
लेखक~अरविंद जयतिलक
♂÷देश में महिला सशक्तिकरण को लेकर जागरूकता बढ़ी है। तकरीबन सभी क्षेत्रों में महिलाएं परचम लहरा रही हैं ,संवैधानिक प्रावधानों और सामाजिक प्रयासों के परिणाम स्वरूप लैंगिक असमानता में कमी आ रही है। गत वर्ष पहले राष्ट्रीय परिवार सर्वेक्षण के आंकड़ों से खुलासा हुआ कि महिला स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार हुआ है। महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा की वारदातों में कमी आई है। पिछले एक दशक में वैवाहिक हिंसा की घटनाएं 37.2 फीसद से घटकर 28.8 रह गई है,इसके बावजूद भी सच्चाई यही है कि लैंगिक असमानता की खाई को अभी भी पूरी तरह से पाटान हीं जा सका है,समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव जारी है।गत वर्ष अमेरिका की यूनिवर्सिटी आफ मैरीलैंड और देश की नेशनल काउंसिल आफ अप्लाइड इकोनामिक रिसर्च द्वारा संयुक्त रूप से जारी इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे में कहा गया कि केवल 5 फीसद भारतीय महिलाओं को अपना जीवनसाथी चुनने की आजादी है।स्वास्थ्य के मोर्चे पर संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के द वर्ल्ड वीमेन 2015 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में अभी भी 5 साल से कम उम्र की लड़कियों की मौत इसी उम्र के लड़कों की तुलना में ज्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक 5 साल से कम उम्र में मौत के मामले में भारत का लिंगानुपात सबसे कम है, यह अनुपात 93 का है।यानी अगर 5 साल की उम्र में पहले 93 लड़कों की मौत होती है तो इसी आयु में 100 लड़कियों की मौत होती है। रिपोर्ट में आशंका जताई गया कि भारत में लड़कियों की अधिक मौत की वजह परिवार में बेटों को ज्यादातर देना मुख्य कारण है।इसीलिए के माता-पिता लड़कियों की तुलना में लड़कों की देखभाल और उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखते हैं, यह प्रवृति ठीक नहीं है।जब परिवार में लैंगिक असमानता की चौड़ी होती खाई को पाटा नही जा सकेगा तो अन्य जगह लैंगिक असमानता कैसे दूर की जा सकेगी।गत वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारतीय रोजगार बाजार में लैंगिक अंतर को अन्य देशों की तुलना में सबसे अधिक बताते हुए सलाह दिया था कि अगर श्रमबल में महिलाओं की संख्या को पुरुषों की संख्या के सामान की जाए तो भारत की जीडीपी 27 फीसद तक बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक भारत में लैंगिक अंतर 50 फ़ीसद है जबकि ओईसीडी देशों में औसत अंतर 12 फीसद है,चूंकि भारत में अंतर बड़ा है इसलिए भारत के लिए इसे मिटाने से होने वाला फायदा भी अन्य देशों की तुलना में अधिक होगा। लेकिन तभी संभव होगा जब इस अंतर को पाटने के लिए ठोस स्तर पर पहल होगी,इसके लिए आवश्यक है कि श्रम बाजार को लचीलापन बनाने के अलावा बुनियादी ढांचे में अधिक निवेश के सामाजिक खर्च में बढ़ोतरी की जाए। उल्लेखनीय है कि जी-20 ने वैश्विक समुदाय से महिलाओं की भागीदारी में 2025 तक 25 फीसद लाने का आह्वान किया है।हालांकि गत वर्ष पहले विश्व आर्थिक मंच अपनी रिपोर्ट में कह चुका है कि राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के आधार पर लैंगिक समानता के मामले में अपनी स्थिति में सुधार करते हुए भारत 145 देशों की सूची में बेहतर जगह बनाई है। लेकिन गौर करें तो आइसलैंड,नार्वे और फिनलैंड क्रमश पहले दूसरे व तीसरे स्थान पर हैं।उचित होगा कि भारत अपनी स्थिति बेहतर करें ,ऐसा इसलिए भी कि सरकार हो या संसद,विधानसभा हो या विधान परिषद,उच्च न्यायालय हो या उच्चतम न्यायालय,बैंक कर्मचारी सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में फैसले लेने वाले उच्च पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी उनकी आबादी की तुलना में बहुत कम है। केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट पर गौर करें तो महिलाओं की हिस्सेदारी 17 से 20 फीसद के आसपास है।