लेखक~अरविंद जयतिलक
♂÷कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का विवादों से गहरा नाता है। एक बार फिर उन्होंने विवाद खड़ा कर काँग्रेस की परेशानी बढ़ा दी है। उन्होंने ‘क्लब हाउस’ संवाद के दौरान कहा है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना और राज्य का दर्जा खत्म करना बहुत दुखद है। अगर उनकी पार्टी (काँग्रेस) सत्ता में आती है तो इस पर पुनर्विचार करेगी। भाजपा ने दिग्विजय सिंह के बयान को हथियार बना कांग्रेस को लहूलुहान करना शुरु कर दिया है। कांग्रेस बैकफुट पर है और सफाई दे रही है कि दिग्विजय सिंह का बयान उनका निजी विचार है। कांग्रेस का कहना है कि अगस्त, 2019 में कांग्रेस कार्यसमिति ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर जो प्रस्ताव पारित किया था वहीं उसका असली रुख है। फिलहाल कहना मुश्किल है कि दिग्विजय के बयान और कांगे्रस की सफाई से किसे फायदा होगा और किसे नुकसान। लेकिन दिग्विजय के बयान ने भाजपा को यह साबित करने का मौका जरुर दे दिया है कि कांगे्रस और पाकिस्तान दोनों का रुख एक ही है। बहरहाल यहां समझने वाली बात यह है कि आखिर कोविड के मसले पर जब केंद्र सरकार बुरी तरह घिरी हुई है तो उसकी फजीहत बढ़ाने के बजाए दिग्विजय सिंह ने अनुच्छेद 370 का हटाने का विरोध कर भाजपा को आक्रामक होने का मौका क्यों दिया? क्या यह दिग्विजय सिंह की राजनीतिक नासमझी है? दिग्विजय सिंह इतने कच्चे खिलाड़ी भी नहीं हैं। सच तो यह है कि उनका बयान अल्पसंख्यकों को कांग्रेस के पाले में लाने की सोची समझी रणनीति है। ध्यान देना होगा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की करारी हार और तृणमूल कांगे्रस की धमाकेदार जीत ने ममता बनर्जी के कद को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। पश्चिम बंगाल में अपने पक्ष में मुसलमानों की गोलबंदी से ममता बनर्जी उत्साहित हैं वहीं कांग्रेस चिंतित है। ममता ने राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को पटकनी देने का मन बना लिया है। देश के कई क्षेत्रीय क्षत्रप ममता से कंधा जोड़ने का एलान कर अभी से चक्रव्यूह की परिकल्पना शुरु कर दी है। उन्हें इस रणनीति में कितनी सफलता मिलेगी यह कहना तो मुश्किल है लेकिन ममता बनर्जी की बढ़ती सक्रियता और उन्हें मिल रहा क्षत्रपों का समर्थन ने कांग्रेस की पेशानी पर जरुर बल ला दिया है। कांग्रेस को डर है कि अगर ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ गोलबंदी तेज करती हैं तो मुसलमान उनके पक्ष में लामबंद हो सकते हैं। देखा भी गया कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों ने कांग्रेस, सीपीएम, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और कट्टरपंथी मुस्लिम नेता अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट को नकारकर ममता बनर्जी के पक्ष में खड़े हुए। आज की तारीख में उत्तर प्रदेश के प्रमुख नेता अखिलेश यादव, जयंत चैधरी, ओमप्रकाश राजभर बिहार के तेजस्वी यादव समेत अन्य क्षेत्रीय नेता मसलन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुला एवं महबूबा मुफ्ती खुलकर ममता के साथ खड़े हैं। समय अनुकूल हुआ तो सीपीएम समेत शरद पवार और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को भी ममता के शिविर में जाते देर नहीं लगेगी। इस स्थिति में देश के मुसलमान भी इस शिविर की ओर रुख कर सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर कांग्रेस का भयंकर नुकसान होना तय है। दिग्विजय सिंह मंझे हुए खिलाड़ी हैं। वे 2024 में होने वाले आमचुनाव के समीकरणों को अभी से भांपना शुरु कर दिए हैं। उन्हें इस बात की आशंका है कि अगर मुसलमान ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले संभावित शिविर में शामिल हुए तो फिर कांग्रेस का बेड़ा गर्क होना तय है। ऐेसे में अगर दिग्विजय सिंह अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध और सत्ता में आने पर पुनर्विचार का आश्वासन देते हैं तो यह यों ही नहीं है। दअसल वे संदेश देना चाहते हैं कि मुसलमानों के असली हितैषी कांग्रेस पार्टी ही है। दिग्विजय सिंह यह भी जानते हैं कि कांग्रेस की नीति और मौजूदा नेतृत्व पर न तो