने संबोधन में कुलपति ने भारत कला भवन और नागरी प्रचारिणी सभा के ऐतिहासिक संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि लगभग सात दशक पहले राय कृष्णदास द्वारा संजोया गया संग्रह भारत कला भवन तक पहुंचा और वहां से उसे राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली। अब समय की मांग है कि दोनों संस्थाएं मिलकर इस विरासत को आम जन तक पहुंचाने के लिए साझा सांस्कृतिक अभियान चलाएं। उन्होंने कहा कि जहां मूल धरोहर सुरक्षित है, उसका महत्व सदैव सर्वोपरि रहेगा और उसे अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है।
कुलपति ने भारत कला भवन द्वारा आयोजित ‘पावस’ प्रदर्शनी की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन केवल औपचारिक कार्यक्रम बनकर न रह जाएं। काशी आने वाले पर्यटकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और साहित्यप्रेमियों को इन दुर्लभ धरोहरों तक सहज पहुंच मिलनी चाहिए। इसके लिए ऐसी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिससे वर्ष भर लोग इन संग्रहों का अवलोकन कर सकें और भारतीय संस्कृति की जड़ों को निकट से समझ सकें।
उन्होंने विशेष रूप से युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि नई पीढ़ी केवल आधुनिक तकनीक की उपभोक्ता न बने, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत की संवाहक भी बने। विद्यार्थियों को चाहिए कि वे इन संस्थाओं में सुरक्षित धरोहरों को देखें, समझें और सोशल मीडिया सहित आधुनिक संचार माध्यमों के जरिए उनके महत्व को व्यापक समाज तक पहुंचाएं। जब समाज अपनी विरासत से भावनात्मक रूप से जुड़ेगा, तभी उसके संरक्षण का अभियान भी व्यापक जनभागीदारी का स्वरूप ग्रहण करेगा।
अपने संबोधन के समापन में प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक यात्रा हजारों वर्षों की निरंतर साधना का परिणाम है। इसे सुरक्षित रखना केवल संस्थाओं का नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। भारत कला भवन और नागरी प्रचारिणी सभा यदि मिलकर इस दिशा में कार्य करें तो काशी एक बार फिर भारतीय सांस्कृतिक चेतना के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में नई ऊर्जा के साथ सामने आ सकती है।
समारोह में भारत कला भवन के निदेशक प्रो. श्री रूप रे चौधुरी, काशी विद्यापीठ के प्रो. संजय, यूपिका के चेयरमैन अमरेश कुशवाहा, सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लेनिन रघुवंशी, प्रख्यात उद्यानविद् शैलेंद्र रघुवंशी, रमेश चंद्र मौर्य सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, विद्यार्थी, बुद्धिजीवी और गण्यमान नागरिक उपस्थित रहे। इस अवसर पर भारत कला भवन द्वारा आयोजित ‘पावस’ प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया तथा भारत कला भवन और नागरी प्रचारिणी सभा के ऐतिहासिक संबंधों पर आधारित एक विशेष कैटलॉग की प्रथम प्रति कुलपति को भेंट की गई।




