★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★
{57 विधायकों के प्रचण्ड बहुमत वाली सरकार के मुखिया रावत की कार्यशैली ने उनकी छुड़ाई कुर्सी,चार साल में देना पड़ा इस्तीफ़ा}
[उत्तराखंड के गठन के बाद सिर्फ़ नारायण दत्त तिवारी ने ही 70 सदस्यीय विधायकों में से 36 के साथ को लेकर पूरा किया था कार्यकाल]
(चाहे काँग्रेस हो या फ़िर बीजेपी की सरकारें कोई भी सीएम अपना पूरा नही कर पाया कार्यकाल,अब देखना दिलचस्प होगा कि मोदी-शाह की जोड़ी किस चेहरे पर लगाती है दांव)
♂÷अन्ततः जैसी आशंका थी वहीं सच साबित हुई और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी कार्यकाल के पहले ही अपनी कुर्सी से इस्तीफ़ा देना पड़ा।

उत्तराखंड के गठन के बाद से इतिहास रहा है कि सिवाय नारायण दत्त तिवारी के द्वारा ही मुख्यमंत्री के रूप में 5 साल का कार्यकाल पूर्ण करने के बाद कोई भी सीएम अपना पूरा कार्यकाल पूरा नही कर पाया है।
70 सदस्यीय विधानसभा में प्रचण्ड बहुमत के साथ 57 विधायक होने के बाद भी त्रिवेंद्र सिंह रावत को पद छोड़ना पड़ा है।कहा जा रहा है कि बीजेपी हाईकमान उनकी कार्यशैली से खुश नही थी और इसलिए चार साल के बाद उनको इस्तीफ़ा देना पड़ा है।एक साल के अंदर उत्तराखंड में चुनाव होने हैं ऐसे में बीजेपी तेज तर्रार चेहरे के साथ चुनावी रण में जाना चाहती हैं।
पहाड़ का छोटा सा राज्य उत्तराखंड जैसी पहाड़ की भूमि अस्थिर रहती है, वैसी ही राजनीतिक अस्थिरता वहां की सरकार में बनी रहती है।महज बीस साल पहले उत्तराखंड का लंबी संघर्ष के बाद निर्माण हुआ था,तब से लेकर अब तक पांच सरकारें सूबे में रही हैं,लेकिन सिर्फ एक मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ही अपना कार्यकाल पूरा कर सके। वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत 70 में से 57 विधायकों की मजबूत सरकार के मुखिया बने थे, लेकिन वो भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।
उत्तराखंड में पहली सरकार अंतरिम थी,नवंबर 2000 में ततत्कालीन उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड को अलग किया गया था, तब उत्तराखंड के क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले विधायकों को लेकर सरकार बनी थी। बीजेपी का उस समय बहुमत था और नित्यानंद स्वामी पहले मुख्यमंत्री बने।शुरुआत में ही अस्थिरता शुरू हो गई और एक साल से भी कम समय में उन्हें कुर्सी से हटना पड़ा और भगत सिंह कोश्यारी दूसरे मुख्यमंत्री बने। हालांकि तीन चार महीने बाद ही हुए चुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा और जीतने के बाद कांग्रेस ने मामूली बहुमत से सरकार बनाई।70 में से महज 36 विधायकों के साथ नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने और कमजोर सरकार के बावजूद उन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

अगले चुनाव में बीजेपी ने राज्य में 35 सीट जीतकर निर्दलियों की मदद से सरकार बनाई और बीसी खंडूरी मुख्यमंत्री बने, लेकिन दो ही साल बाद उन्हें हटाकर रमेश पोखरियाल निशंक को कमान सौंपी गई। लेकिन वो भी करीब दो ही साल कुर्सी पर रह सके और चुनाव से ठीक पहले भुवन चन्द्र खंडूरी को एक बार फिर मुख्यमंत्री बना दिया गया। फिर चुनाव हुआ और कोई भी पार्टी बहुमत का आंकड़ा छू ना सकी, कांग्रेस ने छोटे दलों की मदद से सरकार बनाई और विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने। सरकार भले ही बदल गई, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता का दौर जारी रहा। ऐसे में हरीश रावत को मौका दिया गया, लेकिन केंद्र में बीजेपी के मजबूत होने के साथ साथ उनकी सरकार के करीब दस विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया।
2017 का विधानसभा चुनाव आते आते कांग्रेस बेहद कमजोर हो चुकी थी,इसका परिणाम चुनाव नतीजों में भी देखने को मिला। बीजेपी ने अब तक की सबसे बड़ी जीत राज्य में हासिल की, जब उसके 57 विधायक जीत कर सदन में पहुंचे।लगा कि इस बार बहुत मजबूत सरकार आई है, तो मजबूती से चलेगी भी। लेकिन पुरानी कहावत है कि चरित्र बदलना आसान नहीं होता। राजनीतिक अस्थिरता का चरित्र बना रहा और चार साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत को अपना पद छोड़ना पड़ा।
अब देखना दिलचस्प होगा कि मोदी-शाह की जोड़ी अपने चौकानें वाली राजनीति के जरिये किस चेहरे को देवभूमि के आगामी मुख्यमंत्री के रूप में उत्तराखंड की जिम्मेदारी देने वाली है।






