देश का भरोसा रह गया है और न ही मुसलमानों का। दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी में अंदरुनी कलह चरम पर है। देखा जा चुका है कि असंतुष्ट नेताओं ने किस तरह सोनिया गांधी को पत्र लिखकर सक्रिय नेतृत्व और व्यापक संगठनात्मक बदलाव की मांग की। तब इस संकट से निजात पाने के लिए कांग्रेस कार्यसमिति की सात घंटे हंगामेदार बैठक हुई फिर भी नितीजा नहीं निकला। अंततः इस बात पर सहमति बनी कि नए अध्यक्ष के चुनाव तक सोनिया गांधी ही पद पर बनी रहेंगी। कांग्रेस का तत्कालीन संकट तो टल गया लेकिन बगावत की चिंगारी अभी बुझी नहीं है। याद होगा तब असंतुष्ट नेताओं ने दो टूक कहा था कि वे किसी के खिलाफ नहीं हैं। वे कांग्रेस को मजबूत बनाने के लिए काम कर रहे हैं। यानी समझे ंतो इन असंतुष्टों का कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व से भरोसा उठ गया है। वे एक नए दमदार नेतृत्व में काम करना चाहते हैं जिससे जीत सुनिश्चित हो। गौर करें तो इन असंतुष्ट नेताओं में शामिल गुलाम नबी आाजाद, कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा, राजबब्बर, मिलिंद देवड़ा, पीजे कुरियन, रेणुका चैधरी, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मनीष तिवारी और विवेक तन्खा जैसे कई महत्वपूर्ण चेहरे हैं जिनकी बदौलत कांग्रेस की हैसियत है। वे राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की लगातार पराजय से परेशान हैं। 2014 के आमचुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद पार्टी में जान फूंकने के लिए 2015 में राहुल गांधी को आगे किया गया। लेकिन देखा गया कि राहुल गांधी जितना अधिक सक्रिय हुए पार्टी को उतना ही अधिक नुकसान पहुंचा। 2019 के आमचुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देते हुए कहा था कि पार्टी का अगला अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का होगा। लोगों को लगा कि शायद राहुल गांधी सच बोल रहे हैं और पार्टी को नई दिशा देना चाहते हैं। लेकिन वैसा नहीं हुआ। ढ़ाई महीने तक खूब माथापच्ची होती रही कि कांग्रेस की कमान किसे सौंपा जाए। कभी मुकुल वासनिक का नाम आगे बढ़ाया गया तो कभी मल्लिकार्जुन खड़गे का, तो कभी सुशील कुमार शिंदे का। मजेदार बात यह रहा कि कांग्रेस अध्यक्ष के चयन के लिए बकायदा लोकतांत्रिक रास्ता अख्तियार करते हुए पांच समूहों का गठन भी किया गया। इनमें से दो अलग-अलग समूहों में राहुल गांधी और सोनिया गांधी का नाम भी शामिल था। हालांकि अंतिम समय में दोनों ने रायशुमारी की प्रक्रिया से खुद को अलग कर लिया। तर्क दिया गया कि नए अध्यक्ष के चयन में सोनिया और राहुल किसी भी हस्तक्षेप से बचना चाहते हैं। इस कवायद से लगा कि शायद कांग्रेस कार्यसमिति नए अध्यक्ष के चयन में पूरी तरह से ईमानदारी बरत रही है। लेकिन अंततः यह कवायद ढांक के तीन पात ही साबित हुआ। पूरे भारत से कांग्रेस के बीच से एक भी ऐसा कार्यकर्ता या नेता नहीं मिला जो कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान संभाल सके। लिहाजा कांग्रेस कार्यसमिति सोनिया गांधी के हाथ अध्यक्ष का कमान सौंप परिवार का मुकुट परिवार के सिर रख पार्टी को परिवार भक्ति के लिए मजबूर कर दिया। बेहतर होता कि गांधी-नेहरु परिवार राहुल गांधी द्वारा इस्तीफा दिए जाने के बाद तत्क्षण किसी मजबूत कांग्रेस के कार्यकर्ता को अध्यक्ष की कमान सौंप देता। इस्तीफा देने से पद भले चला जाता हो लेकिन कद जरुर बढ़ जाता है। लेकिन इतनी सी छोटी सी बात भी गांधी परिवार के समझ में नहीं आयी। लेकिन एक सच यह भी है कि कांग्रेस के बहुतेरे नेता जिनमें दिग्विजय सिंह शामिल हैं, वे हर हाल में कांग्रेस का नेतृत्व गांधी परिवार के हाथ में देखना चाहते हैं। लेकिन यह तभी संभव होगा जब कांगे्रस विपक्ष लायक बचेगी। दिग्विजय सिंह इस सच्चाई को अच्छी तरह समझ रहे हैं। यहीं वजह है कि वे अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध कर तुष्टीकरण की लासेबाजी का दांव चला है। अब देखना दिलचस्प होगा कि दिग्गी राजा के इस तुष्टीकरण दांव से कांग्रेस और गांधी परिवार का कितना भला होता है।

÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷






