कुछ ऐसा ही हाल देश के तकरीबन सभी राज्यों की विधानसभा और विधान परिषदों में है भले ही पंचायतों में महिलाओं को प्रतिनिधित्व का संवैधानिक अधिकार हासिल है। लेकिन असल में प्रतिनिधित्व की लगाम उनके पतियों या अभिभावकों के हाथों में ही कैद है। बात चाहे गांव ब्लॉक या तहसील की हो अथवा जिला स्तर की,सभी आवश्यक स्थानों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों म पति या अभिभावक ही उनके दायित्वों का निर्वहन करते देखे जाते हैं।ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि निर्वाचित महिला सरपंचों की भूमिका महज एक रबर स्टैंप बनकर रह गई है।यह स्थिति सिर्फ़ पंचायतों में महिलाओं की भूमिका को सीमित करता है बल्कि पंचायती राज के पावन उद्देश्य को भी नष्ट करता है। क्योंकि पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान है इसलिए वहां उनकी मौजूदगी 47 फीसद है।अगर संसद में भी 33 फीसद आरक्षण का प्रावधान सुनिश्चित कर दिया जाए तो यहां भी उनका प्रतिनिधित्व सम्मानजनक हो सकता है। उल्लेखनीय है कि संसद में महिला आरक्षण को लेकर एक अरसे से बहस चल रहा है लेकिन अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है।
गौर करें तो लैंगिक असमानता केवल राजनैतिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है, न्यायपालिका में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है।सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 है जिनमे वर्तमान में केवल 3 महिला न्यायाधीश कार्यरत हैं। इसी तरह देश भर के सभी उच्च न्यायालय में महिला न्यायाधीशों की संख्या 80 के आसपास है। अगर अखिल भारतीय सेवाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर नजर डाला जाय तो यहां भी स्थिति संतोषजनक नहीं है।आईएएस में महिलाओं की 16 से 18 फीसद प्रतिनिधित्व है, इसी तरह बैंकों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल 25 फ़ीसद के आसपास है।बैंकों में क्लर्क स्तर पर 14 फीसद महिलाएं हैं। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व इस तथ्य के बावजूद भी कम है की चुनाव से रोजगार के मामले में भी उनके साथ भेदभाव बढ़ताजा रहा है,नतीजा बेरोजगारी की दर बढ़ती जा रही है। 2003 में देश भर के रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत महिलाओं की संख्या 26 फीसद थी जो आज बढ़कर 36 फीसद तक पहुंच चुकी है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि सरकारी नौकरी से लेकर निजी व्यवसाय करने के लिए महिलाओं को अपने पति से इजाजत लेनी पड़ती है। गत वर्ष पहले विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दुनिया भर के देशों में महिलाओं की आर्थिक उन्नति में कानूनी बाधाएं हैं जिसके कारण महिलाओं को नौकरियां छोड़नी पड़ती है और अपने खर्च सीमिति करना पड़ता है।इतना ही नहीं कम से कम 18 देशों में तो महिलाओं को नौकरी करने के लिए अपने पति से मंजूरी लेनी पड़ती है।हालांकि भारत में इस तरह का क़ानून नही है।लेकिन यह स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं है कि आज भी पत्नी की नौकरियों के मामले में पति की स्वीकारोक्ति काफी महत्वपूर्ण होती है, जो महिलाओं के सशक्तिकरण की राह में रोड़ा है।जो सबसे ज्यादा खतरनाक पहलू यह है की तमाम प्रयासों के बावजूद भी लैंगिक अनुपात में कमी नहीं आ रही है। गत वर्ष पहले देश की सर्वोच्च अदालत ने लैंगिक अनुपात में आई गिरावट को लेकर चिंता जताते हुए जानना चाहा था कि 1950 में जो लैंगिक अनुपात 970 के आसपास था वह लगातार घट क्यों गया है। उल्लेखनीय है कि साल 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में लड़कियों की संख्या 940 है। भारत में महिलाओं का लिंगानुपात कम होने के एक कारण कन्या भ्रूण हत्या भी है। यह समझना होगा कि जब तक समाज मे महिलाओं के प्रति उदार दृष्टिकोण का पादुर्भाव नहीं होगा तब तक उनकी बंदिशें और भेदभाव की बेड़िया टूटने वाली नहीं है।सरकार व समाज की जिम्मेदारी है कि वें स्त्रियों की शिक्षा,प्रशिक्षण,रोजगार एवं कल्याण के संबंध में ठोस एवं कारगर पहल करें।






















