IMG 20191117 WA0004

★मुकेश सेठ★
★मुम्बई★
{शिवसेना संस्थापक बाला साहब ठाकरे से नही निभाई जयदेव ने आदर्श पुत्र के रिश्ते,अंतिम दम तक भी याद करते रहे जयदेव को”सरकार”}
[स्मिता को तलाक़ देकर जयदेव के दूसरी शादी करने व उद्धव से सम्पत्ति को लेकर हुए विवाद ने पिता पुत्र में बढ़ा डाली थी अमिट दूरियां]
(बीमारी की हालत में लीलावती में भर्ती पिता को देखने नही गए जयदेव,जिसपर ठाकरे ने कहा था कि जयदेव मुझे देखने नही आया इससे मैं बीमार भी हूँ व नाराज़ भी)

IMG 20191117 WA0004

[अपने तेवर से सरकार तक को भी अर्दब में रखने वाले मुम्बई के”गॉडफ़ादर”ने 87 साल की उम्र में 17 नवम्बर 2012 को कह गए दुनियां को अलविदा]
♂÷कहते हैं कि भाग्य में लिखे को कोई भी नही बदल सकता चाहे वह”मातोश्री” में बैठने वाले “बाला साहेब ठाकरे”ही क्यों न रहे हो जिनके एक इशारे पर मुम्बई उठक बैठक करने लगती थी सरकार हिल जाती थी।
मुम्बई के “गॉडफ़ादर”माने जाते रहे बाला साहब ठाकरे ने जो चाहा जो सोचा किया व करवाया किन्तु एक पिता के रूप में अपने बेटे को कभी भी अपना नही बनाने में कामयाब नही हो सके, पुत्र जयदेव के समक्ष वह बेबस होकर रह गए अंतिम दम तक।मालूम हो कि बाला साहब ठाकरे अपने बड़े बेटे जयदेव ठाकरे से आजीवन नाराज़ रहे क्योकि जहाँ एक तरफ़ जयदेव ने अपनी पत्नी स्मिता ठाकरे को तलाक़ देकर दूसरी शादी कर मातोश्री छोड़कर चले गए तो पिता की सम्पत्ति को लेकर उनका छोटे भाई उद्धव ठाकरे से संपत्ति विवाद था।

