【सर्वधर्मान्परितयज्य मामेकं शरणं व्रज】

【सर्वधर्मान्परितयज्य मामेकं शरणं व्रज】

लेखक~अरविंद जयतिलक

♂÷श्रीकृष्ण ने गीता में नश्वर भौतिक शरीर और नित्य आत्मा के मूलभूत के अंतर को भलीभांति समझाया है। उन्होंने कहा है कि आत्मा अजर और अमर है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, उसी प्रकार आत्मा जीर्ण शरीर को त्यागकर नए शरीर में प्रवेश करती है। अतः मनुष्य को फल की चिंता किए बिना कर्तव्य का पालन करना चाहिए। श्रीकृष्ण ने निराशा के भंवर में फंसे संसार को सफलता और असफलता के प्रति समान भाव रखकर कार्य करने की प्रेरणा दी है। उन्होंने इसे कर्मयोग कहा है। श्रीकृष्ण के उपदेश गीता के अमृत वचन हैं। संसाररुपी भवसागर से पार उतरने की औषधि है। गीता के उपदेश से ही अर्जुन का संकल्प जाग्रत हुआ और कुरुक्षेत्र में खड़े बंधु-बांधवों से मोह दूर हुआ। तदोपरांत ही वे अधर्मी और दुर्बल हृदय वाले कौरवों को पराजित करने में सफल हुए। कौरवों की हार महज पांडवों की विजय भर नहीं बल्कि धर्म की अधर्म पर, न्याय की अन्याय पर और सत्य की असत्य पर जीत है। श्रीकृष्ण ने गीता में धर्म-अधर्म, पाप-पुन्य और न्याय-अन्याय को सुस्पष्ट किया है। उन्होंने धृतराष्ट्र पुत्रों को अधर्मी, पापी और अन्यायी तथा पाडुं पुत्रों को पुण्यात्मा कहा है। उन्होंने संसार के लिए क्या ग्राहय और क्या त्याज्य है उसे भी भलीभांति समझाया है। श्रीकृष्ण का उपदेश ज्ञान, भक्ति और कर्म का सागर है। भारतीय चिंतन और धर्म का निचोड़ है। सारे संसार और मानव जाति के कल्याण का मार्ग है। विश्व के महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कहा है कि श्रीकृष्ण के उपदेश अद्वितीय है। उसे पढ़कर मुझे ज्ञान हुआ कि इस दुनिया का निर्माण कैसे हुआ। महापुरुष महात्मा गांधी ने कहा है कि जब कभी मुझे परेशानी घेरती है, मैं गीता के पन्नों को पलटता हूं। महान दार्शनिक श्री अरविंदों ने कहा कि भगवद्गीता एक धर्मग्रंथ व एक किताब न होकर एक जीवन शैली है, जो हर उम्र को अलग संदेश और हर सभ्यता को अलग अर्थ समझाती है। श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश मानव इतिहास की सबसे महान सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक और राजनीतिक वार्ता है। संसार की समस्त शुभता इसी में विद्यमान है। श्रीकृष्ण का उपदेश जगत कल्याण का सात्विक मार्ग है। श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में खड़े अर्जुन रुपी जीव को धर्म, समाज, राष्ट्र, राजनीति और कुटनीति की शिक्षा दी है। प्रजा के प्रति शासक के आचरण-व्यवहार और कर्म के ज्ञान को उद्घाटित किया है। श्रीकृष्ण के उपदेश कालजयी और संसार के लिए कल्याणकारी है। युद्ध और विनाश के मुहाने पर खड़े संसार को संभलने का संबल है। अत्याचार को किस तरह सात्विक बुद्धि से हराया जा सकता है उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। महाभारत से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन का सारथि बनकर न्याय और सत्य का पक्ष लिया। अन्याय का प्रतिकार किया। श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन अत्याचार और अहंकार के खिलाफ एक मानवीय और दैवीय संघर्ष है। बाल्यावस्था से ही श्रीकृष्ण अलौकिक थे। उनकी अलौकिकता में ही जगतकल्याण की भावना निहित है। कभी वह अपनी बांसुरी के मधुर स्वर से सभी को आत्मिक सुख प्रदान करते दिखे तो कभी कंस के अत्याचारों से गोकुलवासियों की रक्षा करते दिखे। कभी वह गोवर्धन पर्वत को ऊंगली पर उठा इंद्र के दर्प को चकनाचूर करते दिखे तो कभी मित्र सुदामा के आगे संपूर्ण सत्ता वैभव को समर्पित करते दिखे। कभी वह समाज की रक्षा के लिए कालिया दमन करते दिखे तो कभी कंस, जरासंध और शिशुपाल जैसे अहंकारी शासकों का विनाश करते दिखे। कभी ग्वाल-बालों के साथ प्रेम लड़ाते दिखे तो कभी गोपियों के संग रास रचाते दिखे। श्रीकृष्ण का जीवन त्याग, प्रेम और समर्पण का अनुकरणीय उदाहरण है। अत्याचार और अहंकार के खिलाफ जनजागरण है। कर्म, सृजन और संकल्प का आदर्श संदर्भ है। श्रीकृष्ण बंधी-बधाई धारणाओं और परंपराओं को जो राष्ट्र-समाज के लिए अहितकर है उसे तोड़ डाला। यही नहीं तत्कालीन निरंकुश शासकों की भोगवादी वर्चस्व के खिलाफ भी आवाज बुलंद की और जनता को अत्याचार के विरुद्ध लड़ने का संदेश दिया। श्रीकृष्ण का मनुष्यों और प्राणियों के प्रति सकारात्मक एकात्मभाव था। उनकी हर क्रिया में जगत का कल्याण निहित है। श्रीकृष्ण ध्वंस और निर्माण, क्रोध और करुणा, पार्थिकता और आध्यामिकता, सगुण और निर्गुण, राजनीति, साहित्य और कला सबके समग्र रुप हैं। नारियों के प्रति उनका सम्मान आधुनिक संसार के लिए सुंदर उदाहरण है। श्रीकृष्ण ने कौरवों की सभा में द्रौपदी की लाज की रक्षा की। श्रीकृष्ण ने संसार को संदेश दिया कि दुर्योधन, कर्ण, विकर्ण, जयद्रथ, कृतवर्मा, शल्य, अश्वथामा जैसे अहंकारी और अत्याचारी जीव राष्ट्र-राज्य के लिए शुभ नहीं होते। ऐसे शासक सत्ता और ऐष्वर्य के लोभी होते हैं। धृतराष्ट्र सिर्फ जन्म से ही अंधा नहीं था बल्कि वह आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से भी अंधा था। उसका सत्तामोह और पुत्र के प्रति आसक्ति का परिणाम रहा कि हस्तिानापुर विनाश को प्राप्त हुआ। धृतराष्ट्र तथा उसके स्वार्थी-अभिमानी पुत्रों में ये सभी अवगुण विद्यमान थे। श्रीकृष्ण ने गीता में विष देने वाला, घर में अग्नि लगाने वाला, घातक हथियार से आक्रमण करने वाला, धन लूटने वाला, दूसरों की भूमि हड़पने वाला और पराई स्त्री का अपहरण करने वाले जैसे राजाओं को अधम और आतातायी कहा है। धृतराष्ट्र के पुत्र ऐसे ही थे। सत्ता में बने रहने के लिए वे सदैव पांडु पुत्रों के विरुद्ध षड़यंत्र रचा करते थे। अनेकों बार उनकी हत्या के प्रयत्न किए। श्रीकृष्ण ने ऐसे पापात्माओं और नराधमों को वध के योग्य कहा है। साथ ही समाज को प्रजावत्सल शासक चुनने का संदेश भी दिया है। अहंकारी, आतातायी, भोगी और संपत्ति संचय में लीन रहने वाले आसुरी प्रवत्ति के शाासकों को राष्ट्र के लिए अशुभ और आघातकारी माना है। कहा है कि ऐसे शासक प्रजावत्सल नहीं सिर्फ प्रजाहंता होते हैं। श्रीकृष्ण ने गीता में मानव जाति को उपदेश देते हुए कहा है कि ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज, अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोशयिष्यामि मा शुचः’ अर्थात संपूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरण में आ जा मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत कर। युद्ध और विनाश के मुहाने पर खड़ा आधुनिक संसार श्रीकृष्ण के उपदेशों पर अमल करके ही समाज और राष्ट्र की अक्षुण्ण्ता को बनाए रख सकता है।

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÷लेखक राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं÷

Mukesh Seth

Chief Editor

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