लेखक~अरविंद जयतिलक
♂÷गांधी के आदर्श उनके निजी जीवन तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने अपने आदर्श विचारों को आजादी की लड़ाई से लेकर समाज निर्माण जैसे जीवन के विविध पक्षों में भी आजमाया।उस समय लोग कहा करते थे कि आजादी के लक्ष्य में सत्य और अहिंसा नहीं चलेगी और ना ही इसमें सभ्य समाज का निर्माण होगा, लेकिन गांधी ने दिखा दिया कि सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलकर भी आजादी और समाज निर्माण के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। आजादी के आंदोलन के दौरान गांधी ने लोगों को संघर्ष के तीन मंत्र दिए सत्याग्रह,असहयोग और बलिदान। उन्होंने खुद से समय की कसौटी पर कसा भी। सत्याग्रह को सत्य की तरह आग्रह बताया यानी आदमी को जो सत्य दिखे उस पर पूरी शक्ति और निष्ठा से डटा रहे।बुराई अन्याय और अत्याचार का किन्ही भी परिस्थितियों में समर्थन ना करें। सत्य और न्याय के लिए प्राण उत्सर्ग करने को बलिदान कहा। अहिंसा के बारे में उनके विचार सनातन भारतीय संस्कृत की प्रतिध्वनि हैं।गांधी पर गीता के उपदेशों का व्यापक असर रहा, वह कहते थे कि हिंसा और कायरता पूर्ण लड़ाई में मैं कायरता की जगह हिंसा को पसंद करूंगा।मैं किसी कायर को अहिंसा का पाठ नहीं पढ़ा सकता वैसे ही जैसे किसी अंधे को लुभावने दृश्यों की ओर प्रलोभित नहीं किया जा सकता।उन्होंने अहिंसा को शौर्य का शिखर माना, उन्होंने अहिंसा की स्पष्ट व्याख्या करते हुए कहा कि अहिंसा का अर्थ है,ज्ञानपूर्वक कष्ट सहना। इसका अर्थ अन्यायी की इच्छा के आगे दबकर को घुटने टेक देना नहीं। इसका अर्थ यह है कि अत्याचारी की इच्छा के विरुद्ध अपनी आत्मा की सारी शक्ति लगा देना।अहिंसा के माध्यम से गांधी ने विश्व को यह भी संदेश दिया कि जीवन के इस नियम के अनुसार चलकर एक अकेला आदमी भी अपने सम्मान धर्म और आत्मा की रक्षा के लिए साम्राज्य के संपूर्ण बल को चुनौती दे सकता है।गांधी के विचारों से विश्व की महान विभूतियों ने स्वयं को प्रभावित बताया।आज भी उनके विचार विश्व को उत्प्रेरित कर रहे हैं, लोगों द्वारा उनके अहिंसा और सविनय अवज्ञा जैसे अहिंसात्मक हथियारों को आजमाया जा रहा है। ऐसे समय में जब पूरे विश्व में हिंसा का बोलबाला है, राष्ट्र आपस में उलझ रहे हैं मानवता खतरे में है, गरीबी भूखमरी और कुपोषण लोगों को लील रही है तो गांधी के विचार बरबस प्रासंगिक हो जाते हैं। अभी विश्व भी महसूस करने लगा है कि गांधी के बताए रास्ते पर चलकर ही नैराश्य,द्वेष और प्रतिहिंसा से बचाया जा सकता है। गांधी के विचार विश्व के लिए इसलिए भी प्रासंगिक हैं कि उन विचारों को उन्होंने स्वयं अपने आचरण में ढालकर सिद्ध किया,उन विचारों को सत्य और अहिंसा की कटौती पर जांचा परखा।
वर्ष 1920 का असहयोग आंदोलन जब जोरों पर था उस दौरान गोरखपुर के चौरी चौरा में भीड़ ने आक्रोश में आकर थाने को अग्नि की भेंट चढ़ा दी, इस हिंसक घटना में 22 सिपाही जीवित जल गए।गांधीजी द्रवित हो उठे उन्होंने तत्काल आंदोलन को स्थगित कर दिया।उनकी खूब आलोचना हुई लेकिन वे अपने इरादे से टस से मस नहीं हुए,वह हिंसा के लिए एक भी क्षण को भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं थे। उनकी दृढ़ता कमाल की थी,जब उन्होंने महसूस किया कि अपने वादे के मुताबिक ब्रिटिश सरकार भारत को आजादी देने में हीला हवाली कर रही है तो उन्होंने भारतीयों को टैक्स देने के बजाय जेल जाने का आह्वान किया। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार आंदोलन चलाया ,ब्रिटिश सरकार द्वारा नमक टैक्स लगाए जाने के विरोध में दांडी यात्रा की। समुद्र तट पर नमक बनाया उनकी इच्छा को देखते हुए उनके निधन पर अर्नाल्ड टोनी बी ने अपने विचार लेख में उन्हें पैगंबर कहा। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन का यह कथन लोगों के जुबान पर है कि आने वाले समय में लोगों को सहज विश्वास नहीं होगा कि हाड़मांस का एक ऐसा जीव था,जिसने अहिंसा को अपना हथियार बनाया।हिंसा भरे वैश्विक माहौल में गांधी के विचारों की ग्राह्यता बढ़ती जा रही है,जिन अंग्रेजों ने विश्व के चतुर्दिक हिस्सों में यूनियन जैक को लहराया और भारत में गांधी के अहिंसा को चुनौती दी, आज वह भी गांधी के अहिंसात्मक आचरण को अपनाने की बात कर रहे हैं। विश्व का पुलिस मैन कहा जाने वाला अमेरिका जो अपने धौंसपट्टी से विश्व समुदाय को उपदेश देता है, अब उसे भी लगने लगा है कि गांधी की विचारधारा की राह पकड़ कर ही विश्व में शांति स्थापित की की जा सकती है।सच तो यह है कि गांधी के शाश्वत मूल्यों की प्रासंगिकता बढ़ी है, गांधी अहिंसा के न केवल प्रतीक भर हैं बल्कि मापदंड भी हैं जिन्हें जीवन में उतारने की कोशिश हो रही है।अभी गत वर्ष पहले ही अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने व्हाइट हाउस में अफ्रीकी महाद्वीप के 50 देशों के युवा नेताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि आज के बदलते परिवेश में युवाओं को गांधीजी से प्रेरणा लेने की जरूरत है। गत वर्ष पहले अमेरिका की प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने महात्मा गांधी की अगुवाई वाले नमक सत्याग्रह को दुनिया के सर्वाधिक 10 प्रभावशाली आंदोलनों में शुमार किया है।याद होगा अभी कुछ साल पहले जांबिया के लोकसभा सचिवालय द्वारा विज्ञान भवन में संसदीय लोकतंत्र पर एक सेमिनार आयोजित किया गया। जिसमें राष्ट्रमंडल देशों के लोकसभा अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों ने शिरकत की। जांबिया की नेशनल असेंबली के अध्यक्ष असुमा के.मवानामवाम्बवा ने सम्मेलन के दौरान गांधी के सिद्धांतों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की और कहा कि भारत के साथ हम भी महात्मा गांधी की विरासत में साझीदार हैं। उन्होंने बताया कि अहिंसा के बारे में गांधीजी की शिक्षाओं ने जांबिया के स्वतंत्रता आंदोलन को बेहद प्रभावित किया।सच तो यह है कि अब गांधी के वैचारिक विरोधियों को भी अब लगने लगा है कि गांधी के बारे में उनकी अवधारणा संकुचित थी,उन्हें विश्वास होने लगा है कि गांधी के नैतिक नियम पहले से कहीं और अधिक प्रासंगिक और प्रभावी हैं, और उनका अनुपालन होना चाहिए।गांधीजी राजनीतिक आजादी के साथ सामाजिक आर्थिक आजादी के लिए भी चिंतित थे। समावेशी समाज की संरचना को कैसे मजबूत आधार दिया जाए उसके लिए उनका अपना स्वतंत्र चिंतन था। उन्होंने कहा कि जब समाज में विषमता रहेगी,हिंसा भी रहेगी,हिंसा को खत्म करने के लिए विषमता मिटाना जरूरी है विषमता के कारण समृद्ध अपनी समृद्धि और गरीब अपनी गरीबी से मारा जाएगा।इसलिए ऐसा स्वराज्य हासिल करना होगा जिसमें अमीर गरीब के बीच खाई ना हो।शिक्षा के संबंध में भी उनके विचार स्पष्ट थे उन्होंने कहा कि मैं पाश्चात्य संस्कृति का विरोधी नहीं हूं अपने घर के खिड़की दरवाजे को खुला रखना चाहता हूँ जिससे बाहर की बाहर की स्वच्छ हवा आ सके, लेकिन विदेशी भाषाओं की ऐसी आंधी ना आ जाए कि मैं औंधे मुंह गिर पडूँ।गांधीजी नारी सशक्तिकरण के प्रबल पैरोकार थे उन्होंने कहा कि जिस देश व समाज में स्त्री का आदर नहीं होता उसे सुसंस्कृत नहीं कहा जा सकता। आज के दौर में भारत ही नहीं बल्कि विश्व समुदाय को भी समझना होगा कि उनके सुझाये रास्ते पर चलकर ही एक समृद्ध सामर्थ्यवान, समतामूलक और सुसंस्कृत विश्व का निर्माण किया जा सकता है।आधुनिक भारतीय चिंतन प्रवाह में गांधी के विचार सर्वकालिक है।सच तो यह है कि गांधी भारतीय,सामाजिक, सांस्कृतिक विरासत के अग्रदूत के साथ-साथ सहिष्णुता उदारता और तेजस्विता के प्रमाणिक तथ्य सत्यशोधक संत भी हैं,तो शाश्वत सत्य के यथार्थ समाज वैज्ञानिक भी। साहित्य संस्कृत धर्म-दर्शन विज्ञान और कला के अद्भुत मनीषी भी तो मानववाद विश्व निर्माण के आदर्श मापदंड भी।सम्यक।प्रगति मार्ग के चिन्ह भी तो भारतीय संस्कृति के परम उद्घोषक भी।गांधी के लिए वेद, पुराण एवं उपनिषद् का साथ ही उनका ईश्वर है और बुद्ध महावीर की करुणा ही उनकी अहिंसा है। सत्य,अहिंसा,ब्रह्मचर्य,अस्तेय, अपरिग्रह,शरीर,श्रम,आस्वाद, अभय,सर्वधर्म,समानता,स्वदेशी और समावेशी समाज निर्माण की परिकल्पना ही उनके जीवन का परम लक्ष्य है।

÷लेखक राजनीतिक विश्लेषक व समीक्षक के साथ विदेशी मामलों के ज्ञाता हैं÷






