IMG 20191117 WA0003

कहना समयोचित होगा कि सत्तर-अस्सी के दशक में बॉलीवुड की तमाम ऐसी फिल्में बनी जिसमें कोई एक ऐसा कैरेक्टर होता था जिसकी तूती पूरे शहर में बोलती थी, उसकी जबान से निकला शब्द ही नियम,क़ानून माना जाता था।हुक्मउदूली करने की हिमाकत किसी में भी नहीं होती थी चाहे वह कितना भी बड़ा नेता,अभिनेता या धन्नासेठ रहा हो। जिसने भी खिलाफत की सोची समझो उसने “गॉडफ़ादर”को नाराज़ करके दुश्मनी कर ली। ऐसी कहानियां सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि वास्तव में भी ये सब हुआ था मुम्बई महाराष्ट्र में। वो किसी और ने नहीं बल्कि मुबंई के बाला साहेब ठाकरे ने कर दिखाया था जिनको मुम्बई का अघोषित “सरकार”माना जाता रहा।
आज शिवसेना संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की पुण्यतिथि है। बाला साहब के तमाम ऐसे किस्सों को आप लगातार सुनते आए हैं कि कैसे पूरी मुबंई उनके एक इशारे पर बंद हो जाया करती थी दिन रात चलने वाला शहर उनके इशारे पर ठहर जाया करते थे सरकारें तक उनकी हुंकार पर हिलने लगती थी। जिसे वह तलब कर दें वह अगले ही पल उनके सामने सिर झुकाए खड़ा हो जाता था।उनकी हुकूमत से कोई बच नहीं पाया, पर उनके ही बेटे जयदेव ठाकरे ने अपने ही पिता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया,छोटे भाई उद्धव ठाकरे से पैतृक संपत्ति विवाद को लेकर वह अपने पिता बाला साहेब तक से भिड़ गए थे, इसका खुलासा शिवसेना के ही नेता अनिल परब ने कोर्ट में किया था।
अनिल परब बताते हैं कि बाला साहेब को अपने ही पुत्र जयदेव कभी पसंद नहीं आए। इसके पीछे न सिर्फ संपत्ति विवाद था बल्कि जयदेव द्वारा पिता की इच्छा के विपरीत जाकर दूसरी शादी करना भी एक प्रमुख कारण रहा। साल 1995 तक तो जयदेव परिवार के साथ ही रहते थे पर इसी साल उन्होंने पत्नी स्मिता को तलाक देकर दूसरी शादी करके घर छोड़कर कहीं और चले गए। जिसको लेकर पिता बाला साहब को काफी सदमा पहुंचा और उन्होंने जयदेव से बात तक करना बंद कर दिए।
बाल ठाकरे को सबसे बड़ा झटका उस वक्त लगा जब उनकी धर्मपत्नी मीना ठाकरे और बड़े बेटे बिंदु माधव ठाकरे का निधन 1996 में हो गया।ठाकरे परिवार पर आए इस बड़ी विपदा व दुःख की घड़ी में शामिल होने जब जयदेव मातोश्री में आए,तब एक पिता के रूप में बाला साहब को लगा कि वह पुरानी बातों को भूलकर फिर से साथ रहने लगेंगा पर ऐसा नहीं हुआ, कुछ दिन बाद ही जयदेव फिर घर से चले गए। लगातार घर से व पिता से दूर रहने के कारण वह पिता के गुस्से की जद में आते गए। मीडिया जब भी जयदेव से कुछ जानना चाही उन्होंने कुछ भी बोलने से इंकार दिया।
2012 में बाला साहेब बहुत बीमार हो गए। बीमारी इस कदर बढ़ती गयी कि वह महिनों लीलावती अस्पताल के बेड पर ही पड़े रहे इस दौरान देश दुनिया की तमाम बड़ी शख्सियतों ने बाला साहब का हाल जानने अस्पताल पहुंचे पर जयदेव एक बार भी अपने बीमार पिता को देखने नहीं पहुंचे, जिसका दुःख उनको आखिरी वक्त तक रहा। बाला साहेब ने खुद कहा कि जयदेव मुझे कभी देखने नहीं आया इसलिए मैं उससे नाराज़ हूं और बीमार भी हूँ। मुम्बई का “गॉडफ़ादर”एक पिता के रूप में बेबस रहा बेटे से, उनकी ये नाराजगी कभी बदलती इससे पहले ही वह 17 नवंबर 2012 को 87 साल की आयु में दुनिया को अलविदा कहकर चले गए।
इसके बाद उद्धव और जयदेव में संपत्ति को लेकर विवाद हो गया जो हाईकोर्ट तक पहुंच गया। उद्धव ने जनवरी 2014 में प्रोबेट पिटीशन दाखिल की, इस तरह की याचिका आमतौर पर दिवंगत व्यक्ति की वसीयत को कोर्ट से सत्यापित कराने के लिए दाखिल की जाती है। उद्धव के मुताबिक बाला साहेब जो संपत्ति छोड़कर गए उसकी कीमत 14.85 करोड़ है वहीं जयदेव कहते हैं कि सिर्फ मातोश्री बंगला ही 40 करोड़ रुपए का है। कुल संपत्ति जोड़ दी जाए तो वह 100 करोड़ को पार कर जाएगी।
अपने ही छोटे भाई उद्धव पर आरोप लगाते हुए जयदेव ठाकरे कहते हैं कि आखिरी वक्त में पिता की दिमागी हालत ठीक नहीं थे, वह वसीयत को कागजों पर दस्तखत करने की स्थिति मे नहीं थे पर परिवार के ही बाकी लोगों ने वसीयत के कागज अंग्रेजी में बनवाकर उसपर बाला साहेब से मराठी में दस्तखत करवा लिया। वह यह भी सवाल उठाते हैं कि पिता ने अपना जीवन मराठी लोगों और भाषा को समर्पित किया तो फिर उनकी वसीयत अंग्रेजी में क्यों बनाई गई। बहरहाल यह मामला अभी भी हाईकोर्ट में लंबित है। इतने सालों में काफी कुछ बदल गया, उद्धव मातोश्री में बैठकर आज बाला साहब ठाकरे की बनाई शिवसेना को सम्भाल रहे हैं, वहीं जयदेव राजनीति से एक फासला बनाकर करके चल रहे हैं।

By Mukesh Seth

Chief Editor

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *